लक्ष्मी डिग्री कॉलेज के स्टाफ रूम से अचानक चीखों का शोर हुआ और पूरा कॉलेज सहम गया। वीकेंड के बाद, सुबह-सुबह छात्र और स्टाफ आने लगे, सब कुछ सामान्य था कि जब मिस शीला ने अपना सामान रखने के लिए अलमारी खोली, तो वह चीखती हुई पीछे हटी और बेहोश हो गई। आना फाना स्टाफ रूम में मौजूद अन्य शिक्षक मिस शीला की ओर लपके और उन्हें संभालने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही उनकी नजर अलमारी के अंदर गई, सबकी चीखें निकल रही थीं और दो-चार और लोग बेहोश होकर वहीं गिर गए थे। पूरे कॉलेज में भूचाल सा आ गया था, कुछ शिक्षक उल्टियां करते हुए स्टाफ रूम से बाहर भाग खड़े हुए और कमजोर दिल वाले चक्कर खाकर वहीं दरवाजे में गिर गए। प्रिंसिपल को खबर मिलते ही लगभग भागते हुए स्टाफ रूम में आया और वहां का मंजर देखकर बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला और पुलिस को कॉल की। एक इंस्पेक्टर और कुछ अधिकारी मौके पर पहुंच चुके थे, उन्होंने आते ही स्टाफ रूम खाली करा लिया और स्टाफ रूम को चारों ओर से सील कर दिया। इंस्पेक्टर तक यह मंजर देखकर सहमा हुआ था और उसके माथे पर पसीने और चेहरे पर परेशानी के निशान साफ नज़र आ रहे थे।
INSANI LASH KA KAMBAL BNA DIYA
मंजर क्या था?
एक इंसानी लाश थी जिसे किसी भारी वस्तु के नीचे दबाकर हड्डियाँ, खोपड़ी, मांस सब कुछ,और यहाँ तक कि उसके पहने हुए कपड़ों समेत बराबर कर दिया गया था, और वह एक इंसानी खाल और कपड़ों में एक कम्बल की तरह दिखने लग गई थी, और इसे कम्बल ही की तरह रोल कर के गठरिया सी बनाकर अलमारी में रख दिया गया था। लाश एक-दो दिन पुरानी लग रही थी क्योंकि वहाँ कीड़ों का ढेर उस पर जमा था और चूटियाँ और मकोड़े लाइन दर लाइन उसे खाने और ले जाने में व्यस्त थे। लेकिन परेशान करने वाली बात यह थी कि फर्श पर तो दूर गेट से स्टाफ रूम तक आने-जाने वाले रास्ते में दूर-दूर तक भी खून का एक भी कतरा और न ही कोई हत्या का निशान था और सुबह जब कॉलेज खोला गया तो स्टाफ रूम समेत सारे दरवाजे ताला बंद थे। इसके साथ-साथ लाश की हालत देखकर यह लगता था जैसे खून का एक-एक कतरा उसमें से निचोड़ लिया हो। इसके बाद किसी रोड रोलर के नीचे दबाकर उसे प्रेस कर के इंसानी शरीर का कम्बल बनाकर यह कम्बल नुमा लाश गोल कर के यहाँ रख दी गई हो।
सवाल यह उठता था कि फिर बंद दरवाजों में से किसी एक का भी ताला तोड़े बिना और अलमारी का ताला भी तोड़े बिना लाश अलमारी में कैसे पहुंची और अगर पहुंची तो दरवाजे के बाहर मौजूद चौकीदार और कॉलेज में मौजूद अन्य मुलाजिमों को क्यों नहीं पता चल सका, यह नब्बे की दहाई थी तो सुरक्षा कैमरों का तो उस समय ख्याल भी नहीं था कि कोई सुराग मिल सकता है और स्टाफ रूम के अंदर यह सब कुछ हो गया तो लाश का खून क्यों नहीं बहा और इसकाी हत्या करते समय कोई तोड़फोड़ के निशान भी नहीं दिखाई दिए, सफाई वाले स्टाफ, और बहुत सुबह आने वाले शिक्षकों ने यह भी बताया कि शुक्रवार के दिन स्टाफ रूम में छोटी सी पार्टी हुई, खाने के टुकड़े और उस दिन जमीन पर चाय का कप गिरने से जो निशान पड़ा था वह अभी तक मौजूद है और इसके पहले कि सफाई वाला स्टाफ सफाई शुरू करता, मिस शीला ने यह खौफनाक मंजर देख लिया।
पुलिस ने अब कोई सुराग न मिलने पर कॉलेज बंद करा दिया और पूरे कॉलेज की बड़ी विस्तार से तलाशी ली गई और उस समय के आधुनिक तकनीकों से जांच-पड़ताल की गई, लेकिन हत्या यहाँ हुई या बाहर हुई और हत्यारा कहाँ से आया कहाँ गया, कोई सुराग नहीं लग सका, लाश की पहचान के अलावा जो उसकी कमीज में मौजूद बटुए से हुई, यह बदकिस्मत पंडित कृष्णा की लाश थी, जो इसी कॉलेज में हिंदी पढ़ाते थे और शुक्रवार के दिन कॉलेज आए थे और उस छोटी सी पार्टी में भी शामिल हुए थे, लेकिन इसके बाद वह कहाँ गए, यह सब कुछ कब हुआ, किसी को कुछ पता नहीं था। बस एक बात सामने आई कि पंडित जी ने अपना स्कूटर देकर चौकीदार को अपने घर भेजा कि स्कूटर वहाँ छोड़कर उन्हें पैगाम दे आए कि पंडित जी किसी पूजा में शामिल होने कश्मीर जा रहे हैं और शनिवार के दिन वहीं से सीधे कॉलेज आ जाएंगे। चौकीदार के मुताबिक, पंडित जी के घर से होकर आने में उसे कोई डेढ़ घंटा लग गया। उसने रास्ते में चाय पी और खाना भी खाया। इसके बाद वह कॉलेज आया। एक-एक कर के कमरे चेक किए और ताला लगाकर बाहर अपने कमरे में आ गया। इसके बाद कॉलेज की इमारत पर दो दिन ताला पड़ा रहा, न कोई आया न गया।
पुलिस ने अपना हर हथकंडा आजमाया, लेकिन कोई भी व्यक्ति अपने बयान से ऊपर-नीचे नहीं हुआ, सबका बयान ज्यों का त्यों आ रहा था, इन्हीं चक्करों में हफ्ता भर गुजर गया, कॉलेज के साथ-साथ पूरे शहर में भी इस लर्ज़ा-खेज़ और हौलनाक हत्या की दहशत तारी थी। तंग आकर कॉलेज की सील की गई इमारत खोल दी गई और कॉलेज फिर से चालू हो गया।
कुछ दिन हाजिरी ऊपर-नीचे हुई, फिर सब कुछ सामान्य पर आ गया। लेकिन इस घटना के बाद कॉलेज की एक लड़की सलोनी के अंदर उसकी दोस्त रश्मि ने काफी बदलाव देखा और यह बदलाव सलोनी को काफी परेशान और शक में डाल रहा था। सलोनी अपने माता-पिता की इकलौती औलाद थी और फर्स्ट ईयर में इसी साल कॉलेज आई थी। यहीं आकर उसकी दोस्ती रश्मि से हुई थी और इन दोनों का और कोई दोस्त नहीं था। लेकिन इस लर्ज़ा-खेज़ घटना के बाद से सलोनी ने मुस्कराना एकदम छोड़ दिया और उसके होंठों पर हल्की सी स्याही उतर आई जो पहले गुलाब जैसे गुलाबी होते थे और उसकी स्लेटी माइल सुरमई आँखों में हल्का ज़र्द पन (हल्की पीली) दिखाई देने लगी थी। गोगा सलोनी की शख्सियत पहले भी बहुत दिलकश और दिल को मोह लेने वाली थी।
उसके अध-घुंघराले बाल, किसी बल खाते पहाड़ी रास्ते की तरह, उतार-चढ़ाव वाली पतली कमर पर किसी मलका की क़बा की तरह फैले होते, और नीचे गुंबदनुमा लेकिन रेशम भरे गद्देदार कोहनियों को छूते थे। सलोनी रंगत से बहुत सुरख और सफेद तो नहीं थी, लेकिन प्लेटिनम जैसी चमकती दमकती रोशन चेहरे के साथ ऊंट की कोहान जैसा सीना लिए पूरे कॉलेज में अलग ही नजर आती थी। लड़कियाँ उस पर रश्क करते नहीं थकती थीं, और लड़के राल टपकाते आँखें सेंकते नजर आते थे। अब उसी रोशन चेहरे वाली सलोनी की आँखों के गिर्द भी हल्की सी स्याही उतर आई थी। लेकिन जो सबसे ज़रूरी बात यहाँ कहना चाहिए वो ये थी कि वह जहाँ हैंडसम लड़का देखती किसी भूखी शेरनी की तरह उसे होस-ज़दा नज़रों से घूरती कि अच्छे खासे लड़के भी घबराने लग जाते थे।
रश्मि के लिए सलोनी का यह अंदाज़ बिल्कुल नया था और वह इस सब से काफी परेशान थी। इस बदलाव की वजह से रश्मि और सलोनी आहिस्ता-आहिस्ता दूर होने लगीं और सलोनी ने भी इस सब पर कोई खास ध्यान नहीं दिया । पंडित कृष्णा की हौलनाक मौत के बाद पूरा शहर उस समय लरज़ कर रह गया था, जब शहर के मशहूर बदमाश कालिया की लाश उसी हालत में उसकी गाड़ी की पीछली सीट से बरामद हुई। वहाँ भी न कोईसुराग़ मिला और न ही कोई खून का कतरा, न तोड़-फोड़, सिर्फ और सिर्फ हड्डियाँ खोपड़ी पिसी हुई तेहदार कम्बल की तरह गोल की गई लाश थी। अब तो पुलिस और अन्य कानून के करंदे भी दहशतज़दा थे और हैरान-परेशान भी थे।
इस रोंगटे खड़े कर देने वाली दूसरी हत्या ने शहर के साथ-साथ मुल्क में भी हलचल मचा दी, लेकिन चूँकि उस समय में ज़रिये जांच करने के लिए इतने आधुनिक उपकरण नहीं थे, और मामला एक दफा फिर दब सा गया। एक तरफ दर्दनाक हत्याएँ हो रही थीं, तो दूसरी तरफ सलोनी के हुस्न और शबाब के चर्चे कॉलेज से निकलकर शहर की गलियों में भी होने लगे थे, मर्द और खवातीन उसकी मस्तानी आँखों से लेकर उसके हुस्न और कयामत-खेज़ सरापे को तरसी निगाहों से देखते और ठंडी आह भरकर रह जाते थे।
इन्हीं दिनों कॉलेज में चंदू की पोस्टिंग हुई जो फ्रेश ग्रेजुएट था और वह फिलॉसफी और मनोविज्ञान के सब्जेक्ट पर मज़बूत पकड़ रखता था और इसके साथ-साथ वह दुनिया में मौजूद दूसरी प्रजातियों की मौजूदगी पर खुफिया तरीके से रिसर्च कर रहा था। चंदू ऊंचा लंबा, चौड़ी छाती वाला मर्द था, उसकी आँखों में शाइस्तगी लेकिन ज़हानत की चमक थी और वह आस-पास के माहौल पर बड़ी गहरी नज़र रखता था। उसकी नज़र जब सलोनी पर पड़ी तो वह उसकी खूबसूरती या निस्वानियत की तरफ आकर्षक नहीं हुआ बल्कि सलोनी के घूरने के अंदाज़ और किसी ललचाई हुई भूखी शेरनी जैसी ठहरी हुई नज़र से हुआ, सलोनी की आँखें झपकने का अंदाज़ और पीछे के मंज़र से मुकम्मल आशनाई और फिर अचानक नज़रें फेरकर मंज़र से ग़ायब होने पर हुआ।
उसी समय चंदू के दिमाग में सलोनी को लेकर एक अजीब ख्याल आया और अगले ही पल सलोनी अचानक से चौंक गई और मंज़र से ग़ायब हो गई। यह बिल्कुल ऐसा ही था जैसे सलोनी ने चंदू का दिमाग पढ़ लिया हो। लेकिन सलोनी की आँखों में चंदू के लिए हवस और दिल में भरी हुई शहवत चंदू को उसकी पहले वाली सोच की नकार के लिए मजबूर कर रही थी। चंदू अब सलोनी की तलाश में रहता लेकिन काफी दिन गुजर जाने के बावजूद सलोनी उसे दोबारा नज़र नहीं आई, जैसे कि कहीं रूपोश हो गई हो। यह बात अब दोबारा चंदू के शक को मजबूत करने लगी कि सलोनी की हकीकत कुछ और ही है।
चंदू ने इसके बारे में योजना बनाई और सलोनी के बारे में सोचना बंद कर दिया। और अपनी सोच को छुपाकर रखने की परेक्टिस शुरू कर दी। दो-चार दिन में ही वह इसमें कामयाब हो गया। और अब वह आँखों में कुछ और सोचते हुए अवचेतन (अनजाने) में सलोनी को ही ढूंढता रहता था, जिसका फायदा यह हुआ कि सलोनी उसे फिर नज़र आई और इस दफा ज़रा फासले पर खड़ी हुई, वही हवस और शहवत से लबालब नज़रों से चंदू को घोर रही थी। चंदू कमाल महारत से उसकी आँखों में देखे बगैर उसका निरीक्षण (ग़ौर से देखना ) करते हुए मगन हो गया गया लेकिन अवचेतन (अनजाने) में वह सलोनी की हरकतों परलगातार नज़र रखे हुए था।
इसी दौरान उसको रश्मि का पता चला और उसने बातों-बातों में रश्मि से सलोनी के बारे में पूछ लिया। तो रश्मि ने जो पहली बात कही उसने चंदू के शक को यकीन में बदल दिया। क्योंकि जब रश्मि ने सलोनी में बदलाव देखा तो सलोनी ने दो-तीन बार रश्मि के दिमाग में आने वाले शकों की वज़ाहत दी हालांकि रश्मि मुंह से कुछ नहीं बोली थी।
फिर कॉलेज का बिगड़ा हुआ लड़का रॉकी जिसने सलोनी के जिस्म को बिना इजाज़त और नामुनासिब अंदाज़ में छुआ तो सलोनी ने उसके मुंह पर जो थप्पड़ मारा वह किसी मौहर की तरह रॉकी के मुंह पर निशान छोड़ गया, आज एक साल बाद भी हल्का नीला वह हाथ का निशान गौर करने पर रॉकी के मुंह पर नज़र आता था, और रॉकी उस थप्पड़ के बाद बदमाशी भूलकर सलोनी से छुपता फिरता था। रश्मि की यह बातें सुनकर चंदू: बीस साल की सलोनी पर नज़र रखने का सोचने लगा और आगे की कार्यवाही तय करते हुए घर की तरफ चल पड़ा।
अब शहर में एक और तरह के वाकयात होने लगे
हर एक दो हफ्ते बाद एक ही रात चार पांच हैंडसम मर्द होटल के कमरों, फार्म हाउस या वीरान जगहों से बेहोश और नंगे हालत में मिलने लगे। उनके जिस्म पर इंसानी दांतों और नाखूनों के बड़े साफ और गहरे निशान होते थे। होश में आने पर वे इतने खौफज़दा होते थे कि कई दिनों तक बात करने या अपने साथ बीती सुनाने के क़ाबिल नहीं रहते थे, और अक्सर के नफ्स (लिंग) ज़ख्मी होते या उनके अंदर से खून रिस रहा होता था जैसे उनके साथ उस समय तक जिन्सी ताल्लुक़ (सेक्स) किया गया हो जब तक उनकी हालत खराब और वो बेहोश न हो जाए।
नॉर्मल होने के बाद सब एक ही बात बताते थे कि नकाबपोश खूबसूरत हसीना उन्हें वरगलाकर साथ ले गई और फिर वो बार-बार उनके बेहोश होने तक उनका इस्तेमाल करती और टिश्यू पेपर की तरह फेंक देती। इन वाकयात का सिलसिला जारी था कि शहर के सब से बड़े सुनार और उसके दो कारोबारी पार्टनरों की भी उसी वहशी तरीके से की गई मौत और फिर कम्बलनुमा लाशें उनके फार्म हाउस से बरामद हुईं। पंडित कृष्णा, कालिया और अब तीन बड़ी कारोबारी शख्सियत का अंधकार मैं क़तल और वह भी निहायत खामोशी और बिना किसी सबूत के, पुलिस की मौजूदगी पर सवालिया निशान बनाता जा रहा था। दूसरी तरफ इतिहास में पहली बार मर्दों के साथ जिन्सी तशद्दुद करके उन्हें ज़िंदगी और मौत की कशमकश में छोड़कर निहायत चालाकी से मंज़र आम से ग़ायब हो जाना अवाम को और भी खौफ में मुब्तिला कर रहा था।
यहां तक कि माओं ने अपने नौजवान लड़कों को घरों में कैद कर लिया और शहर भर के जुर्मपेशा भी सहमे सहमे नज़र आने लगे। लेकिन न कातिल का कोई सुराग़ मिल रहा था और न उस जिन्सी औरतनुमा बला का जो एक ही रात में पांच पांच मर्दों पर भारी पड़ रही थी।
चंदू लगातार सलोनी पर नज़र रखे हुए था और बड़ी चालाकी के साथ उसके रडार में आए बिना उसके बारे में काफी कुछ जान गया था। लेकिन चंदू के सवालों के जवाब सलोनी पर नज़र रखकर नहीं मिल रहे थे। फिर उसे अपने पिता प्रोफेसर अमन दास की वसीयत याद आई जब मरते समय उन्होंने कहा था कि तुम्हारे सवालों के जवाब तुम्हें मेरी लाइब्रेरी में मिलेंगे। उस समय चंदू को कुछ समझ नहीं आया था कि अमन दास क्या कह रहा है, लेकिन आज चंदू को जिन सवालों का सामना था वह उनके हल के लिए पिता की लाइब्रेरी में जा घुसा था।
उधर सलोनी की दिमागी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी क्योंकि उसकी दिमागी हस्सें उसे लगातार किसी की नज़रों के पीछे आने का इशारा तो देती थीं, लेकिन वह दिशा और उस पर नज़रें गड़ाने वाले का दिमाग पढ़ने में कामयाब नहीं हो पाती। उसने कई बार चंदू को शक की नज़र से देखा, लेकिन हर बार चंदू के दिमाग में कुछ और ही मिला। यह चंदू की रातों दिन की प्रेक्टिस का नतीजा था, कि वह अपनी असली सोच को छुपाकर सलोनी का लगतार पीछा कर रहा था। दूसरी तरफ पुलिस ने शहर भर से और आसपास के इलाकों से तवाइफ़ और उनके दलाल गिरफ्तार करके उनसे हर हीला आजमा कर तहकीकात कर ली लेकिन कुछ हाथ नहीं आया।
क्योंकि एक ही रात में पांच मर्दों की हालत बिगाड़ना एक अकेली औरत का काम नहीं हो सकता था जबकि निशाना बनने वाले सारे लोग एक ही औरत का ज़िक्र करते दिखाई देते थे। और वह अब तक इस कदर खौफज़दा थे कि घरों में कैद हो कर रह गए थे। चंदू ने लगभग सारे कागज़ात जांच पड़ताल कर देख लिए लेकिन सब वही पुरानी बातें और पहले से खोजी गई प्रजातियों का ज़िक्र था लेकिन इस नई प्रजाति और दरिंदा -सिफ़त प्रजाति के बारे में कुछ हाथ नहीं लगा। जो ढूंढकर शहवत से भरे हुए लड़कों और मर्दों का चयन करती साथ उनकी ज़ाहिरी खूबसूरती पर भी नज़र रखती और जिनका क़त्ल करती उनके साथ (सेक्स नहीं करती ।
पहला शिकार एक पंडित जो की टीचर थे और बहुत शरीफ आदमी भी, दूसरा कर्मण्डल और तीसरी वारदात में मरने वाले खालिस कारोबारी लोग थे। लेकिन इन सब की उम्रें लगभग 45 से 50 के दरमियान थीं। और जिनको हवस का निशाना बनाया गया वह बीस से पैंतीस साल तक के मर्द थे।
चंदू उन्ही सोचों में गुम था कि उसे काली फाइल याद आई जिस पर अमन दास आंखों की बीनाई जाने से पहले काम कर रहा था और वह उसकी ज़ाती (पर्सनल)अलमारी में रखी थी। चंदू बिजली की तेज़ी से पिता के कमरे में आया और फाइल उसके हाथ में थी। उसने वहीं बैठे बैठे सारी फाइल पढ़ ली। जिसमें इंसान, जिन और भेड़िये के मेल से वजूद में आने वाली किसी अनोखी प्रजाति का ज़िक्र था। जो इंसान की तरह शातिर और मक्कार, जिनात की तरह ज़हन पढ़ने और भेड़िये की तरह दरिंदा सिफ़त हो सकती थी।
इसके साथ साथ अगर वह किसी ज़िंदा इंसान या जानवर का खून पी गई तो उस खून के ज़रिए वही आदतें इस प्रजाति में आ जाने का अंदेशा भी मौजूद था। और इसमें साफ़ साफ़ प्रोफेसर अमरनाथ को चेतावनी दी गई थी कि इस काम से रुक जाओ। इसमें पुराना हवाला देकर अमरनाथ की जिनज़ाद बीवी का ज़िक्र था जो अमरनाथ की हामिला होकर उसे औलाद देने से क़ासिर थी। लेकिन दोनों औलाद के बेहद ख्वाहिशमंद थे। और अमरनाथ के कहने पर ही यह तज़रबा शुरू किया गया। औलाद के लिए उन्हें एक मादा भेड़िया दरकार थी जिसके रहम(बच्चेदानी) में अमरनाथ और उसकी जिनज़ाद बीवी का बच्चा पैदा हो सकता था। और उनकी पुरानी नायाब मज़हबी किताब में कुछ अमल थे जो मादा भेड़िये पर बच्चे की पैदाइश तक करने थे। और बच्चे की पैदाइश मादा का पेट चीरकर ही मुमकिन थी
आगे के पन्ने पर इस प्रजाति को कंट्रोल या क़ाबू करने का खिताब तो था लेकिन मलूमात अधूरी थीं या यूं लगता था कोईपन्ने फाड़कर ले गया है। और यकीनन वह अमरनाथ ही था जो अपनी औलाद पैदा करके उसे महफूज़ करने के लिए आखिरी पन्ना फाड़कर साथ ले गया था। चंदू का पहला शक सलोनी पर गया कि यह जिन, इंसान और भेड़िये का मेल हो सकती है लेकिन अगर यह सलोनी थी तो उसका बाप अमरनाथ नहीं बल्कि, मूर्ती बेचने वाला "किशन लाल" था। और जो पहला खून हुआ वह पंडित था कोई यौन इच्छित या क्रीमनल तो नहीं था कि सलोनी उसकी तरफ पड़ती।
चंदू वहां से सीधा रश्मी के पास गया और उससे कॉलेज में आखिरी जुमे का सरा मामला पूछा जिसके बाद पंडित की लाश मिली थी। तो रश्मी ने बताया कि पंडित ने सलोनी को छुट्टी के बाद रुकने को कहा था, और यह कि पंडित काफी शौकीन मिज़ाज था, वह भरपूर जवान लड़कियों को अक्सर हेले बहाने से रोकता और बातों में लगाकर उनके जिस्म के क़ाबिल-ए-इतिराज़ जागहों पर हाथ लगाने से भी नहीं कतराता था। और वह सलोनी को किसी भूखे कुत्ते की तरह ललचाई हुई नज़रों से देखता था। और उस दिन जब उसने सलोनी को रोका तो सलोनी परेशान तो नहीं काफी गुस्से में थी और मुझे अपने साथ रुकने भी नहीं दिया ज़बरदस्ती घर भेज दिया था। लेकिन छुट्टी के बाद शाम में सलोनी के घर फोन किया तो वह घर पर ही मिली थी और उसने बताया पंडित ने कुछ नहीं कहा सिर्फ एक दो मूर्तियां मरम्मत कराने के लिए दी थीं।
यह सारी कहानी सुनकर चंदू की आंखों में अजीब सी चमक आ गई। अब उसे यह तो यकीन हो चुका था कि यह सलोनी ही है, लेकिन इस बात की पुष्टि के लिए उसके असली मां-बाप का पता लगाना ज़रूरी था क्योंकि उनके पास सलोनी की भेड़िया मां की लाश थी। और उसके जादू की काट से ही सलोनी को असली हालत में वापस लाया जा सकता था। और वह काट क्या हो सकती थी यह पता करना इस से भी ज़्यादा ज़रूरी था।
अब चंदू ने सलोनी का चौबीस घंटे पीछा करना शुरू कर दिया। उसने देखा कि सलोनी रात गए घर से निकली और बड़ी सड़क पर आते ही चेहरे पर "कैट वुमेन" जैसा नकाब चढ़ा लिया, वह बहुत खूबसूरत लग रही थी, उसका सुडोल और रेशमी बदन उसकी चुस्त लाल क़मीज़ में ग़ज़ब ढा रहा था, और आंखें नकाब के बावजूद चिरागों की तरह चमक रही थीं, उसने निहायत उमदा तरीक़े से ज़ुल्फ़ें दाएं कंधे से आगे सीने पर गिराई हुई थीं जो उसकी छाती के उभार से फिसलकर नीचे कमर तक आ रही थीं। और कमर क्या थी जैसे कोई निहायत क़ीमती कमन शाइस्तगी से तनी हुई हो और उसके नीचे का उतार-चढ़ाव इतना रेशमी था कि नज़र तक फिसल रही थी समझ नहीं आ रहा था नीचे ठहरेगी या चढ़ाई पर रुकेगी। इस पर वह निहायत महारत से कूल्हों को दिल पिघला कर रखने वाले अंदाज़ में हिलती हुई बेफिक्र चली जा रही थी। सड़क पर ज़्यादा ट्रैफिक नहीं थी। इक्का दुका गाड़ियां, कुछ स्कूटर और दो चार साइकिल रिक्शे आ जा रहे थे।
घर से काफ़ी दूर आने के बाद सलोनी एक साइकिल रिक्शा पर सवार हो गई तो चंदू ने भी स्कूटर की रफ़्तार बढ़ा ली। सलोनी का रेडार उसे खबर दे रहा था कि कोई है जो पीछा कर रहा है लेकिन वही सवाल कि कौन? ख़ैर वह हमेशा की तरह अपना वहम समझकर शहर के सबसे बड़े शराब खाने में पहुँच गई। कुछ देर बाद सलोनी शराब खाने से बाहर आई तो उसके पीछे लगभग छः ऊंचे कद काठ और मर्दाना वजाहत वाले नौजवान थे जो बालों के स्टाइल से फौजी मालूम होते थे। वह शराब के नशे में सलोनी की क़ातिल जवानी से लुत्फ़ उठाते हुए एक फौजी गाड़ी में सवार हो गए।
सलोनी उनके दरमियान ऐसे फंसी हुई थी जैसे भेड़ियों के घोल में हिरन फंस जाती तो कोई उसकी गर्दन नोच रहा, कोई उसकी टाँग, कोई बाज़ू, कोई कान, ग़रज़ जहाँ मुँह घुसा वहीं नोच रहा हो, लेकिन सलोनी पर मस्त आँखें बंद किए उन्हें बहकने दे रही थी। चंदू अच्छी तरह जानता था कि अगर सुबह तक रोका नहीं गया तो यह फौजी अफसर फौज के क़ाबिल नहीं रह जाएंगे। उसने स्कूटर की रफ़्तार और तेज़ की लेकिन फौजी गाड़ी छावनी की हदों में दाखिल हो गई और नाके पर चंदू को ID कार्ड दिखाने के लिए रोक लिया गया। तब तक वह फौजी गाड़ी मंज़र से ग़ायब हो गई।
चंदू काफ़ी देर तलाश करता रहा लेकिन कुछ हाथ नहीं आया। वह सीधा छावनी से बाहर जाने वाली बड़ी सड़क पर आकर रुक गया। उसे पता था सलोनी यहीं से गुजरेगी। वही हुआ आधी रात गुजर जाने पर उसे कोई दूर से आता दिखाई दिया, चंदू ने हेलमेट पहन रखा था और उसने ही फ्लर्ट करते हुए लिफ्ट पेश की जो सलोनी ने दिलकश मुस्कराहट से क़बूल की। वह पीछे बैठते ही चंदू के साथ जानबूझकर लिपटकर बैठी कि उसका ईमान भी ढोले और वह किसी वीराने की तरफ़ चल निकले। अगरचे सलोनी की गर्म साँसें, नरम और दहकता हुआ खुशबूदार जिस्म चंदू की पीठ पर उसका मूड बनाने के लिए काफ़ी था लेकिन चंदू मज़बूत बना रहा, सलोनी उसी शराब खाने की तरफ़ चलने को कह रही थी। चंदू ने वहाँ सलोनी को उतारा तो सलोनी हैरान थी कियह कैसा मर्द है जो मेरी लज़ीज़ तरीन दावत पर भी नहीं बहका वह हैरत से उसे दूर तक जाता देखती रही। अगली सुबह शहर में कोहराम मचा हुआ था कि इस बार छः नौजवान फौजी अफसरों को अकेली नकाबपोश़ हसीना मुकम्मल नचोड़ कर छावनी के बीचों-बीच से फ़रार हो गई।
चंदू शाम को शहर के मशहूर मूर्ती बेचने वाले के पास पहुँच चुका था। यह एक बूढ़ा आदमी था जिसकी लंबी लंबी ज़ुल्फें चेहरे के आगे तक फैली हुई थीं और मोटा चश्मा लगाकर आँखें उसके पीछे ढाँप रखी थीं। चंदू उस्से ग्राहक बनकर मिला, और उसे इंसान नुमा मादा भेड़िये की मूर्ती बनाने का ऑर्डर दिया ! जिसे सुनकर बूढ़ा काफ़ी चौंका था और चंदू से उल्टे सीधे सवाल जवाब करने लगा। चंदू का तीर निशाने पर लगा था और उसे काफ़ी हद तक उसका जवाब मिल चुका था। यह प्रोफेसर अमरनाथ ही था जो रूप बदलकर मूर्ती फ़रोश बन चुका था। वह बीस साल पहले वाले 7 साल के चंदू को क़ज़ील जवानी में पहचान नहीं सका था। उसके चौंकने पर चंदू ने खुलकर बात करने का इरादा किया।
और उसे माज़ी के झरोखों में ले जाकर पूछा कि तुम्हारी जिनज़ाद बीवी और मादा भेड़िये से पैदा होने वाली औलाद सलोनी ही है ना? बूढ़ा स्टप्टा कर रह गया और उसे फॉरन वहाँ से चले जाने का कहा। इस पर चंदू ने सलोनी की हरकतों की सारी तफ़सील बूढ़े के गोश गुज़ार की और उसे बताया कि हमें मिलकर सलोनी को इस क़ैद से निजात दिलानी चाहिए वरना शहर में तबाही फैल जाएगी और तुम अपनी औलाद की मोहब्बत में इस तबाही के ज़िम्मेदार ठहरोगे।
इस पर बूढ़ा ग़ुस्से से चीखता हुआ बोला कि अमन दास अपने धर्म का भंगोड़ा होकर अमन दास से उमर बन गया था और किसी मुस्लिम स्कॉलर अली की बातों में आकर मेरे खानदान की जान का दुश्मन बन गया था। और मैंने उसकी आई ड्रॉप्स में तेज़ाब मिलाकर उसकी सिर्फ़ बीनाई छीनी थी जान बख्श दी थी। वह चंदू की कोई बात नहीं सुनना चाहता था। जब वह टस से मस नहीं हुआ तो चंदू ने सलोनी से डायरेक्ट बात करने का इरादा किया और उसके घर की तरफ़ चल पड़ा।
चंदू उन्ही सोचों और ख्यालों में सलोनी के घर की तरफ़ जा रहा था कि अचानक उसके ज़हन में मुस्लिम स्कॉलर अली का किरदार आ गया कि यह बंदा कौन है और उसके बाप अमन दास ने मज़हब बदलकर अपना नाम उमर कब रखा? उसके ज़हन में अमन दास का वह आख़िरी पन्ना घूम गया जिसमें इस प्रजाति से छुटकारे का रूहानी इलाज का ज़िक्र था। वह फ़ोरन घर आया और अपने बाप की वसीयत वाली फ़ाइल में मौजूद वह बंद लिफ़ाफ़ा खोला जिसके बारे में अमन दास ने कहा था कि इस लिफ़ाफ़े में उसकी ज़िंदगी की कुल कमाई बंद है। चंदू को तब लगा था शायद वह कोई प्रॉपर्टी के क़ागज़ात होंगे। उसे रुपये पैसे में कोई दिलचस्पी नहीं थी तो यह सोचकर साइड पर रख दिया कि कभी ज़रूरत पड़ी तो इस्को इस्तेमाल कर लूंगा।
अब उसने काँपते हाथों से वह लिफ़ाफ़ा खोला तो उसमें बड़ी तरतीब से नफ़ीस क़ागज़ के कुछ टुकड़े थे जिन पर उसके बाप की लिखाई नहीं थी लेकिन लिखवाया उसके बाप ने ही था।उसमें अस्सलमु अलैकुम से शुरू करके अपने मज़हब की तब्दीली और नाम का हलफ़ उठाया था, और अपने महसिन स्कॉलर अली के लिए इज़हार-ए-शुक्र के कुछ कलाम लिखवाए थे, किसी और की लिखाई से यह बात तो ज़ाहिर थी कि यह अमन दास यानी उमर ने बीनाई छिन जाने के बाद अपने आख़िरी दिनों में तहरीर करवाया था।
फिर वह चंदू से मुखातिब हुआ और अपना यह राज़ उसे खो देने के डर से न बता सकने पर शर्मिंदगी का इज़हार किया। और अपनी तहक़ीक़ के पुराने साथी, दोस्त और मुआविन अमरनाथ की उसके मज़हब बदलने पर बेवफ़ाई और बग़ावत का बड़ी तफ़सील से लिखवाया और कैसे आँख में डालने वाले ड्रॉप में तेज़ाब डालकर अमन दास को रस्ते से हटाकर अमरनाथ ने अपनी बे-औलादी वाली महरूमी पूरी करने के लिए यह शैतानी अमल किया। इस सारे अमल की तफ़सील वहाँ दर्ज थी जो उनके मज़हब की कदीम रिवायत में एक जादूई मंतर जन्तर के ज़रिए परवान चढ़ाया गया। चूँकि उनका मज़हब कदीमतरीन था तो इस ज़माने में जिनज़ाद, आदमज़ाद और दूसरी प्रजातियोँ का रोज़-मर्रा की ज़िंदगी में आमना सामना होना अचंभे की बात नहीं थी।
उस समय के मज़हबी पेशवाओं ने यह सारे अमल अपने बाहमी रिश्तों और नसल को आगे बढ़ाने के लिए जिनज़ादों की मदद से तैयार किए थे। लेकिन इस अमल के नतीजे में पैदा होने वाली प्रजाति की आदतों को दुनिया में मौजूद सब के लिए खतरे का बाइस बन सकती थीं। और उस समय में इसका कोई तोड़ भी मौजूद नहीं था तो किसी भी जिनज़ाद या आदमज़ाद को यह सब करने की जुर्रत नहीं हुई। और यूँ यह अमल खाक-दर-खाक दफ़न हो गए लेकिन आज हज़ारों साल बाद अमरनाथ और अमन दास ने यह खोज निकाले थे।
लेकिन अमन दास ने उनके साथ लिखी चेतावनीयों पर अमरनाथ की मुखालिफत की और इस पैदा होने वाली प्रजाति को शांत कैसे करना है वह तरीका ढूंढने का मशवरा दिया। अमरनाथ यहाँ तक तो राज़ी था लेकिन जब आख़िर में उसकी काट के दौरान उसकी ज़िंदगी को खतरे वाली बात सामने आने पर अमरनाथ बग़ावत कर गया और धोखे से अमन दास को अंधा करके ग़ायब हो गया। अमन दास को यह तक मालूम नहीं था कि नई पैदा होने वाली प्रजाति लिंग के हिसाब से औरत थी या मर्द।
फिर अमन दास ने स्कॉलर अली से मुलाकात का क़िस्सा बयान करते हुए लिखा था कि वह अपने मज़हब पर तहक़ीक़ करने वाला बहुत माहिर और क़ाबिल मुहक़िक़ था। और वह भी इन अमलों को पता लगा चुका था और उसकी रूहानी ताक़तों ने उसके तक यह खबर पहुँचा दी थी कि यह शैतानी अमल किया जा चुका है और बनी नौ और जिनज़ाद खतरे में हैं। लेकिन स्कॉलर अली ने छोटी सी मुस्कराहट के साथ इस मसले का हल बताकर यह वाज़ेह कर दिया कि नवीनतम और ख़ालिस मज़हब में होने वाले तमाम शैतानी अमलों का तोड़ मौजूद है। फिर उसने कई साल अमन दास को क़ुरआन शरीफ़ में मौजूद पोशीदा (छुपे हुए ) रूहानी इलाज हदीस की रोशनी में बताए जो बहुत आसान और मुकम्मल तोड़ हैं। इनमें सिर्फ़ बावुज़ू रहना है, नमाज़ की पाबंदी करनी है और कुछ क़ुरआनी आयतों को विरद पाकी की हालत में करते रहने का साफ इशारा है जिसे आसान अल्फ़ाज़ में ज़िक्र कहते हैं। इन ज़िक्र अज़कार से पाक रूहानी ताक़तें मोमिन की हर तरफ़ से अपने हिसार में लेकर हिफ़ाज़त करती हैं।
अब अमन दास की अक्ल में बात आ गई थी कि वक्त के साथ साथ मज़हब में तब्दीलियां आती गई और नबी आख़िर-उज़-ज़मान ने दीन मुकम्मल करके इस पर मुहर-ए-तस्दीक लगा दी कि इंसान की ज़िंदगी गुज़ारने का सब से नवीनतम और मुकम्मल ज़ाब्ता- ए-हयात इस्लाम में ही मौजूद है।
अब करना यह था कि अमरनाथ से सलोनी को जनम देने वाली मुर्दा भेड़िया का जिस्म दरकार था और साथ अमरनाथ उसकी जिनज़ाद बीवी और सलोनी को काबू रखना था ताकि इस शैतानी अमल की काट की जा सके। चंदू ने स्कॉलर अली का पता ढूंढकर उनसे मदद की अपील की तो वह खुले दिल से साथ हो लिए और चंदू को दावत-ए-इस्लाम भी दे डाली जो उसने फ़िलफ़ोर कुबूल कर ली, उन्होंने उसको वुज़ू बनाना सिखाया और उसका इस्लामी नाम हम्ज़ा रखा ।
अब हम्ज़ा स्कॉलर अली के साथ ईमान की दौलत से माला-माल होकर स्कॉलर अली के साथ ज़िक्र-ओ-अज़कार करता हुआ सलोनी के घर पहुँच चुका था जहाँ सलोनी ने हम्ज़ा को देखते ही उसके बदन की महक से पहचान लिया कि उस दिन स्कूटर पर कौन था। लेकिन चूँकि वह हवस ज़दा और शहवत से भरे हुए शैतान मर्दों का ख़ून उनके ज़िंदा होते हुए पी चुकी थी तो उनकी बातिल रूहों की ख़सलतें सलोनी में आ गईं थीं और उसकी रूह में मौजूद नेक़ ख़सलतें ईमान की ग़ैर-मौजूदगी में दबती चली गईं और वह आज फिर हम्ज़ा को देखकर शहवत से भर गई और उसकी आँखों में हवस छलकने लगी। वह अपनी निस्वानी अदाओं से हम्ज़ा को माइल करने लगी। पहले उसने शर्ट का ऊपरी बटन खोलकर मर्द की सब से बड़ी कमज़ोरी की झलक पेश की। फिर वह अपनी रेशमी टांग से जांघों तक कपड़ा हटाकर हम्ज़ा को और इम्तिहानों में डालने लगी।
साथ वह ख़ुमार ज़दा, रस घोलती मस्त और सुरीली आवाज़ से उसका पुराना नाम पुकार कर आओ ना, मुझे प्यार करो ना, मैं तुम्हारे लिए तड़प रही हूँ जैसे पत्थर पिघलाने वाले जुमले अदा कर रही थी। इससे पहले कि वह कोई और वार करती हम्ज़ा ने अमरनाथ का पूछा और सलोनी को एक-एक करके सारी तफ़सील एक ही साँस में बता दी। इस पर सलोनी रोने लगी कि मैं अपनी मौजूदा हालत से खुश नहीं हूँ और न मैं ऐसी हूँ, वह अपनी इसी हालत में ज़मीर पर बहुत मलामत और ला-अनत का इज़हार कर रही थी। फिर उसने ख़ुद पर बीतने वाली दास्तान सुनाई कि कैसे पंडित कृष्णा उस पर बुरी नज़र रखे हुए था और उस दिन स्टाफ़ रूम में उसने सलोनी को बे-लिबास करके उसकी इज़्ज़त पर हाथ डाला तो सलोनी ग़ुस्से और परेशानी में घिरा गई और उसके अंदर का भेड़िया जाग गया जिसने पंडित की गर्दन से पकड़कर सारा ख़ून पीने के बाद अपने भारी पंजों से पंडित की सारी हड्डियाँ चूर-चूर कर के इंसानी जिस्म का कम्बल बना डाला।
जब पंडित अन्जाम से दो चार हो चुका तो फिर सलोनी इंसानी रूप में वापस आई और उसने किसी सख्त औरत की तरह उस इंसानी लाश के कम्बल को गोल करके अलमारी में संभाल कर रख दिया। लेकिन उसका शहवत ज़दा ज़िंदा ख़ून उसकी रूह की गंदगी समेत सलोनी की रूह में जज़्ब हो गया और यूँ सलोनी का दूसरा सेक्सी किरदार सामने आया जो उसका इंसानी पहलू था, यूँ वह इंसानी शहवत की आग बुझाने के लिए जिन्नाती एतबार से दिमाग़ पर चढ़ने वाली ताक़त इस्तेमाल करती और इस गंदगी के रास्ते पर चल निकली। लेकिन जो बा-असर लोग उसकी ज़हीरी ख़ूबसूरती देख उसे खिलौना बनाकर जबरदस्ती नोचने की कोशिश करते सलोनी के अंदर का दरिंदा उनका कम्बल बनाकर रख देता।
अब इसका एक हल तो यह था कि नेक़ रूह वालों का ख़ून चूसती और अपने शहवत पर क़ाबू पा लेती लेकिन शहवत पर क़ाबू वाले लोग गिनती में थे जो कुछ इक्के दुक्के थे उनकी जान भी लेकर सलोनी ज़मीर पर बोझ नहीं डालना चाहती थी। अब स्कॉलर अली ने सलोनी को तसल्ली दी और उसे कहा तुम्हारी माँ से कहो वह सामने आए मुझे पता है वह यहीं है वरना मैं उसे अपनी रूहानी ताक़तों के बल पर जकड़ लूँगा। सलोनी ने माँ को इशारे से बुलाया तो स्कॉलर अली ने दोनों माँ-बेटी को सादा-सा हल बताया कि इस काले इल्म के ज़रिए सलोनी को जनम देने वाली भेड़िया माँ के जिस्म के बाक़ीयात को ताज़े-ताज़े पानी से धोकर सूरह معوذتین का विर्द करते हुए आग बुर्द कर के यह अमल टूट जाएगा और अगर सलोनी को कुछ नहीं हुआ तो उसकी यह भेड़िया क्वालिटी भी ख़त्म हो जाएगी, और ख़ून की प्यास न होने की वजह से किसी की गंदी ख़सलतें भी सलोनी में सरायत नहीं कर सकेंगी।
इतने में अमर-नाथ नमूदार हुआ और स्कॉलर अली के गले लगकर रोने लगा कि मुझे माफ़ कर दो मैं तुम्हें गलत समझा मैंने तुम्हारी तालीमात की खोज और तहक़ीक़ किए बिना क़दीम उलूम का परचार जारी रखा और मेरी वजह से यह सब कुछ हुआ। इसके साथ-साथ वह सलोनी और हम्ज़ा से भी माफ़ी मांगता रहा।
तब एक रोशनी का हुलिया सा नुमूदार हुआ और इसमें से सरगोशियों सी आवाज़ नमूदार हुई कि मैं अमरनाथ के प्रेम में पागल थी इसलिए इसका साथ दिया वरना इसके साथी जिनज़ादों ने भी चेतावनी दी थी।
सलोनी की माँ उसी वक्त अल्लाह की वहदत और आख़िरी नुबुव्वत की गवाही देते हुए मुसलमान हो गई और उसने अज़ीम अल्फ़ाज़ अदा किए कि कोई भी दुनियावी मोहब्बत अक़ीदे या ईमान से ऊंची नहीं हो सकती और अगर इसके ऊंचे हो जाने का खतरा महसूस हो तो ऐसी मोहब्बत तर्क कर दो, वह घाटे का सूदा ठहरेगी।
अमरनाथ और सलोनी भी ईमान की शमा से रूहें मुनव्वर कर के बावुज़ू होकर आए।
अमरनाथ अपना नाम अब्दुल्लाह और सलोनी का नाम मरियम रख दिया। लेकिन मरियम की शहवत ब-दस्तूर बरक़रार थी और वह हम्ज़ा को खा जाने वाली नज़रों से देख रही थी।
वह जल्दी-जल्दी घर की ज़रीन के खाने में गए वहाँ ज़रीन खाने में मौजूद एक सन्दूक खोला तो इसमें बोसीदा खाल में सिकुड़ी हुई हड्डियों के साथ मुर्दा भेड़िये की लाश थी जिसके पेट में मरियम या सलोनी का बीज परवान चड़ाया गया था।
अब इस लाश को ताज़े पानी से विर्द करते करते धोया गया, नागवार बदबू से सब का बुरा हाल था फिर सूखी लकड़ियों का ढेर आग बंदन में लगाकर सूरह معوذتین के विर्द में इस भेड़िये की लाश को जला दिया गया, लाश के जलकर ख़त्म होते ही मरियम भी गिरकर बेहोश हो गई, जिस पर अब्दुल्लाह और उसकी जिनज़ाद बीवी रोने लगे, लेकिन स्कॉलर अली ने अल्लाह के हुज़ूर दुआ फरमाई और मरियम की ज़िंदगी और सेहत की इल्तिजा रखी। साथ वह अपना मख़सूस ज़िक्र करते रहे जैसे-जैसे वक्त गुज़रता गया मरियम के चेहरे पर अबर आने वाले नीलगोण नसें मदहम होती गईं, उसने एक लंबी साँस झटके से अंदर खींची और हड़बड़ाकर उठ बैठी। लेकिन अब भी वो हवास पर क़ायम और अपने रख-रखाव में थी। शहवत और हवस का वह शैतानी बुख़ार उतर चुका था और वह हम्ज़ा को देखकर शरमाने लगी, हम्ज़ा ने भी सुकून का साँस लिया। सब ने मिलकर अल्लाह का शुक्र अदा किया।
अली और हम्ज़ा मुस्कराते हुए वहाँ से रुख़सत हुए। कुछ दिन बाद अब्दुल्लाह हम्ज़ा से मिलने उसके घर आया उसकेमरहूम बाप उमर को याद करके देर तक रोता रहा और माफ़ी मांगता रहा। और जाते हुए मरियम को क़बूल करने की तजवीज़ रख गया। हम्ज़ा ने मरियम की मंकिरी के ज़माने की सब बातें बलाए ताक़ रखकर निकाह की हामी भर ली और बहुत अज़मत वाले जुमले कहे। कि जब ईमान लाने पर या तौबा करने पर बिला-शक व-शुबा अल्लाह सब कुछ माफ़ करता है तो मेरी क्या औक़ात है कि मैं ख़ालिक की रज़ा के ख़िलाफ़ नहीं जाऊँगा ।