पागल औरत का राज़ । hindi kahani

 इतने में चारों ओर से एक बार फिर बिल्लियों की गरजने की आवाजें आने लगीं। और आस-पास से सैकड़ों बिल्लियाँ खेतों से निकलकर पेड़ के नीचे इकट्ठा हो गईं। इन बिल्लियों का आकार और रूप सामान्य बिल्लियों से कुछ अलग था। देखते ही देखते वहाँ पर तिल धरने को जगह भी नहीं बची थी। लेकिन किसी भी बिल्ली ने अभी तक दायरे की रेखा को पार नहीं किया था। वह इंतज़ार कर रही थीं कि अब आलिम बाबा किस रूप में आते हैं। लेकिन पेड़ के दूसरी तरफ पूरी तरह से खामोशी थी। काफी देर तक बिल्लियाँ बैठकर गरजती रहीं, और आखिरकार जहाँ से आई थीं, वापस खेतों में खो गईं।

पागल औरत का राज़ । hindi kahani 


बिल्लियों के जाते ही जावेद ने सुकून की सांस ली। अभी तक वह यह नाटक देख रहा था, लेकिन न तो भेड़िए ने और न ही बिल्लियों ने उस पर हमला किया था। आंधी रुक चुकी थी, लेकिन पीपल का पेड़ अब भी अदृश्य तूफान का सामना कर रहा था।

इतने में उसे खेतों से सरसराहट की आवाज सुनाई देने लगी। एक बहुत बड़ा काले रंग का अजगर अबकी बार सीधे उसी की तरफ बढ़ रहा था। इतना बड़ा अजगर उसने जिंदगी में पहली बार देखा था। उसके मन में आया कि उठकर खेतों में दौड़ लगा दे, लेकिन आलिम बाबा के शब्द उसे याद थे कि "कुछ हो जाए, इस दायरे से निकलना नहीं है।" 

अजगर सीधे उसके पास आकर खड़ा हो गया। अजगर की विशालता उसकी अपनी विशालता से लगभग चार गुना बड़ी थी। अगर वह मुँह खोल लेता, तो जावेद को पूरा का पूरा निगल सकता था। अजगर ने दायरे का चक्कर लगाया और फुफकारते हुए वापस खेतों में चला गया।

उसके जाते ही एक बार फिर उसे पायल की आवाज सुनाई देने लगी। सामने के रास्ते से एक महिला, सुशोभित दुल्हन के कपड़ों में आ रही थी। महिला अंधेरे में भी चाँद की तरह चमक रही थी, लेकिन उसने अपने चेहरे को नकाब में छिपा रखा था। 

जावेद के करीब आकर उसने नकाब हटा दिया। यह तो कमली थी, जो पूरी तरह से दुल्हन बनी हुई थी। और इतनी खूबसूरत कि उसने पहले कभी इतनी हसीन औरत नहीं देखी थी। वह जावेद को देखकर लगातार मुस्कुरा रही थी। 

"आओ जावेद, हम अपनी दुनिया में चलते हैं। जहाँ कोई नहीं होगा, तुम होंगे, मैं होंगी, और हमारी मोहब्बत।"

"आओ जावेद, आओ। खुद को इस दायरे में कैद न करो। देखो, मैं तुम्हारे लिए सज-धज कर आई हूँ। देर न करो, आओ, आओ, आओ!" वह लगातार उसे बुला रही थी। उसकी आवाज में जादू था, एक तिलिस्म था। उसने महसूस किया कि वह अपना नियंत्रण खो रहा है। वह करीब था कि उठकर उसके पास चला जाता। लेकिन पेड़ के दूसरी तरफ से उसे शेर की एक गरजदार दहाड़ सुनाई दी, जिसने जावेद के उठते हुए कदम रोक दिए। और जावेद इस तिलिस्म से बाहर निकल आया। वह कमली जैसी महिला गुस्से में पांव पटकते हुए पेड़ के दूसरी तरफ चली गई, जहाँ आलिम बाबा गए थे। 

वह गुस्से में चिल्ला रही थी, "तुम क्या समझते हो? तुम यहाँ से जिंदा निकल जाओगे? तुम रानी को आज़ाद कर लोगे? मैं तुम दोनों को जिंदा जला दूंगी!" उसकी आवाज में एक खरक पन था, जिससे जावेद को अपने कानों में दर्द महसूस हो रहा था।

इतने में पीपल का पेड़ इतनी जोर से हिला जैसे अभी गिर जाएगा। पेड़ की जड़ें तक जमीन से उखड़ रही थीं। उसे लगा कि पेड़ उन दोनों के ऊपर गिर जाएगा और वह और आलिम बाबा नीचे दबकर मर जाएंगे। पेड़ के हिलने में शिद्दत आ चुकी थी। वह बहुत परेशान हो गया और उसने दायरे से निकलने का पूरा इरादा कर लिया। जैसे ही वह निकलने के लिए उठा, पेड़ के पीछे से एक बार फिर शेर ने छलांग लगाकर उसके सामने दहाड़ना शुरू कर दिया, जैसे वह उसे दायरे से निकलने से रोक रहा हो। वह आलिम बाबा के इशारे को समझ गया और अल्लाह का नाम लेकर फिर बैठ गया। 

उसे बैठते देख शेर वापस चला गया। शेर के जाते ही उसे आलिम बाबा की आवाज सुनाई दी, "बेटा जावेद, मुझे प्यास लगी है। इधर आकर मुझे पानी दो। पानी दो! बहुत प्यास लगी है, आओ बेटा, आओ! चुड़ैल से लड़ते-लड़ते थक गया हूँ। अगर मुझे पानी न मिला, तो मैं मर जाऊँगा। मेरे मरने पर चुड़ैल तुम्हें भी मार देगी। अल्लाह के वास्ते, आओ बेटा, मुझे पानी दो"

आलिम बाबा अब बाकायदा मिन्नतें कर रहे थे। लेकिन जावेद को आलिम बाबा के शब्द याद थे कि "मेरी आवाज पर विश्वास न करना और दायरे से बाहर कुछ हो जाए तो मत निकलना।" वह अपने दोनों हाथों से पानी को थामे बैठा रहा।

अब आलिम बाबा की आवाज में गुस्सा आ गया था। वह गालियाँ देकर पानी मांग रहे थे, लेकिन जावेद टस से मस न हुआ। थोड़ी देर बाद आलिम बाबा की आवाज आना बंद हो गई और बहुत सी महिलाओं के रोने की आवाजें आने लगीं। वे आपस में बोल रही थीं, "हाय चिड़ैल ने चौधरी और चौधरानी को मार दिया है। कोई जा कर छोटे चौधरी को सूचना दे!"

यह आवाजें सुनकर जावेद का दिल बैठ गया। उसके मन में आया कि वह आलिम बाबा को आवाज देकर पूछे कि क्या यह सच है या नहीं। वह इसी उलझन में था कि पेड़ के पीछे से कमली निकलकर उसके सामने आ गई। अबकी बार वह पुराने कपड़ों में मलबूस, खस्ताहाल लग रही थी।

"यह देख, चौधरी और चौधरानी को मारकर आ रही हूँ। यकीन नहीं आता तो जाकर देख आओ। निकलो दायरे से!" उसके पीछे गाँव की तरफ से अभी तक औरतों के रोने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन उसने चिड़ैल को कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप उसे देखता रहा।

"मरोगे तुम दोनों, मरोगे! अब मैं तुम सबको मारकर जाऊँगी यहाँ से!"

इतने में पेड़ के दूसरी तरफ से आलिम बाबा तेजी से निकले और कमली की टांगों पर अपनी लाठी मारी। कमली कराह कर नीचे गिर गई और आलिम बाबा ने जल्दी से उसके चारों ओर दायरा बना दिया। और हाथ में पकड़ी तस्बीह पर जल्दी-जल्दी विर्द करना शुरू कर दिया।

कमली दायरे से निकलने के लिए जैसे ही निकली, आग का एक शोला  उसके तरफ लपका और वह तुरंत पीछे हट गई। यही उसने दायरे के दूसरी तरफ किया, वहाँ भी उसके साथ वैसा ही हुआ।
"निकालो मुझे! निकालो मुझे यहाँ से!" वह जोर-जोर से चिल्ला रही थी, लेकिन आलिम बाबा बस आँखें बंद करके तस्बीह पर विर्द करते रहे।

थोड़ी देर बाद उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और कमली की तरफ देखते हुए बोले, "बताओ, क्यों तुमने इस बच्ची को पकड़ा हुआ है? बताओ! वरना मरने के लिए तैयार हो जाओ!"

इसके साथ ही आलिम बाबा ने जावेद के हाथ से पानी लेकर अपने मुँह पर छिड़का तो कमली दर्द के मारे जमीन पर लोटने लगी और जोर-जोर से नाचने लगी।

"रुको! रुको!"

"सब बताती हूँ। यह बहुत खूबसूरत थी। रोज अपनी माँ के साथ यहाँ घास काटने आती थी। मुझे उसे देखकर खुद से नफरत होती थी। इसीलिए मैंने उसे जकड़कर उसकी खूबसूरती खत्म कर दी।"

वह नाचते-नाचते बोली, "खूबसूरती चेहरों पर नहीं, दिलों में होती है। नैतिकता में होती है। चेहरों की खूबसूरती के पीछे भागने वाले अपने मकसद से भटक जाते हैं।"

आलिम बाबा ने उसे संबोधित करते हुए कहा, "तूने अपनी सीमा पार कर ली है, अब तेरा वापस जाने का कोई रास्ता नहीं।" यह कहकर आलिम बाबा ने हाथ में पकड़ी तस्बीह कमली के गले में डाल दी।

"नहीं, नहीं, नहीं! मुझे मत मारो! मुझे जाने दो, जाने दो! मैं कभी वापस नहीं आऊँगी। मुझे जाने दो!" वह दोनों हाथों से तस्बीह को थामे हुए थी। उसके हाथों और गर्दन से धुआँ निकल रहा था। वह बहुत पीड़ा में जमीन पर तड़प रही थी। धुआँ धीरे-धीरे फैल गया और उसकी आवाजें आना बंद हो गईं।

जैसे ही धुआँ खत्म हुआ, कमली जमीन पर बेहोश पड़ी नजर आई। आलिम बाबा ने उसके चेहरे पर अपना पैर रखा तो वह उठकर बैठ गई और सिर पर दुपट्टा ठीक करने लगी। 

"यह हम कहाँ हैं? मुझे क्या हुआ था?" 

"बेटी, बस तुम्हें एक तकलीफ थी जिसका इलाज हो गया है। शाबाश, यह पानी पीओ और हम घर चलते हैं।" 

"शाबाश, जावेद पुत्र! मैंने तेरे जैसा बहादुर जवान नहीं देखा," आलिम बाबा ने जावेद का सिर थपथपाते हुए कहा।

जब वे गाँव पहुँचे तो फज्र की अज़ान हो रही थी। आलिम बाबा ने जावेद को रानी को उसके घर पहुँचाने का कहा और खुद डेरे पर चले गए।

सुबह नाश्ते के बाद आलिम बाबा ने चौधरी को संक्षेप में सारी स्थिति बताई। चौधरी को यकीन ही नहीं हो रहा था। 

इतने में कमहार अल्ला रखा डेरे में आते हुए दिखाई दिए। आते ही उसने सबको सलाम किया और आलिम बाबा को गुस्से से देखने लगा, फिर दोनों हाथों की लानत बनाकर उनके मुँह पर चिपका दी। सब यह दृश्य हैरानी से देख रहे थे। वह अपने साथ एक ब्लेड भी लाया था, जिसने आलिम बाबा का आधा सिर गंजा कर दिया और मुँह पर थप्पड़ की बरसात कर दी।

आलिम बाबा बौखला गए। अल्ला रखा बोला, "आज मैं तुझ पर कोई रहम नहीं करूँगा और बाकी के बालों से पकड़कर तुझे गाँव में घसीट दूँगा।" आखिर चौधरी के पैरों में लपटक दिया। आलिम बाबा उठ खड़े हुए और चौधरी के कान में कुछ कहा। 

तो चौधरी मुस्कुराकर कहने लगा, "नेक में देरी कैसी?" यह कहकर चौधरी ने अल्ला रखा के आगे झोली फैला दी। 

अल्हा रखा बेटी का पिता था, तुरंत समझ गया और चौधरी के गले लग गया। और आलिम बाबा को सबने पूरे गाँव में गधे की सवारी कराई, सिर गंजा कर के। 

रानी और जावेद की शादी तय हो गई थी। अगले दिन आलिम बाबा वापस शहर को लौट गए। 


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