पुराने घर का जिन्न


आज ही वह इस नए घर में आई थी, तो यहां आते ही उसे एक अजीब सा एहसास हुआ जिसने उसे डरा दिया था। वह परेशान होकर इधर-उधर देखने लगी, क्योंकि उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसकी ओर देख रहा है, लेकिन गौर करने पर कोई भी दिखाई नहीं दिया।

यह घर कुछ अरसे से बंद पड़ा हुआ था, उसके अब्बा ने सस्ता होने की वजह से इसे किराए पर ले लिया था। वरना इससे पहले वह जिस घर में रहते थे, उस घर मालिक ने घर का किराया बहुत बढ़ा दिया था। यही वजह थी कि उन्हें अपना पुराना घर छोड़कर नए घर की तलाश करनी पड़ी।

पुराने घर का जिन्न

पुराने घर का जिन्न

इस नए घर को देखते ही उसके अब्बा ने पसंद कर लिया, क्योंकि एक तो इस घर का मालिक विदेश में रहता था, इसलिए किसी तरह का कोई झंझट नहीं था, और दूसरा इस घर का किराया और घरों की तुलना में बहुत कम था। इसमें हर तरह की सुविधा थी, यहां से स्कूल, कॉलेज, बाजार सब पास पड़ता था।

उसके अब्बा ने इस घर को लेने का पक्का इरादा इसलिए किया, क्योंकि वे जानते थे कि घर का मालिक बाहर है, कोई भी परेशान नहीं करेगा। समय पर किराया देने के बाद किसी भी तरह की कोई समस्या नहीं होगी। पुराने घर मालिक ने तो उनकी नाक में दम कर रखा था, वह आए दिन किसी न किसी बात को लेकर उसके अब्बा से लड़ाई-झगड़ा करता था। इसलिए घर मालिक से बहुत तंग आ गए थे और वे घर छोड़ने का फैसला किया।

आज वह अपने अब्बा के साथ घर की सफाई करने के लिए आई, तो घर में बहुत ज्यादा गंद देखकर वह घबरा गई। ऐसा लगता था कि कई सालों से इस घर को किसी ने साफ ही नहीं किया। लंबे-लंबे जाले खौफ़नाक सा मंज़र पेश करते दिखाई दे रहे थे। उसने डरते-डरते घर में कदम रखा और अपने अब्बा से कहा कि यह घर तो बहुत ज्यादा खौफ़नाक सा लग रहा है। तब उसके अब्बा कहने लगे कि घर की सफाई होने वाली है, जैसे ही घर की सफाई हो जाएगी, यह घर भी पुराने घर की तरह अच्छा ही दिखने लगेगा।

उसने जल्दी से अपने अब्बा के साथ मिलकर पूरे घर को साफ करना शुरू किया।

जाले उतारे और झाड़ू पोछा करने के बाद घर की कुछ शक्ल दिखाई देने लगी। अब यह घर कुछ रहने के काबिल लग रहा था, लेकिन न जाने इस घर में उसे अजीब और गहरा खौफ़ महसूस हो रहा था। उसने पूरे घर का अच्छी तरह से जायज़ा लिया, लेकिन उसे कुछ भी ऐसी चीज दिखाई नहीं दी जिससे डरने की कोई वजह मालूम हो सके।

घर में सामान की शिफ्टिंग का काम शुरू किया गया। उसकी अम्मी बीमार रहती थीं, इसलिए शिफ्टिंग का काम वह और उसके अब्बा के जिम्मे था। उसने और उसके अब्बा ने सारा सामान अपनी अपनी जगह पर लगा दिया। सबसे पहले उसने अपनी मां के कमरे को सेट किया, ताकि मां कमरे में आराम कर सकें। मां से चला फिरा नहीं जाता था, बीमारी की वजह से मां काम काज नहीं कर सकती थीं और न ही कहीं जा सकती थीं।

सारा दिन घर का काम करने की थकान के बाद उसने आराम करने का सोचा। तब उसने अपने अब्बा से कहा कि अब मुझे भी आराम करना चाहिए। उसने अपने अब्बा और अम्मी को खाना खिलाया और खुद भी खाना खाकर अपने कमरे की ओर जाने लगी। वह अपने बिस्तर पर जाकर लेटी ही थी कि उसे अजीब सा खौफ़ आने लगा। इस घर में आने के बाद से ही उसके ज़ेहन पर यह वहम सवार हो चुका था कि कोई है जो उसे लगातार देख रहा है, लेकिन गौर करने पर उसे कोई भी दिखाई नहीं देता।

डर तो बहुत लग रहा था, लेकिन उसे अलग कमरे में सोने की आदत थी। इसलिए उसने आयत-अल-कुरसी पढ़ते हुए अपने कमरे में ही सोने का फैसला किया। थकान की वजह से बिस्तर पर लेटते ही उसे नींद आ गई। वह गहरी नींद सो रही थी जब उसके कानों में अम्मी और अबा की आवाज पड़ी। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे अम्मी और अबा किसी बात को लेकर बहस कर रहे हों। जैसे ही उसने घबराते हुए अपनी चारपाई से पैर नीचे रखा, कि जाकर देखूं तो सही, आखिर कमरे में क्या हुआ है।
अब्बा क्यों इतना बोल रहे हैं? वह उठी और अब्बा के कमरे की ओर जाने लगी। उसके अब्बा उसकी मां से रो कर कह रहे थे कि मेरे भाइयों ने मेरे साथ बहुत बड़ा जुल्म किया है, मेरे साथ अच्छा नहीं किया। मैं खामोश रहा क्योंकि दोनों छोटे हैं, लेकिन मुझे इस बात का दुःख हमेशा रहेगा कि इन दोनों ने गलत करते हुए एक दफा नहीं सोचा कि वे यह सब किसके साथ कर रहे हैं।


उसके अब्बा की आंखों में आंसू थे, अगर मेरे साथ ऐसा न करते तो हमें दर-दर की ठोकरें नहीं खानी पड़तीं। उसकी मां की आंखों में भी आंसू थे। उसे देखते ही उसकी मां और अब्बा दोनों ही खामोश हो गए और अपने अपने आंसू साफ करने लगे।


उसने अपने अब्बा और अम्मी से कहा कि रात बहुत हो चुकी है और आप लोग यह कैसी चर्चा में पड़े हुए हैं? मां की तबीयत भी ठीक नहीं है। अब आप लोगों को सो जाना चाहिए। मैं आपकी आवाजों से जाग गई हूं। नहीं तो मैं तो इतनी थक चुकी थी कि बिस्तर पर लेटते ही मुझे नींद आ गई। यह कहते हुए उसने मां और अब्बा के कमरे की लाइट बंद कर दी और अपने कमरे की ओर जाने लगी। तभी उसकी नजर अपने घर के दरवाजे पर पड़ी। ऐसा महसूस हो रहा था कि दरवाजे के आगे कोई खड़ा है। पहली ही नजर दरवाजे पर पड़ते ही उसकी जान निकल गई थी। उसके कदम अपने कमरे की ओर जाने के बजाय अब्बा और अम्मी के कमरे की ओर जाने लगे।


उसने अपनी मां से कहा कि मुझे अपने कमरे से बहुत डर लग रहा है, शायद नया घर है इस वजह से डर सा लग रहा है। क्या मैं आज आपके कमरे में लेट जाऊं? मां ने इजाजत दी और उसने वहीं पर चारपाई बिछाते हुए सोने का इरादा किया।


वह आंखें बंद करके बिस्तर पर लेटी तो आंखों के सामने वही मंजर बार-बार आता दिखाई देने लगा। दरवाजे के आगे काली पोशाक में एक लंबा-चौड़ा आदमी खड़ा था। उसके बारे में सोचते हुए भी उसकी जान निकल रही थी। सोचने लगी कि रात के इस समय आखिर कार वह कौन था? दरवाजा तो लगा हुआ था, आखिर वह कौन था जो लगातार घूरे जा रहा था? जब उसने उसकी आंखें देखीं, तो वह खौफ़ से भरी हुई थी। उसी खोफ से खोफजदा होते हुए सारी रात नींद नहीं आई। वह सारी रात करवटें बदलती रही। सुबह की अजान हुई तो उसे सुकून का सांस आया।


उसने और उसकी मां ने वजू किया और फज्र की नमाज अदा करने लगे। नमाज पढ़ने के बाद वह अपने बिस्तर पर लेटी तो उसे फ़ौरन से नींद आ गई। वह गहरी नींद सो गई। उसने एक ख्वाब देखा। उसका नाम फिरवा है। उसके अब्बा एक बिजनेसमैन हैं। मां घरेलू महिला हैं। मां और अब्बा की जब शादी हुई तो उसके अब्बा अपने दो छोटे सौतेले भाइयों के साथ ही रहते थे। फिरवा के अब्बा के भाई उसके अब्बा से काफी छोटे थे। इस वजह से उनकी देखभाल फिरवा की मां ही करती थी। ज्वाइंट फैमिली होने की वजह से मां पर बहुत सी जिम्मेदारियां थीं। मां अपनी जिम्मेदारियों को निभाना जानती थी।


शादी के बाद अब्बा ने कभी भी औलाद की ख्वाहिश जाहिर नहीं की। उसके अब्बा के दिल में एक खोफ था कि अगर मेरी अपनी औलाद हुई तो मेरा और मेरी बीवी का रुझान मेरे छोटे भाइयों से हट जाएगा। उसकी मां अगर कभी उसके अब्बा से अपनी औलाद होने की ख्वाहिश का इज़हार कर भी देती तो उसके अब्बा हमेशा कहते कि यह भी तो हमारे बच्चों की तरह ही हैं। इन पर तवज्जो देकर मेरे दिल को बहुत सुकून मिलता है। मैं नहीं चाहता कि मेरी अपनी औलाद हो और मैं इस सुकून से महरूम हो जाऊं। उसकी मां जब भी उसके अब्बा के मुंह से ऐसे अल्फाज सुनती तो उसकी मां का दिल बहुत भर आता क्योंकि उसकी मां अपनी औलाद भी चाहती थी।

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लेकिन मां ने कभी भी अब्बा के दोनों सौतेले भाइयों को सौतेला नहीं समझा। इसके बावजूद भी अब्बा मां से हमेशा यही कहते थे कि यह तुम्हारी औलाद की तरह ही हैं। इन पर तवज्जो दिया करो, जब तुम्हारा दिल मेरे भाइयों के साथ लग जाएगा और तुम इन्हें अपना मानने लगोगी, तो तुम्हारे दिल से अपनी औलाद की हसरत खत्म हो जाएगी। तुम्हें कभी भी अपनी औलाद की कमी महसूस नहीं होगी।


अब्बा की बातें मां का दिल दुखाती थीं, लेकिन मां ने सब्र का दामन नहीं छोड़ा। मां पांच वक्त की नमाज पढ़ती थी और गिड़गिड़ा कर अल्लाह से दुआ करती थी कि ऐ रब, मेरे दिल में किसी के लिए कोई मैल नहीं है, लेकिन मुझे अपनी औलाद की भी ख्वाहिश है। मैं अपने शौहर की नाफरमानी नहीं करना चाहती, लेकिन तू दिलों का हाल बेहतर जानता है। मुझे नेक और स्वालेह औलाद से नवाज दे, चाहे मुझे बेटी ही अता कर, लेकिन मुझे मेरी अपनी औलाद भी अता कर, मेरी गोद सूनी न रख।


मां रो-रो कर अपने परवरदिगार से यह दुआ किया करती थी। समय गुजरता गया और अब्बा अपनी जिद पर कायम रहे। आखिरकार शादी को सात साल का अरसा होने को था, लेकिन मां की अपनी गोद आज तक सूनी थी। अब्बा के भाई जवान हो गए और अब्बा के साथ कारोबार में मसरूफ़ हो गए। मां का दिल घर पर नहीं लगता था।


फिरवा की मां ने अब्बा से कहना शुरू किया कि आपके भाई अब जवान हो गए हैं, अब तो आपको अपनी औलाद के बारे में भी सोचना चाहिए। हमारी अपनी औलाद भी हुई जाती, आखिरकार यह रहेंगे तो आपके भाई ही न, लेकिन वह मां की एक न सुनते। अब्बा का फैसला अटल था। मां भी अब्बा को समझा-समझा कर थक चुकी थी। अब मां ने भी इस बात पर लड़ना-झगड़ना या समझाना छोड़ दिया था। मां ने अपना मामला अल्लाह के सुपुर्द कर दिया था। फिरवा की मां को सब्र आ गया।


पहले पहल तो अब्बा के भाई अब्बा की बहुत इज्जत किया करते थे। वे दोनों अब्बा के बिना खाना तक नहीं खाते थे। फिरवा के अब्बा ने उन्हें अपने बच्चों की तरह अपनी औलाद की तरह पाला था। इस वजह से अब्बा खुद भी उनके बिना एक पल नहीं रह सकते थे। जैसे ही वे जवान हुए, तो वे अपनी मर्जी के खुद मालिक थे। वे अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीना चाहते थे। जो बच्चे फिरवा के अब्बा से पूछे बिना पानी का गिलास तक नहीं पिया करते थे, अब वे अपनी जिंदगी में बहुत आगे निकल चुके थे। वे अब्बा से कोई भी काम पूछकर नहीं करते थे। अब्बा के छोटे भाई ने लव मैरिज करने के बाद अब्बा को बताया कि वे किसी को पसंद करते थे और उससे निकाह कर चुके हैं। इतना कुछ हो जाने के बाद भी अब्बा ने अपने भाइयों से कुछ नहीं कहा, न कोई शकवा, न कोई गिला।


अब्बा ने अपने दोनों भाइयों की शादी उनकी मर्जी के मुताबिक कर दी। दोनों भाई अपनी शादीशुदा जिंदगी में मस्त हो गए। अब वह पहले वाली बात नहीं रही थी। दोनों भाई न तो अब्बा को समय देते थे और न ही अब्बा की वह अहमियत उनकी पत्नियों की नजर में थी, जिसकी उनसे उम्मीद रखते थे। हालात पहले जैसे नहीं रहे थे। अब्बा के भाइयों ने दो-दो बच्चों को पैदा कर लिया और अब्बा को बिल्कुल अकेला कर के छोड़ दिया। वह अब अक्सर फिरवा की मां के सामने रोते और अपनी गलती को स्वीकार करते हुए मां से माफी मांगते। अब वह यह बात जान चुके थे कि अपनी औलाद अपनी ही होती है। अब्बा बहुत रोते और कहते कि जिन भाइयों के पीछे खुद की औलाद पैदा न करने का फैसला किया था, उन भाइयों ने ऐसी निगाहें फेरी कि उन्हें किसी भी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था। किसी भी तकलीफ का उन पर कोई असर नहीं होता था।


अब अब्बा के दिल में भी औलाद की ख्वाहिश पैदा होने लगी। शादी को पंद्रह साल गुजर गए थे। मां ने तो सब्र कर लिया था, लेकिन अब अब्बा की तड़प मां से भी देखी नहीं जाती थी। अब्बा को जो कोई इलाज के लिए बताता, वहां पर वह अपनी बीवी के साथ चले जाते। अपना और अपनी बीवी का पूरा चेकअप कराते। डॉक्टर दोनों की रिपोर्ट देखते हुए कहते, "आप अल्लाह से दुआ करें, अल्लाह ने चाहा तो आप को औलाद से जरूर नवाजेगा।" अब्बा भी नमाज पढ़कर रो-रोकर अल्लाह से दुआ करते। यह वह समय था जब अब्बा को अपनी गलती का एहसास हुआ। अब्बा इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझ गए थे कि औलाद की नेमत क्या होती है और औलाद से महरूमियत क्या होती है। अब्बा ने कोई दरबार, कोई पीर बाबा, कोई जगह नहीं छोड़ी थी, जहां से अपने लिए दुआ न कराई हो। रो-रोकर अल्लाह से अपने किए गए फैसले पर माफी मांगते। एक दिन अचानक से मां की हालत खराब हो गई। फिरवा की मां ने अपने छोटे देवर से कहा, "जरा मुझे डॉक्टर के पास ले चलो।" तो उसने चार बातें सुनाते हुए मां को चुप करा दिया। उनकी बीवियां भी मां और अब्बा के साथ ऐसा ही सलूक करती थीं, लेकिन फिरवा के चाचा कभी भी अपनी बीवियों को रोकते-टोकते नहीं थे। वे खुद भी अब्बा और मां के साथ अच्छा सलूक नहीं करते थे।


इसलिए उन्हें अपनी पत्नियों का किया गया गलत सलूक भी ठीक लगता था। मां ने रोते हुए अपने पति को कॉल की। फिरवा के अब्बा एक जरूरी काम में व्यस्त थे। उन्होंने मां से कहा, "रिक्शा कराओ और तुम खुद हॉस्पिटल चली जाओ, मैं भी कुछ देर में तुम्हें वहीं मिलूंगा।" मां ने रिक्शा कराया और बहुत मुश्किल से हॉस्पिटल पहुंची। वहां पहुंचने पर मां को पता चला कि वह गर्भवती हैं। मां की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। मां ने रोते हुए अपने पति को फोन किया और फ़ौरन से हॉस्पिटल में आने को कहा। अब्बा ने सभी काम छोड़-छाड़कर फ़ौरन हॉस्पिटल पहुंच गए। जब डॉक्टर ने अब्बा को खुशखबरी सुनाई, तो अब्बा की आंखों में आंसू भर आए। उन्होंने वजू किया और फ़ौरन से अपने रब के आगे सजदा करते हुए शुक्र अदा किया।


सारा चेकअप कराने के बाद, वह उन्हें सावधानी से घर ले आए। फिरवा के चाचा इस खुशफहमी में थे कि बड़े भाई की कोई औलाद नहीं है। सारी जायदाद हमारी और हमारे बच्चों की है। लेकिन आज जब अब्बा ने अपने भाइयों को इतनी बड़ी खुशी की बात बताई, तो अब्बा के भाई यह बात सुनकर खुश होने की बजाय परेशान दिखाई देने लगे। फिरवा के अब्बा इस बात को बहुत अच्छी तरह से जान गए कि इतनी बड़ी खुशी की बात सुनकर भी घर में से कोई भी खुश नजर क्यों नहीं आ रहा है। अब्बा के दोनों भाई जायदाद के बारे में सोचने लगे।


मां की हालत दिन-ब-दिन खराब होने लगी। क्योंकि मां को बेहद कमजोरी की शिकायत थी। जैसे-तैसे करके मां ने अपना समय गुजारा। मां को बहुत सी मुश्किलात का सामना करना पड़ा। फिरवा की चाचियां मां पर तरह-तरह के इल्जाम लगाती और किसी न किसी तरह से मां को परेशान किए रहती। ताकि मां को परेशान करके आने वाली खुशी को खत्म कर दिया जाए। जब अब्बा ने यह बात महसूस की, तो उन्होंने अपनी बीवी को अपनी बहन के घर छोड़ दिया।


मां ने अपना बाकी का समय फिरवा की खाला के घर पर गुजारा। देखते ही देखते वह समय भी आ गया जब अल्लाह ताला ने उन्हें एक बेटी से नवाजा। उन्होंने फिरवा को जन्म दिया। फिरवा उनकी इकलौती बेटी थी, इसलिए वह उनकी लाडली भी थी। अब्बा को पिता बनने का सम्मान शादी के सोलह साल बाद मिला था। इसलिए अब्बा के लिए फिरवा किसी अनमोल तोहफे से कम नहीं थी। वह उसे बहुत प्यार से रखते और बेइंतहा मोहब्बत करते।


फिरवा के जन्म के बाद मां ने अपने घर वापस जाने का इरादा किया। जब मां अपने घर वापस आई, तो घर में अजीब और गजब किस्म के लड़ाई-झगड़े होने लगे। अब्बा ने मां को बताया कि मेरे भाइयों ने मेरी गैर मौजूदगी में जमीन, जायदाद और कारोबार के सभी कागजात चोरी कर लिए और सब कुछ अपने नाम करा लिया है। उन्होंने अब्बा को एक पैसा तक नहीं दिया। सारा कारोबार अब्बा का अपना था, इसमें फिरवा के दादा या किसी का कोई हिस्सा नहीं था। इसके बावजूद भी दोनों चाचाओं ने अब्बा को बहुत बुरी तरह से धोखा दिया और सारा कारोबार हथिया लिया। अब्बा ने अपने भाइयों से कहा, "अब तो मेरी अपनी बेटी भी हुई है, मेरे साथ इतना बड़ा जुल्म करते हुए तुम दोनों के हाथ नहीं कांपे। मैंने तुम दोनों की परवरिश में कहां गलती कर दी, अपनी औलाद न होने दी ताकि तुम लोगों के साथ किसी तरह की ज्यादती न हो।


इसके बावजूद तुम लोगों ने मेरे साथ ऐसा सलूक किया।" फिरवा के अब्बा के दिल से उनके भाइयों की मोहब्बत आज निकल चुकी थी। अब्बा जार-जार रोने लगे और अपने भाइयों से कहने लगे, "तुम लोग तो सांप निकले। एक दफा भी तुम लोगों ने ऐसी हरकत करते हुए नहीं सोचा कि मैंने पिता बनकर तुम लोगों को पाला है।" तो फिरवा के चाचा अपनी बात काटते हुए बोले, "पाला था तो कोई एहसान नहीं किया। तुम्हारे जिम्मे मां-बाप ये जिम्मेदारी लगाकर गए थे। अगर तुम वह जिम्मेदारी पूरी न करते, तो तुम मां-बाप के आगे जवाबदेह होते। इसलिए तुम्हारा हम पर किसी तरह का कोई एहसान नहीं है। जो एहसान भी होगा, वह मां-बाप पर होगा। तुमने वह सब किया जो वह तुम्हें नसीहत करके गए थे। इसलिए तुम्हारा हम पर किसी तरह का कोई एहसान नहीं है।" फिरवा के अब्बा ने अपने भाई के मुंह से ऐसे शब्द सुने, तो अब्बा को अपने किए गए नेकी पर पछतावा होने लगा।




अब्बा उस समय को कोसने लगे जब उनके भाइयों की वजह से उनकी मां के साथ बेहद ज्यादतियां की गईं। इससे पहले कि वह अपने दोनों छोटे भाइयों से कोई बात करते, शिकवा या गिला करते, उन दोनों ने धक्के देकर उनकी मां और अब्बा को फिरवा समेत घर से निकाल दिया। अब्बा ने अपनी मां और फिरवा को कुछ समय के लिए खाला के घर ठहराया और खुद शहर में काम ढूंढने के लिए चले आए। दर-दर की ठोकरें खाने के बाद आखिरकार उन्हें एक जगह पर नौकरी मिल ही गई। उनकी आमदनी इतनी ज्यादा तो नहीं थी, लेकिन इतनी आमदनी थी कि वह फिरवाऔर उसकी मां को अपने साथ शहर में रख सकते थे।


वह फिरवाऔर उसकी मां को अपने साथ शहर ले आए और यहां पर किराए का एक छोटा सा मकान ले लिया। सारा दिन मेहनत-मजदूरी कर के थक जाते। दूसरों से मेहनत-मजदूरी लेने वाला इंसान आज खुद मेहनत-मजदूरी करने लगा था। उन्होंने तो कभी एक पानी का गिलास भी खुद उठकर नहीं पिया था, और आज उन्हें दिन-रात मेहनत करनी पड़ रही थी। उनका काम ही कुछ ऐसा था। उन्हें एक ढाबे पर हिसाब-किताब की नौकरी मिली थी। यहां पर वह हिसाब-किताब के साथ-साथ लोगों के गंदे बर्तन भी खुद साफ करते थे। फिरवा भी अब बड़ी हो चुकी थी। फिरवा से अब अब्बा और अम्मा की यह परेशानी देखी नहीं जाती थी। अब्बा के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह फिरवा को किसी अच्छे स्कूल में पढ़ा सकें। उसे पढ़ने का बहुत शौक था। वह अक्सर अपने अब्बा से जिद करती कि मुझे भी स्कूल जाना है, लेकिन अब्बा के पास स्कूल भेजने की गुंजाइश ही नहीं थी।


इसी तरह वह जवान होती चली गई। जिस किराए के मकान में वे रहते थे, उस मकान का मालिक बहुत ही कंजूस था। वह तरह-तरह के बहानों से अब्बा से पैसे हथियाता रहता था। किराया बढ़ाकर तो कभी किसी चीज की टूट-फूट की वजह बनाकर हमेशा परेशान करता था। अब्बा ने फैसला कर लिया था कि वह इस घर में नहीं रहेंगे, क्योंकि इस मकान का मालिक बहुत ज्यादा तंग करने लगा था। जब उसने मकान का किराया अचानक से बढ़ा दिया, तो अच्छी खासी बहस हो गई। मां ने अब्बा को बताए बिना मकान मालिक से बात करने का सोचा। जब मां ने मकान मालिक को अपनी मजबूरियां सुनाते हुए किराया कम करने का कहा, तो उस मकान मालिक ने मां से कहा, "देखो, बहन, तुम इतनी परेशान हो, तो क्यों नहीं कोई ऐसा काम करती कि यह मकान हमेशा के लिए तुम लोगों को फ्री में रहने को मिल जाए?" मां ने हैरानी का इज़हार करते हुए उससे पूछा, "यह कैसे मुमकिन है, भाई, कि आप अपना मकान हमें हमेशा के लिए बिना किराए के दे देंगे?" वह मकान मालिक मुस्कराहट अपने चेहरे पर सजाए मां से कहने लगा, "देखो, मेरे दो बच्चे हैं और मेरी पत्नी मुझे छोड़कर किसी और के साथ भाग गई है। मैं अपने बच्चों के लिए एक मां की तलाश में हूं। तुम्हारे पास एक खूबसूरत नौजवान बेटी है, तो तुम ऐसा करो कि अपने पति से कहो कि अपनी बेटी का रिश्ता मेरे साथ तय कर दो और मैं तुम दोनों को यह मकान फ्री में रहने के लिए दे दूंगा।"


जब उसकी मां ने उसकी बात सुनी, तो उनका कलिजा मुंह को आ गया। फिरवा की मां ने एक जोरदार थप्पड़ उसके मुंह पर लगाते हुए कहा, "तुम उसके बाप की उम्र के हो और तुम मेरी मासूम सी बच्ची पर गंदी नज़रें जमाए हुए हो।" उसकी मां ने उससे कहा, "हमने तुमसे एक महीने का समय मांगा था, लेकिन अब मैं बहुत जल्द तुम्हारा घर खाली कर दूंगी। जब तक मैं घर खाली नहीं कर देती, खबरदार अगर तुमने मेरे दरवाजे तक भी कदम रखा।" उसकी मां ने उसकी अच्छी तरह से बेइज्जती करते हुए उसे घर से निकाल दिया। यह सारी बातें फिरवा दरवाजे के पीछे खड़ी खामोशि से सुन रही थी। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। फिरवा को अपने दोनों चाचा पर बहुत गुस्सा आ रहा था, क्योंकि सब कुछ होते हुए भी वे लोग लावारिसों जैसी जिंदगी जी रहे थे और वे लोग जिनका कुछ भी नहीं था, ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहे थे।


मकान मालिक के जाने के बाद उसकी मां की परेशानी में इजाफा हो गया, क्योंकि उसकी मां ने एक तो उसके मुंह पर जोरदार थप्पड़ मारा था और दूसरा उसे यह भी कह दिया था कि एक हफ्ते के अंदर-अंदर हम तुम्हारा घर खाली करेंगे, लेकिन आगे से कोई घर नहीं मिल रहा था। अब्बा घर को लेकर बहुत परेशान नजर आ रहे थे। उसके अब्बा उसकी अम्मा से कहने लगे, "मैं उसी साइड पर घर ढूंढता हूं जहां पर मेरी नौकरी है, क्योंकि वह सारा एरिया मजदूरों का है, वहां कोई न कोई खाली मकान रहने को जरूर मिल जाएगा और किराया भी ज्यादा नहीं होगा।" फिरवा की मां तो बस अब यही चाहती थी कि किसी तरह इस घर को खाली कर दिया जाए। उसकी मां ने मकान मालिक की बात को अपने दिल पर ले लिया, जिससे दिन-ब-दिन फिरवा की मां की हालत बिगड़ने लगी।

(यहाँ मैं आप लोगों को बता दूँ "फिरवा" बड़ी बेटी का नाम है इनकी एक छोटी बेटी इमामा, और एक इमामा से बड़ा भी भी है। यूं समझें इमामा सबसे छोटी बेटी है )  

जब उसकी मां ने यह खुलासा किया था कि सीढ़ियों पर कौन व्यक्ति बैठा है, उसे कोई भी दिखाई नहीं दिया था। वहां पर कोई नहीं था जो उसे दिखाई देता। लेकिन इमामा को कोई दिखाई दे रहा था। वह अनजान व्यक्ति जो उसके पीछे पड़ा था, वह तब से उसके पीछे लगा हुआ था जब से वह उस हवेली में गई थी। अब वह जान गई थी कि उसके साथ कोई अतिप्राकृतिक घटना घट रही है। दूसरे दिन बड़ी मुश्किल से घर वालों ने उसे तैयार किया था। बारात दिन की थी, जबकि बहन की विदाई के बाद रात को भाई का वालिमा था। वे सभी तैयार हो चुके थे। रात के 10 बज रहे थे, तभी वह दूसरी कज़नों के साथ गाड़ी में बैठकर हॉल की ओर जाने लगी, लेकिन अचानक ही एक वीरान सड़क पर उनकी गाड़ी खराब हो गई थी। उसका कज़न जो ड्राइवर था, सभी लड़कियों से कहने लगा कि वे थोड़ी देर के लिए गाड़ी से उतर जाएं, क्योंकि गाड़ी में थोड़ी समस्या हो गई है जिसे वह अभी ठीक कर लेगा। यूं वह सारी कज़िन्स गाड़ी से उतर गई थीं। इमामा अपने ही ख्यालों में खोई हुई थी कि आखिर उसके साथ यह सब क्यों हो रहा है, तभी दूर से कोई आता हुआ उसे दिखाई दिया। जैसे ही वह उसकी कज़न के करीब आया, तो उसके पैरों के नीचे से जमीन निकल गई। यह तो वही व्यक्ति था जो उसे हर जगह दिखाई दे रहा था। वह उसके कज़न से कोई बातचीत कर रहा था, जबकि उसकी नज़रें इमामा पर थीं। लगातार उसे देखा जा रहा था। फिर दो मिनट में ही उसने गाड़ी ठीक कर दी। अब गाड़ी ठीक हो चुकी थी, तो उसके कज़न ने उसका शुक्रिया अदा किया, लेकिन वह अजीब से अंदाज में मुस्कराकर वहां से दूर अंधेरे में जाकर गायब हो गया, जबकि इमामा का दिल बुरी तरह धड़क रहा था।


वह समझ गई थी कि यह उसके लिए ही यहां आया था। जाने क्यों चलती कार के दौरान भी उसे महसूस हुआ जैसे वह उसके पीछे पीछे ही आ रहा है। उसने जैसे ही कार के शीशे से पीछे मुड़कर देखा, वह अजीब अंदाज में चलता उस कार के पीछे पीछे मुसलसल उसे देखता रहा था। और यह मंजर देखते ही वह अपनी कज़न से लिपट गई। अचानक उसका जिस्म पूरी तरह कांपने लगा। वह सभी भी परेशान हो गए कि उसे क्या हुआ है। वह डरकर अपनी कज़न से कहने लगी, "कोई हमारा पीछा कर रहा है।" तो वह उसे समझाते हुए कहने लगी, "ऐसा कुछ भी नहीं है, तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है। शायद वीरान जगह पर जाने की वजह से उसके ऊपर किसी हवाई चीज का असर हो गया है।" इन दोनों के जहन में यही बात आई, लेकिन दूसरे दिन उसे शदीद बुखार हो गया। अब उसकी मां मेहमानों के जाने का इंतजार कर रही थी कि कब घर से मेहमान रुखसत हों, और वह अपनी बेटी को किसी मौलवी के पास ले कर जाए जिसके साथ अजीब और गजब की स्थिति पेश आ रही थी। खुदा खुदा कर के सारे मेहमान रुखसत हुए। वह पहली फुरसत में ही इमामा को एक मौलवी के पास ले कर जा रही थी, जबकि इमामा शदीद बुखार में मुब्तिला थी। वह हर समय अपनी मां को यही कहती कि कोई अजनबी व्यक्ति उसे दिखाई देता है, जाने वह कौन है। बिल्कुल इंसान, लेकिन उसकी आंखें बहुत ही खौफनाक हैं। वह भी मौलवी ने हैरान होकर उस खूबसूरत नीली आंखों वाली लड़की को देखा, जो बहुत ही खूबसूरत थी, लेकिन अब पीली ज़र्द हो रही थी। किसी चीज का खौफ उसकी आंखों से साफ झलक रहा था। अचानक ही वह आंखें बंद कर के कोई अमल करने लगा था। थोड़ी ही देर बाद मौलवी साहब गुस्से से उसे कहने लगे, "क्यों इस मासूम को परेशान कर रहा है? क्या बिगाड़ा है?" उसने इमामा के बराबर में बैठी एक ऐसी मखलूक से बात की जो सिर्फ मौलवी साहब को ही दिखाई दे रही थी, जबकि उसकी मां की हालत ऐसी थी जैसे काटो तो बदन में लहू नहीं। क्योंकि अब उसे पूरा यकीन हो गया था कि वह जो बात बोल रही थी, वह सच हो गई। इमामा को तो सच में ही कोई जिन्न का साया हो गया था जो मौलवी साहब को दिखाई दे रहा था और न सिर्फ मौलवी साहब ने उसे हाजिर कर लिया था, बल्कि उससे बातचीत भी कर रहे थे।



इन दोनों के बीच क्या बातचीत हो रही थी, यह केवल मौलवी साहब को ही पता था। इमामा और उसकी मां को कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था, लेकिन इमामा डर के मारे पीली पड़ रही थी। उसका दिल चाह रहा था कि वह वहां से उठकर भाग जाए। लगभग 15 मिनट तक यही सिलसिला चलता रहा, अंत में मौलवी साहब ने इमामा की मां से कहा, "वह एक जिन्न है, बहुत बड़ा और बहुत ताकतवर, जो आपकी बेटी से मोहब्बत कर बैठा है।"


मौलवी साहब ने आगे बताया, "उसका कहना है कि वह इस लड़की की मासूम सूरत और नीली आंखों पर मोहब्बत कर बैठा है। क्योंकि जहां वह रहता था, यह लड़की उस कमरे में बहुत शोर मचाती थी। इस लड़की ने उसे परेशान किया था, वह चाहता तो उससे बदला भी ले सकता था, लेकिन अब वह उसके पीछे है क्योंकि वह इस लड़की से मोहब्बत कर बैठा है।"


मौलवी साहब की बात सुनकर इमामा ने रोना शुरू कर दिया, लेकिन उसकी मां जल्दी से कहने लगी, "मौलवी साहब, आप मेरी बेटी की जान इस से छुड़वा दीजिए। यह बहुत परेशानी में है। आखिर इसने उसका क्या बिगाड़ा है?"


मौलवी साहब ने कहा, "वह बहुत ताकतवर जिन्न है, उससे पीछा छुड़वाना आसान नहीं है। मैं उसका मुकाबला नहीं कर सकता, न ही इस दुनिया में अब कोई ऐसा आदमी है जो उसका मुकाबला कर सके। मेरी मानो, तो आप अपनी बेटी का निकाह कर दीजिए। शायद निकाह की ताकत से वह इससे दूर भाग जाए। लेकिन यह भी हो सकता है कि वह और भी चिढ़ जाए।"


मौलवी साहब की बात सुनकर इमामा की मां परेशान हो गई। अभी तो दो बच्चों की शादी कर के हटी थी, इतनी जल्दी अपनी दूसरी बेटी के लिए रिश्ता ढूंढना और जल्दबाजी में उसका निकाह करना इतना आसान नहीं था। लेकिन हर रात इमामा के चीखने की आवाज सुनकर वह दौड़ी-दौड़ी उसके कमरे में जाती। उसके दूसरे भाई-बहन भी हैरान थे कि आखिर उसे क्या हुआ है।


फिर जब उसकी शादीशुदा बहन उससे मिलने आई, तो उसकी मां ने उसे सब कुछ बता दिया कि उसके साथ क्या-क्या मामला पेश आ रहा है। वह कहने लगी, "अम्मी, पहली फुरसत में आप इसका निकाह कर दीजिए। मौलवी साहब ने जो कहा है, वह ठीक है। कोई न कोई रिश्ता मिल जाएगा। अपनों में न सही, गैरों में ही कर दीजिए।" यूं सब उसके रिश्ते की तलाश कर रहे थे, जबकि वह हर समय खोई-खोई सी अपने कमरे में पड़ी रहती। वह जान गई थी कि उसके ऊपर जिन्नों का साया हो गया है। एक ताकतवर जिन्न उस पर आशिक है, जो उसे हर जगह दिखाई देता है, और यह बात बहुत ही अजीब और खौफनाक बात थी। वह अब साये से भी डरने लगी थी। लेकिन आखिरकार उसके पिता के एक जानने वाले को उसका रिश्ता मिल गया था। वह लड़का बहुत ही गरीब घराने से ताल्लुक रखता था, लेकिन पढ़ा-लिखा और समझदार था। उसकी अपनी भी तीन बहनें थीं, लेकिन सारी बहनें शादीशुदा थीं। लड़का अपनी मां के साथ एक छोटे से घर में रहता था। छोटी सी फैमिली थी।


जल्दबाजी में इस रिश्ते के लिए हां कर दी गई थी, और जल्द ही इसका निकाह कर के रुखसत भी हो जाना था। जबकि इमामा अभी इन चीजों के लिए तैयार नहीं थी। वह बार-बार अपनी मां से कहती कि इससे शादी नहीं करनी, उसे तो शादी के नाम से भी नफरत है, वह इस काबिल नहीं कि शादी कर सके। लेकिन उसकी मां अच्छी तरह जानती थी कि यह ज़बान वह नहीं, बल्कि उसके ऊपर वाला जिन्न बोल रहा है, तो उसे मुसलसल शादी से इनकार करा रहा है। अब वह सब भी उसके ऊपर विशेष नजर रखने लगे थे। फिर आखिर शादी का दिन आ पहुंचा, और इमामा का निकाह भी हो गया, लेकिन उस दिन उसकी आंखें शोले की तरह जल रही थीं, जैसे आंखों से लहू टपक रहा हो। सब उसकी हालत देखकर परेशान थे कि अगर उसने यह सारी अजीबोगरीब हरकतें अपने ससुराल वालों के सामने कर दीं, तो न जाने वे उसके बारे में क्या सोचेंगे।


आखिरकार उसकी रुखसती खैर खैरियत से हो गई थी, लेकिन शादी की रात जैसे ही उसका पति कमरे में आया, इमामा बेहोश पड़ी थी। उसके मुंह से झाग निकल रहे थे। उसकी यह हालत देखकर उन सबके हाथ-पैर मुड़े हुए थे। वह बेसुध चिल्लाने लगा। उसने अपनी बहन को आवाज दी। बड़ी मुश्किल से इमामा को होश आया था, लेकिन वह खाली-खाली नज़रों से चारों तरफ देख रही थी। फिर उसने अपने कपड़े बदल लिए और घुटनों में मुंह छुपाकर बैठ गई। किसी ने भी उससे एक लफ़्ज़ नहीं पूछा, लेकिन फिर भी न जाने उसकी यह हालत कैसे हुई। सुबह वालिमे का प्रोग्राम कैंसल हो गया, क्योंकि सबको ही पता चल गया था कि दुल्हन रात से ही बहुत बीमार है।


सब मेहमान चेहमा-गोइयां कर रहे थे कि आखिर इस लड़की को क्या हुआ? क्या यह शुरू से ही बीमार थी? जबही तो जल्दबाजी में इसकी शादी कर दी है। लड़की तो अच्छे घराने की है, फिर इन्होंने गरीब घराने में अपनी बेटी को कैसे ब्याह दिया? उसकी मां को भी यहां आते ही सारे मामले की खबर हो गई थी। उसके दिल में अजीब से ख्यालात थे। जैसे ही वह अपनी मां के सामने बैठी, रोते हुए उसे कहने लगी, "अम्मां, मुझे अपने साथ ले कर जाओ। मुझे यहां नहीं रहना है। मैंने पहले ही मना किया था कि आप मेरी शादी न करें। वह रात को मेरे पास आया था। उसने मुझे धमकी दी थी कि आखिर मैंने यह शादी क्यों की? क्योंकि मैं सिर्फ उसकी हूं। अम्मां, वह मुझे अपने साथ ले जाएगा। खुदा के लिए मुझे यहां से ले जाइए। मुझे हमेशा अपने पास रखिए।


मां को देखते ही उसने रोना पीटना शुरू कर दिया था, लेकिन उसकी मां दबे दबे शब्दों में कहने लगी, "मेरी बच्ची, तेरा अब निकाह हो गया है। मौलवी साहब ने कहा था कि अब वह तेरा पीछा छोड़ देगा। चल, मैं तुझे अपने साथ लेने आई हूं। दो तीन दिन तो वहां रहेगी, फिर मैं तुझे दोबारा उसी मौलवी साहब के पास ले जाऊंगी।" वह उसे समझाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन रो रो कर इमामा की आंखें बिल्कुल लाल हो गई थीं। वह अपनी मां से बोलने लगी, "मां, उस मौलवी ने यह भी कहा था कि वह ताकतवर जिन्न चिढ़ भी सकता है, और अब वह चिढ़ रहा है।"


जैसे ही वह अपनी बेटी को साथ लेकर जाने लगी, अचानक उसका पति आ गया। वह इस बात की खोज लगाना चाहता था कि आखिर रात को उसके साथ ऐसा क्या हुआ था कि उसने यह सब ड्रामा किया। क्या वह किसी और को पसंद करती थी? क्योंकि अभी थोड़ी देर पहले उसने इमामा को रोते हुए देखा था। शायद वह अपनी मां से कह रही थी कि जबरदस्ती उसकी शादी यहां की गई है, वरना वह किसी और से शादी करना चाहती थी। इस बात को जानकर उसे बहुत दुख महसूस हो रहा था कि पहली रात उसकी बेकार गुजरी थी। ऊपर से, यह इन्कशाफ होने के बाद उसके लिए यह जानना कि उसकी पत्नी किसी और को पसंद करती थी, किसी और से शादी करना चाहती थी, उसके लिए यह डूब मरने का मक़ाम था।


वह अपनी पत्नी से पूछना चाहता था कि अगर सच में वह किसी और को पसंद करती है, तो वह अभी और इस समय उसे तलाक दे देगा। यही बात जानने के लिए उसने आज रात उसे रोक लिया था। जबकि इमामा के घर वाले बुरी तरह परेशान हो गए थे, क्योंकि वह बात जो वे सब से छुपाने की कोशिश कर रहे थे, कहीं उसके ससुराल वालों को इन सब बातों की खबर न हो जाए। खाली हाथ वापस आ गए थे, जबकि वह वहीं पर थी। इस रात उसका पति उसके सामने बैठा था, जबकि वह घुटनों में मुंह छुपाकर बैठी थी। उसने नजर उठाकर अपने पति को देखा तक नहीं। "मैं पूछ सकता हूं, क्या तुम्हारी शादी जबरदस्ती की गई है?" उसकी आंखों में आंखें डालकर वह अजीबोगरीब सवाल कर रहा था। उसने नकारात्मक में सिर हिलाया और रोना शुरू कर दिया। रोते हुए कहने लगी, "मैं तो शादी करना ही नहीं चाहती थी, न जाने क्यों मेरे घर वालों ने मेरी शादी जबरदस्ती कर दी। साफ-साफ शब्दों में आपसे यह कहूंगी कि मैं शादी के काबिल नहीं थी। मैं एक ऐसी लड़की हूं जिसे बचपन से ही खौफ़ की बीमारी ने जकड़ रखा है, और वह खौफ़ मुझ पर इतना हावी हुआ कि आज मैं उसके हाथों बर्बाद होने जा रही हूं।" वह सिसकते हुए उसे अपनी जिंदगी की हकीकत बता रही थी। यह सुनकर उसका पति हैरान था, कहने लगा, "क्या समस्या है तुम्हारे साथ? मुझे भी बताओ और कैसा खौफ़ तुम पर हावी है? एक डर होता है जो यह इंसान के दिल में दफन है, जो कभी न कभी बाहर आता है, लेकिन तुम्हारी आंखों में खौफ़ की जगह एक खौफनाक तारीकी है। मुझे बताओ, तुम्हारे साथ क्या समस्या है?"


वह बड़े प्यार और नर्मी से उससे पूछ रहा था। वह हिचकियां ले लेकर रो रही थी। फिर कहने लगी, "मैं एक ऐसी लड़की हूं जो बचपन से ही खोफ की बीमारी से ग्रस्त है। इस खोफ को मैंने बचपन में ही पालकर अपने सीने में जवान किया है, और आज वह खोफ मेरे सामने मौजूद है। वह जिन्न जिसके अस्तित्व से मैं बहुत ज्यादा डरती थी, वह मुझ पर हावी हो चुका है। उसका कहना है कि मैं किसी और की नहीं, सिर्फ उसकी हूं। वह एक दिन मुझे इस दुनिया से अपनी दुनिया में ले जाएगा।"


उसके पति के वहम-ओ-गुमान में भी नहीं था कि इमामा कुछ ऐसा उसके सामने इनकिशाफ करने वाली है। यह कोई ऐसी बीमारी का मामला था जो कोई जिन्न उसकी बीवी की खूबसूरत नीली आंखों पर आशिक हो गया था। वह हैरान होकर उसे रोते हुए देख रहा था। फिर उसके सर पर हाथ रखकर तसल्ली देते हुए कहने लगा, "इन जिन्नों का अस्तित्व हकीकत है, लेकिन हमें यह भी तस्लीम करना होगा कि यह अशरफुल-मख्लूकात (यानि इंसानों) से ज्यादा ताकतवर नहीं हैं। तुम्हें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। वह खुद ही तुम्हारा पीछा छोड़कर चला जाएगा। मैं तुम्हें एक ऐसे शख्स के पास ले जाऊंगा जो इन जिन्नों के मुकाबले करना जानता है। मुझे पता है कि दुनिया का हर काम हर जिन्न को उसके सामने अपना घमंड तोड़ने पर मजबूर कर देता है। अब मैं तुम्हारा इलाज कराऊंगा। मैं उस बन्दे को जानता हूं। वह मुझे कहां मिलेगा? क्योंकि उसका पति एक बार किसी ऐसे ही समस्या को लेकर किसी बन्दे के साथ उस बन्दे के पास गया था, और उसने देखा था कि वह कोई आम बन्दा नहीं था। अब मैं तुम्हारा इलाज कराऊंगा, क्योंकि तुम मेरी बीवी हो। मुझे तो अपनी खुशनसीबी पर यकीन नहीं आ रहा था कि तुम जैसी खूबसूरत लड़की मेरी बीवी बन सकती है।"


"मैं तो बचपन से ही बड़ी मुश्किल जिंदगी जी रहा था। तीन तीन बहनों को रुखसत किया और फिर अपना घर भी खरीदा। सोचा था कि कोई सीधी-सादी लड़की मिल जाएगी, तो उससे शादी कर लूंगा। लेकिन अचानक ही तुम्हारे अबा ने अपनी परेशानी बताई कि वह अपनी बेटी के लिए कोई रिश्ता ढूंढ रहे है, तो मैंने कहा कि मैं अपनी खुशनसीबी समझूंगा अगर आप अपनी बेटी का रिश्ता मेरे साथ कर देंगे। वह फ़ौरन ही इस बात पर राजी हो गए थे, लेकिन मैं नहीं जानता था कि लड़की के रूप में एक खूबसूरत परी मेरे घर में आ रही है। शादी की रात तुम्हें देखकर मैं बार-बार अपने रब का शुक्र अदा कर रहा था, लेकिन नहीं जानता था कि तुम्हारे घर वालों ने जल्दबाजी में तुम्हारी शादी की है। इसके पीछे यह वजह हो सकती है, लेकिन अब तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारे साथ हूं। एक दरवेश टाइप बन्दा है जो उन चीजों का बहुत अच्छे से इलाज करता है। मैं तुम्हें उसके पास ले जाऊंगा। वह दुनिया के लिए एक आम लड़का है, मगर वह अपने बारे में किसी को पता नहीं चलने देता कि वह कौन है।"


इमामा का शौहर एक बहुत ही अच्छे मिजाज का इंसान था। उसने जान लिया था कि उसकी बीवी के साथ क्या समस्याएं हैं। अब वह उसे अकेला नहीं छोड़ेगा, क्योंकि उसे देखते ही इमामा को उससे मोहब्बत हो गई थी। लेकिन उस रात वह सोई तो उसे बड़ा ही अजीबोगरीब सा एहसास हुआ, जैसे उसका पति नहीं, बल्कि कोई और उसके साथ सो रहा है। उसने जैसे ही आंखें खोलीं, वह खोफनाक आंखों वाला शख्स उसके पास बैठा था, जो उसे गुस्से से घूर रहा था।


अचानक ही उसने इमामा का हाथ पकड़ा और उसे अपनी तरफ खींचने लगा। वह उसके साथ घर से घसीटती जा रही थी, यहां तक कि वह दहलीज के पास पहुंच गई और उससे जोर-जोर से इल्तजा करने लगी कि वह उसके साथ ऐसा न करे, वह उसे अपने साथ न ले जाए। लेकिन वह खोफनाक आंखों वाला शख्स उसे जिस अंदाज में देख रहा था, ऐसे लग रहा था जैसे वह इमामा का दुश्मन बन गया हो। वह उसे अपने साथ ले जा रहा था, इस वजह से क्योंकि उसने दूसरे इंसान से शादी कर ली थी, जबकि वह एक ताकतवर जिन्न में से था। बहुत ताकतवर, आज तक किसी जिन्न नें उसकी बात से इनकार नहीं किया था, लेकिन यह लड़की जिसने किसी और को अपनी जिंदगी में शामिल कर लिया था, अब वह उसे सबक सिखाने वाला था।


अचानक ही उसकी पुकार सुनकर सारे घर वाले जमा हो गए। सब यह देखकर हैरान थे कि इमामा दरवाजे के पीछे बेहोश हालत में पड़ी थी। सबसे ज्यादा फिक्रमंद उसका पति था, जब कि नंदे गुस्से से उसे देख रही थीं। सास के चेहरे पर भी गुस्से के तासुरात थे। वह सब आपस में बातें करते हुए कह रही थीं कि इस आसेब-ज़दा लड़की को हमें इस घर में रखना ही नहीं चाहिए। उसके घर वालों ने जानबूझकर हमारी गरीबी से फायदा उठाकर अपनी बेटी की शादी इस घर में कर दी, जब कि उन्होंने हमारे बेटे की जिंदगी के बारे में नहीं सोचा। लेकिन उसका पति उसके लिए बहुत फिक्रमंद था।


तभी अगले दिन वह सुबह-सुबह उसे, उसी बन्दे के पास ले गया था। वहां उसके घर पहुंचे, तो घर का दरवाजा बंद देखकर वह हैरान हुए। इमामा बोलने लगी, "यहां तो ताला है।" उसका पति बोलने लगा, "घबराओ मत, हैदर किसी काम से ही गया होगा, मैं देखता हूं।" वह आस-पास के लोगों से पूछते हुए किसी से हैदर नामी उस बन्दे का नंबर लेकर आया और इमामा के पास आकर उसे कॉल करने लगा। आगे से कॉल उठाई गई, "अस्सलामु अलैकुम।" इमामा के पति ने अपनी पहचान बताई और कहा, "हैदर भाई, कहां हैं आप? मैं आपके घर के बाहर खड़ा हूं। एक समस्या है मेरे साथ, मेरी बीवी है मैं आपका इंतजार कर रहा हूं।" हैदर नामी शख्स ने उन्हें बताया कि वह पास ही में मार्केट गया है, अभी आता है। कुछ ही समय में हैदर अपने घर आया। उसने उन दोनों को अपने बंगले में आने की इजाजत दी। इमामा उसे देखकर हैरत से अपने आप को बोलने लगी, एप मुझे किस के पास ले आए है? यह तो कोई नौजवान खूबसूरत लड़का है, जब कि यह काम तो बाबा टाइप के लोग करते हैं और उनके हाथों में गले में मालाएं होती हैं, मगर यह तो शर्ट पेंट पहने कोई लड़का है।"


हैदर के साथ वह घर के लॉन में आए। हैदर ने उन्हें सामने सोफे पर बैठने को कहा और फिर हैदर इमामा की तरफ मुतवज्जह होके बोला, "आप सही सोच रही हैं, मैं जवान खूबसूरत लड़का जो आप दिल में सोच रही हैं, सही सोच रही हैं।" हैदर ने जब यह बात कही, तो इमामा और उसका पति हैरान हो गए कि हैदर को कैसे पता चला कि इमामा क्या सोच रही है। तब ही इमामा के पति ने हैदर से कहा, "हैदर भाई, आपने पहले भी हमारी मदद की थी, मगर आज मैं फिर आपके पास मदद के लिए आया हूं। यह मेरी बीवी है, अभी कुछ दिन पहले ही हमारी शादी हुई है, लेकिन इससे एक जिन्न परेशान कर रहा है। वह नूरानी चेहरे वाला खूबसूरत नौजवान।"


उसने बड़े प्यार से उस खूबसूरत और मासूम लड़की के सर पर हाथ रखा और उसे समझाते हुए कहने लगा, "कभी भी खोफ को अपने ऊपर इतना हावी न करो कि वह तुम्हारे जिस्म में पंजे गाड़कर बैठ जाए। मुझे आप खुद बताओ, इमामा। मैं पूरी तफसील जानना चाहता हूं।" जबकि वह हैरत से उनकी शक्ल देखती रह गई। फिर डरते-डरते कहने लगी, "उस पुरानी हवेली में जो एक गांव में मौजूद है, वह हमारी नानी का गांव था। उसे मैंने पहली बार वहीं पर देखा था।"


लेकिन मैं नहीं जानती थी कि यह एक इंसान नहीं बल्कि जिन्न है, और उसने उसी रात मेरा पीछा करना शुरू कर दिया था।" हैदर ने उसके सर पर हाथ रखा और कहने लगा, "डरो मत, तुम मेरी बहन हो। हां, बेशक वह एक जिन्न है, मैं जान गया हूं कि उस रात जब तुम बहुत ज्यादा डरी हुई थी, उसने देख लिया था कि यह एक डरपोक सी लड़की है, लेकिन वह इंसानों से सख्त नफ़रत करता है। जो भी इंसान उस हवेली में जाता है, वह उसे बहुत बुरी तरह से अजीयत पहुंचाकर ही वहां से जाने देता था, लेकिन पहली बार जब उसने तुम जैसी मासूम लड़की को देखा, तो उसका पत्थर दिल एकदम से पिघल गया। सारे जुल्म, सारे बदले, भूल गया था और तुम्हारे पीछे-पीछे इंसानों की दुनिया में चला आया। चाहता था कि बस तुम उसी की तरफ देखो, उसी को महसूस करो, इस लिए वह बार-बार तुम्हें अपनी तरफ मुतवज्जह करना चाहता था, लेकिन तुम्हारे घर वालों ने उस जिन्न को नहीं समझा और न ही तुमने तुम उस से शदीद खोफजदा हो गई, क्योंकि यह खोफ तुम्हारे दिल में पहले से ही मौजूद था।


इसी लिए अब वह इस बात पर बुरी तरह चिड़ने लगा है कि तुम्हारी जिंदगी में एक और शख्स शामिल हो गया है। इस लिए वह जबरदस्ती तुम्हें अपने साथ अपनी दुनिया में ले जाना चाहता था, लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं करेगा, क्योंकि मैं भी जिन्नों से बातचीत कर सकता हूं और वह मेरी बहुत इज्जत करते हैं। मेरे एक बार मना करने पर वह हमेशा के लिए तुम्हारा पीछा छोड़ देगा। इस लिए तुम्हें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। बस यूं समझो कि अब तुम्हारी जिंदगी से वह खोफ, वह डर, सब कुछ खत्म हो गया और वह चला जाएगा तुम्हारी जिंदगी से कभी न वापस आने के लिए।"

इमामा बिल्कुल सुन बैठी थी, उसे ऐसे लग रहा था जैसे उस से बहुत बड़ी गलती हो गई हो। एक ऐसा जिन्न था जो इंसानों से सख्त नफ़रत करता था, इसकी वजह से वह इंसानों से मोहब्बत करने लगा था। तब ही तो अपनी दुनिया छोड़कर यहां इंसानों की दुनिया में आया था। लेकिन काश वह एक बार उसे समझ जाती, वह उसके अस्तित्व से खोफजदा होने की बजाय भी उससे बात कर लेती। क्योंकि सिर्फ उसके अंदर यह ताकत मौजूद थी कि वह उसे देख सकती थी, बाकी कोई भी उसे नहीं देख सकता था, भले वह बराबर में ही क्यों न हो।


फिर हैदर ने इमामा के सर पर हाथ रखा और कहने लगा, "आओ, मैं तुम्हें बुला रहा हूं। आओ।" इसके बाद हैदर ने अपनी आंखें बंद कर के पढ़ाई जारी रखी और कुछ ही लम्हों में वह ताकतवर जिन्न अब हैदर, इमामा, और उसके पति के सामने था। वह खोफनाक आवाजें निकालते हुए इमामा के पति की तरफ बढ़ने लगा, तब ही हैदर ने उसे गुर्राकर कहा, "रुक जा।"


हैदर की आवाज सुनकर वह जैसे ही हैदर की तरफ देखने लगा, अचानक नर्मल होता बोला, "किंग आरिज़, के बेटे तुम यहां क्या कर रहे हो?" वह हैदर से अब बात करने लगा, "प्रिंस, आप यहां क्या कर रहे हो?" हैदर ने जवाब दिया, "वही कर रहा हूं जो तुम यहां कर रहे हो, बस फर्क सिर्फ इतना है कि तुम लोगों को परेशान कर के उन्हें तकलीफ देते हो और मैं उनकी मदद कर के उनके दर्द की दवा बनता हूं। छोड़ दो इस लड़की को और चले जाओ वापस। मैं तुमसे नहीं पूछता कि तुमने क्यों कैसे किस तरह से उसे तकलीफ दी। तुमने जो किया सो किया, अब बस बहुत हुआ। अब इसकी शादी हो चुकी है, अब भूल जाओ उसे और सुनो, तुम अपने खानदान समेत इस हवेली में क्या कर रहे हो? अपने खानदान को लेकर दूर इंसानी दुनिया से दूर जाओ, यह मेरा हुक्म है।"


उस जिन्न ने हैदर की बात को सुनकर खामोश रहा और बोलने लगा, "प्रिंस हैदर, मैं तुमसे दुश्मनी नहीं चाहता, मगर मेरा खानदान बहुत समय से इस हवेली में बसा हुआ है।" हैदर ने कहा, "ठीक है, फिर वादा करो कि कभी किसी इंसान को तकलीफ नहीं दोगे। अगर तुमने वादा तोड़ा, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। चलो अब जाओ और इमामा की तरफ पलटकर भी न देखो।" वह एक नजर इमामा को देखता हुआ चीख मारकर वहां से गायब हो गया।


उसके जाने के बाद हैदर ने इमामा की तरफ देखा और पूछा, "अब कैसा महसूस हो रहा है तुम्हें?" इमामा बोली, "अब मैं अपने आप को हल्का महसूस कर रही हूँ !


इसके बाद हैदर ने कहा, "अब अपने घर जाओ और शांति से अपनी जिंदगी गुजारो। वह भी अपने पति के साथ, जो तुमसे बहुत मोहब्बत करता है। और आगे से किसी चीज से डरने की जरूरत नहीं है। अगर डरना है, तो सिर्फ उस खुदा से डरो, जिसने हमें अपनी इबादत के लिए पैदा किया है। लेकिन हम उसके सारे हुक्मों को भूलकर अपनी दुनिया में मगन हो गए हैं। इस लिए आगे से अगर अपनी जिंदगी गुजारो, तो उस अल्लाह से डरकर, जो सबका मालिक है।"


हैदर के समझाने का अंदाज ऐसा था कि इमामा की आंखों में आंसू आ गए। अब वह अपने पति के साथ घर आ गई। फिर उस दिन के बाद से उसकी जिंदगी जैसे पूरी तरह से बदल गई थी। वह लड़की जो अंधेरे से खोफ खाती थी, अब कई-कई घंटे तक अंधेरे कमरे में पड़ी रहती। बार-बार उसके कानों में एक ही सरगोशी सुनाई देती, "मैं सिर्फ तुम्हारी वजह से इस दुनिया में आया हूं। देखो, मेरी तरफ देखो।"


वह था जो कई बार उसके कानों में सरगोशी किया करता था, लेकिन अब उसके अस्तित्व का नाम-निशान भी नहीं था। इमामा जानती थी कि वह उसकी जिंदगी से बहुत दूर चला गया है, इस लिए अब उसे डरने या घबराने की जरूरत नहीं थी। लेकिन वह इस बात पर हैरान होती कि पहले वह जहां कहीं भी उसे नजर आता था, वह बहुत ज्यादा डर जाती थी और उससे भागने की कोशिश करती, लेकिन अब अजीब मामला था, वह उसका इंतजार करने लगी थी, चाहती थी कि किसी तरह वह एक बार उसके सामने आए, लेकिन फिर कई दिन गुजर गए।



अंत में, उसे एहसास हो गया कि उसका प्यार करने वाला पति जो उसे बेपनाह चाहता है, उसकी खामियों समेत उसे स्वीकार करने वाला है, इमामा गलती कर रही थी जो उसने अपने पति को भुला दिया है। अब वह कभी भी ऐसी गलती नहीं दोहराएगी। यूं वह पहले से भी ज्यादा अपने पति की इज्जत और मोहब्बत करने लगी। लेकिन दिल के किसी कोने में यह भी ख्वाहिश छिपी थी कि एक बार वह उसी हवेली में जाकर देखे कि अभी भी वहां मौजूद है या नहीं। लेकिन यह भी डर था कि कहीं उसे सामने देखकर वह फिर से इस इंसानों की दुनिया में न चला आए। इस लिए उसने अपनी इस ख्वाहिश को दिल में ही दबा लिया था और अपने पति के साथ एक अच्छी जिंदगी गुजारने की कोशिश करने लगी। और हैदर का शुक्रिया अदा करती रही कि उसकी वजह से उसका डर-खोफ खत्म हो चुका था।