पागल औरत का राज़-पहला पार्ट

माजे छोटे चौधरी को उठाओ वक़्त गुज़रता जा रहा है, आज खेतों में पनी लगाने की हमारी वारी है ! चौधरी कादर ने अपने खास अंदाज़ मे अपने बेटे को याद दिलाया, "चलो बेटा, समय बीत रहा है, आज हमें खेतों में पानी देना है।" चौधरी कादर की पत्नी ने सुना और चिल्लाने लगी, "नहीं, मेरे बेटे को मत जाने दो, आज वह खेतों में पानी देने जा रहा है।"

पागल औरत का राज़ 

पागल औरत का राज़

चौधरी जावेद, जिसे सब छोटा चौधरी कहते थे, अपने पिता की इकलौती संतान था। वह एक अच्छा और सुंदर नौ जवान था, जो 22 साल का था। चौधरी कादर अपने बेटे को खेतों में पानी देने के लिए तैयार करने लगे।

चौधरी कादर की पत्नी ने अपने बेटे को रोकने के लिए कहा, "बेटा, तुम्हें आज खेतों में नहीं जाना चाहिए। आज गुरुवार है और तुम्हारे लिए यह दिन शुभ नहीं है। तुम्हारी यह शोखा 24 घंटे खुशबू लगाए रहता है और ऊपर से तुम पीपल वाली जमीन पर जा रहे हो।"

चौधरी कादर ने अपने बेटे को आश्वस्त किया, "बेटा, तुम्हें चिंता नहीं करनी चाहिए। मैं तुम्हारे साथ हूँ और तुम्हारी सुरक्षा के लिए मैं कुछ भी करूँगा।" चौधरी जावेद ने अपने पिता की बात सुनी और खेतों में पानी देने के लिए तैयार हो गया।

चौधरानी ने अपने पति को रोकने के लिए कहा, "नहीं, मेरे बेटे को मत जाने दो, रात हो जाएगी  वहां  और वहाँ कोई नहीं होगा। मैं अपने बेटे को नहीं जाने दूंगी।"

चौधरी जावेद ने अपनी माँ को समझाने की कोशिश की, "अम्मा, आप मेरी माँ हैं इसलिए आप परेशान होती हैं। माजा और मैं पानी लगा कर अभी आ जाएंगे। पीपल वाली जमीन का नाम सुन कर आप इतनी परेशान हो जाती हैं। वह कमली वहाँ घूमती रहती है, उसे तो अपना होश नहीं है।"

चौधरानी ने परेशानी में कुछ कहना चाहा, लेकिन जावेद ने हंस कर उन्हें चुप करा दिया। "अम्मा, लोगों का क्या है? वे तो बस बातें बनाते रहते हैं।"

माजे ने पानी लगाने के लिए ज़रूरी समान लिया आई और वह दोनों चौधरीऔर चौधरानी को सलाम कर के खेतों की ओर चल पड़े।
ज़मीनों में आम तौर पर कीकर या शीशम के पेड़ होते हैं, लेकिन चौधरी की ज़मीन पर एक बड़ा पीपल का पेड़ था।

एक बार ऐसा हुआ कि कुम्हारों की जवान लड़की घर से गायब हो गई। सब गांव वाले उसे ढूंढते ढूंढते जब पीपल के पेड़ के पास गए तो उसे अजीब हालत में पाया।

उसे कोई होश नहीं था, बाल बिखरे हुए थे, आंखें लाल थीं और सांसें इतनी तेज चल रही थीं जैसे कि वह अभी कहीं से लंबा सफर तय कर के आई हो।

बेहोशी की हालत में उसे घर लाया गया और मौलवी साहब को बुलाकर दम द्रोड़ कराया गया। लेकिन अब ऐसा अक्सर होने लगा था कि वो लड़की रात को अचानक से गायब हो जाती थी और सुबह पीपल के पेड़ के नीचे से बेहोशी की हालत में मिलती थी।

कुम्हार अल्लाह रख्खा बेचारा एक गरीब आदमी था। उसकी गरीबी उसे मौका ही नहीं देती थी कि लड़की को शहर के किसी अस्पताल से चेक कराया जाए या उसे किसी अच्छे पीर बाबा से दम द्रोड़ कराया जाए।

गांव के मौलवी के दम द्रोड़ का लड़की पर कोई असर नहीं हो रहा था। उल्टा हालत रोज-ब-रोज बिगड़ती जा रही थी। पहले जहां वह हफ्ते में एक-आध बार जिन्नी  कैफ़ियत  में मुब्तला होती थी, अब तो अक्सर उसी हालत में पीपल के पेड़ के नीचे पाई जाती थी।

बेचारे अल्लाह रख्खे ने अब उसे उसकी हालत पर छोड़ दिया था। बस अगर वह शाम को घर न होती तो जाकर उसे पीपल वाले पेड़ के पास से ले आता।

लड़की ने तो गोया पीपल वाले पेड़ को अपना घर ही बना लिया था। चौधरी जावेद और माजा खेतों में पहुंच कर अपना पानी बांध चुके थे।

"माजा, जाओ और देखो कि कुम्हारों की लड़की पीपल के नीचे है या नहीं।" जावेद ने माजा को चिढ़ाने के अंदाज में कहा, तो माजा का रंग ही उड़ गया।

"ओह, चौधरी जी, दुआ मांगो अल्लाह से कि वह आज इधर न हो। आज जुमेरात भी है, याद रखो। मैंने बड़े बड़े लोगों से सुना है कि जुमेरात को  उन हवाई मखलूक़ के लिए बड़ा दिन होता है, और इंसानों को इस रात बाहर ऐसे नहीं घूमना चाहिए। बाकी अल्लाह बेहतर जानता है।"

"ओह, तुम आज मुझे आलिम क्यों लग रहे हो?" जावेद ने हंसते हुए कहा। "वह देखो, तुम्हारे पीछे क्या खड़ा है?"
माजा ऐसे उछला जैसे उसका पैर सांप पर आ गया हो। "चौधरी जी, अल्लाह के वास्ते मेरे साथ ऐसे मजाक न करो। मेरी जान निकल जाती है।"

"ओह, अभी तो मग़रिब की अज़ान हो रही है और तुम आधी रात की तरह डर रहे हो। मर्द बनो, मर्द। तुम्हारी शादी हो गई है, तुम्हारी बीवी का ख्याल कैसे रखोगे?"

वह दोनों ऐसे बातें करते करते पीपल की ओर चल पड़े। माजा जो आगे चल रहा था, अब रुक कर जावेद के पीछे हो गया था। ठंडी हवा चल रही थी, पीपल के पत्ते गोया हवा में झूम रहे थे। हल्के अंधेरे में पीपल का यह पेड़ किसी बदमस्त हाथी के जैसे लग रहा था। पेड़ काफी पुराना और इसका तना काफी बड़ा था।

पेड़ के नीचे सूखे पत्तों के छोटे-छोटे ढेर लगे हुए थे, जैसे कि अभी गांव के बच्चे खेल के गए हों। हवा के झोंकों से सूखे पत्तों में अजीब सी सरसराहट हो रही थी।
माजा तो इधर-उधर ऐसे देख रहा था, जैसे कि अगर कमली जमीन के नीचे भी छिपी होगी, तो वह उसे देख लेगा।
"माजे, डर नहीं, अल्लाह हिफाज़त करेगा," जावेद ने उसे तसल्ली  देते हुए कहा। "और अगर वह रात को यहां आ गई, तो?"

माजे ने धीमी सी आवाज में जवाब दिया, जैसे कि उसे डर हो कि कमली अपना नाम सुनकर कहीं से आ ही न जाए।

"ओह, माजे, देखो कितना शांति है यहां, लोग ऐसे ही डरे हुए हैं इस पेड़ से। चल, हाथ धो और कपड़ा बिछा, बड़े जोरों की भूख लगी है। देखो, चौधरानी जी ने क्या बना के दिया है। बकरे का गोश्त है जी। मैं खुद राने कसाई से ले आया था दोपहर में। वह बड़ा दो नंबर आदमी है, सारी हड्डियां दे दी होंगी , न जी। मैं ने खुद उसके ऊपर खड़ा होकर गोश्त बनवाया था।"

माजा पहली बार सीना चौड़ा कर के बोला, "चल, कपड़ा बिछा जा ।" जावेद ने उसके हाथ से गठरी लेते हुए कहा, "चल, कपड़ा बिछा जा।"

माजे ने एक बड़ी चादर नुमा कपड़े को खोल कर नीचे बिछाया। वह दोनों इस पर बैठ गए और रोटियों वाला रुमाल  खोलने लगे। जैसे-जैसे कपड़ा खुल रहा था, खाने की खुशबू बाहर आना शुरू हो गई थी।

"वाह, बड़े मज़े का लग रहा है!" जावेद ने हुलकारा मारते हुए कहा।
"मज़े का क्यों नहीं होगा जी, चौधरानी बीबी ने अपने हाथों से बनाया है!" माजे ने कहा।
"चोटे चौधरी, आप को एक बात बोलूं?" माजे ने कहा।

"बोल, बोल, सब बोल दे!" जावेद ने क़हकहे लागते हुए कहा।

"चौधरानी बीबी आप को बहुत प्यार करती हैं! आप उनकी इकलौती औलाद हो न! उन्होंने बड़ी मिनतों से दुआओं से अल्लाह से मांगा है तुम को इसका ख्याल रखना चाहिए।" माजे ने कहा।

"ओए, बेवकूफ!" जावेद ने कहा।

"बंदे की जिंदगी से जब मां-बाप चले जाते हैं न, तो जिंदगी कड़ी धूप की तरह बन जाती है। इंसान सर से लेकर पांव तक जलता रहता है। मां-बाप तो अल्लाह ताला की बड़ी रहमतों में से एक रहमत हैं।"
माजे ने जोर से कहा, "और तू बता, फिर मेरा ख्याल तो करता है या मैं तेरा अब की बार?" माजे ने जोर से कहकहा लगाया और जावेद भी हंस पड़ा।

कमली की जुनूनी कैफ़ियत 

अंधेरा अब काफी हो गया था। गांव के कुत्ते गीदड़ों की आवाजों पर भौंकना शुरू हो गए थे। दोनों बड़े सुकून से खाना खाने में मस्रूफ थे। कि अचानक उन्हें पीपल के पेड़ की दूसरी तरफ से सूखे पत्तों की चरचराहट सुनाई दी, जैसे कि कोई तेज कदमों से उनकी तरफ आ रहा हो, लेकिन पेड़ के बड़े तने की वजह से वे उसे नहीं देख पा रहे थे।

माजा तो खिसक कर जावेद के करीब हो गया था। अंधेरे की वजह से वे ज्यादा दूर नहीं देख सकते थे। माजे ने कहा, "जावेद, टार्च लाइट जलाओ और देखो कौन है वहां।"

कदमों की आवाज तने की दूसरी तरफ रुक गई थी। जावेद ने जोर से कहा, "कौन है भाई? रुक क्यों गए हो? यहां आओ।" लेकिन वहां से कोई आवाज नहीं आई, गोया वहां कोई हो ही नहीं।

माजे ने कहा, "देखो, कौन है वहां? रोशनी करो।" माजा आगे बढ़ने की बजाय टार्च लाइट से देखने की कोशिश कर रहा था। जावेद अभी भी खाना खाने में मस्रूफ था, लेकिन उसकी नज़रें मुसलसल दूसरी तरफ थीं।

जैसे ही माजा आगे बढ़ा और रोशनी दूसरी तरफ डाली, जैसे ही माजे ने आगे का मंजर देखा, जोर से चिल्लाया, "चोटे चौधरी!" लेकिन उसकी आवाज अगले शब्दों तक बिल्कुल दब गई और वह घिगियाने के अंदाज में बोला, "ककककक.. म्मम.. लली।"

जावेद ने माजे को पीछे खींचा और उसके कांपते हाथों से टार्च लाइट अपने हाथों में ली और वहां रोशनी डाली जहां अभी तक वह नहीं देख सका था।

जैसे ही टार्च लाइट की रोशनी वहां पड़ी, जहां माजे के अनुसार कमली थी, जावेद की अपनी सांसें ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गईं। जावेद कोई बुज़दिल जवान नहीं था, और न ही वह पहली बार खेतों को पानी लगाने आया था। इससे पहले वह कई बार अकेले में पानी लगाने आया था।

उसी पीपल के नीचे बैठकर अपना समय गुजारता था। अपनी जमीनों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ था । इन्हीं जमीनों पर आते-जाते तो वह जवान हुआ था। यह भी इत्तेफाक़ की बात है कि जब से कमली पर जिन्नी  कैफ़ियत तारी हुई थी, उसने उसे नहीं देखा था।
कमली तो गांव के लोगों ने उसका नाम रखा था, वरना तो उसका असली नाम रानी था।

वह जिस रानी से वाकिफ था, वह तो जवान खूबरु हसीन लड़की  थी। भले बेचारी सादे कपड़े पहनती थी, मगर उसका हुस्न महंगे कपड़ों का मोहताज नहीं था।
लेकिन अब जो वह देख रहा था, वहां एक लड़की सर अपनी टांगों में दबाए बैठी थी। सफेद रंग के कपड़े काफी मैले हो गए थे, जो उसकी पुर असीरत को और बढ़ा रहे थे। उसके लंबे काले बाल जमीन को छू रहे थे, और वह मुसलसल रोए जा रही थी। काफी खोफनाक मंजर था।

वह जीवन में पहली बार ऐसे अनुभव से गुजर रहा था। अभी वह बड़े गौर से उसे देख ही रहा था, कि अचानक उस लड़की ने सर ऊपर उठाया और जोर से कहकहा लगाया, कि जावेद बेहोश होते होते बचा।

पहली बार उसने उसका चेहरा उस जनूनी हालत में देखा। वह रानी थी, जो अब कमली बन चुकी थी। पीला चेहरा, आलू की तरह घूमती, मगर लाल आंखें, सांसों की बेतरतीबी बता रही थीं, कि वह किसी अनदेखी मखलूक के ज़ेरे असर  है।

माजे ने यकीनन उसका चेहरा नहीं देखा था, वरना वह बेहोश हो चुका होता। इतने में कमली ने हाथ जमीन पर टेके और खड़े होकर चलने की कोशिश करने लगी, जैसे तीन साल का बच्चा लड़खड़ा कर चलता है, वैसे वह चल रही थी। दो कदम चलकर वह तने के पीछे से निकलकर सामने आ गई थी।

यकीनन माजे ने अब उसे देख लिया था, जो वह पीछे हटते हुए चीखकर बोला, "चोटे चौधरी, भागो भागो भागो! यह कमली है! भागो!"

वह मुसलसल लढ़खढ़ा कर चल रही थी, और उसकी तरफ बढ़ रही थी। सूखे पत्ते बार-बार उसके पैर के नीचे चटक रहे थे और माहौल को और भी ज़्यादा भयानक बना रहे थे।

अचानक उसका लागर लढ़खढ़ाता हुआ जिस्म हवा में उठ गया और वह जोर-जोर से रोने लग गई। उसके काले बाल हवा में लहरा रहे थे। यह वह मंजर था जिसे माजा देखकर चिल्लाते हुए बेहोश होकर जमीन पर गिर गया था।

रोने की आवाज बिल्लियों के गरजने में बदल गई थी, जैसे कि कई बिल्लियां आपस में लड़ रही हों। और यह शोर बढ़ता ही जा रहा था। हवा भी तेज हो गई थी, जिससे पीपल के सूखे पत्ते तेजी से नीचे गिरने लगे थे।

अब इसमें कोई शक नहीं रह गया था कि रानी किसी "प्राकृतिक नियमों से परे" किसी विचित्र चीज की कैद में थी  है। वह मजबूत आसाब (जिस्म हाथ पैर)का मालिक था, मगर धीरे-धीरे उसके आसाब  भी जवाब दे रहे थे। उसे खुद को मजबूत रखना था, अपने लिए और माजे के लिए। वरना यह रात उन दोनों के लिए आखिरी रात भी साबित हो सकती थी।

इस सारी स्थिति में वह खुद को किसी अनदेखे हिसार में जकड़ा हुआ महसूस कर रहा था। उसके हाथ और टांगें जैसे किसी ने बांध दिए हों। जुबान गूंगी हो गई थी। बिल्लियों के लड़ने की आवाज जैसे-जैसे बढ़ रही थी, वैसे-वैसे वह होश खो रहा था।

उधर उतना ही रानी का जिस्म पीपल के ऊपर घूम रहा था। कहते हैं जब इंसान मुश्किल में होता है, तो या तो दुआ काम आती है, चाहे अपनी हो या किसी दूसरे की, या फिर किस्मत।