ज़मीर की खलिश-Voice of Conscience

मुझे इक़रार है कि मैंने खुद तलाक़ ली, मुझे ये भी इक़रार है की तलाक लेना औरत के लिए कोई फख्र की बात नहीं है, मैं इक़रार करती हूँ जिस गहर मेरा वियाह हुआ था वहाँ मुझे कोई परेशानी नहीं थी बस एक ज़मीर की खलिश "Voice of Conscience" (अंतरात्मा की अवाज़) के सिवा, लेकिन ज़मीर की खलिश भी कुछ कम अज़ाब नहीं, सो मैंने तलाक़ ले ली और इस आर मुझे कोई पछतावा, शर्मिंदगी, या अफ़सोस नहीं है | तलाक़ शुदा होने का दाग़ ले कर मुझे ऐसा लगा जैसे ये दाग़ नहीं बल्कि कोई तमग़ा-ए-इफ्तखार (सम्मान पदक) है ऐश-ओ-आराम भरी उस दुनिया से निकल कर अपनी मुफलिसी में दोबारा समा जाने से जो राहत व सुकून मिला वो जन्नत की राहत से कम नहीं |


ज़मीर की खलिश-Voice of Conscience

 ज़मीर की खलिश

आप हैरान न हों, मैं बताती हूँ किकीउन मैंने अपने माथे से सुहाग का झूमर नोच कर तलाक का दाग़ लगाने के लिए इतनी दुआएं की थीं, मैं ग़रीब थी मगर इंतहाई शरीफ खानदान में पैदा हुई थी, मेरे वालिद स्कूल मास्टर थे, वो बच्चों को ज़ेवर-ए-तालीम से आरासता करने में रोज़-ओ-शब मफ़रूफ़ रहते थे, यानि पढ़ते थे | वो अक्सर कहा करते थे की मिलावट कर के मुनाफ़ा कमाने वाले दोज़खी होते हैं, ये आवाम की सेहत से खेलते हैं और राष्ट्र को कमज़ोर करते हैं, इन के रीज़्क़ में हराम और पेट में आग के अंगार भरे होते हैं इन पर खुद की लानत होती होगी | जब बच्चों के जहनों में इस तरह की बातें फिट हो जाएं तो वो बुराई से समझोता करने से क़तराते हैं, वालिद साहब ने मुझे M. A. तक तालीम दिलवाई थी, की मुझे पढ़ने का शोक़ था, कितनी दिक़्क़तें उठा कर उन्होंने मुझे ये इस मंजिल पर पहुंचाया था, जब की हम गाँव मे रहते थे और यूनिवर्सिटी शहर मे थी, एक प्रिमरी स्कूल टीचर की तनख्वाह इस क़दर थोड़ी होती है कि दो वक़्त रोटी इज़्ज़त से ब-मुश्किल पूरी होती थी | ऐसे हालात में उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और मैं चाहती थी कि MA कर के हाई स्कूल टीचर लग जाऊँगी, या किस्मत ने साथ दिया तो लेक्चरर बन कर वालिद साहब के दिल को ठंडक पहुंचाऊँगी

जब हालात का रेला आता है तो बरसों के ख्वाबों को भी बाहा ले जाता है, उन दिनों मैंने लेक्चरर शिप के लिए फोरम भर दिया था, कि वालिद साहब की मुलाक़ात गाँव के एक अमीर आदमी से हो गई, जिस का अपना कारोबार था, वो अपने पोते का स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट लेना आया था, अब्बा जान से उनकी अच्छी गप शप हुई और बातों बातों मे रिश्तों का ज़िक्र चल गया, आफाक़ साहब ने कहा_मुझे अपने डॉक्टर बेटे के लिए एक ऐसी लड़की की तलाश है जो कम से कम ग्रॅजुएट हो और सदा रहन सहन की वाली हो, अमीरी ग़रीबी के फ़र्क को मैं अहमियत नहीं देता, लेकिन जैसे हर नोजवान किआर्जू होती है की उसकी बीवी पढ़ी लिखी होने के साथ साथ नेक सीरत और खुश शक्ल भी हो | मेरे ज़ाहिद की भी यही आरज़ू है, मेरी बीवी ने काफी लड़कियां देखी हैं,लेकिन अभी तक कोई ऐसी लड़की नहीं मिली जिस में ये तमाम खूबियाँ हों ,दर असल गाँव में लड़कियां खूबसूरत तो बहुत हैं मगर पढ़ी लिखी नहीं हैं, या बस मेट्रिक पास हैं, आप ही इंसाफ कीजिए ! एक डॉक्टर लड़के के लिए लड़की भी आला तालीम याफ़्ता होना चाहिए या नहीं ? शहर तो बहुतलड़कियाँ मिल जाएंगी मगर हमारी बेगम की नजाने क्या मंतिक है कि वो इस बात पर अड़ी हुई हैं कि मुझे बहु गाँव मे रहने वाले घरानों से ही चाहिए, आफाक़ साहब कि ये बातें सुन कर मेरे सादा दिल व साफ गो वालिद साहब बोले_भाई साहब अगर आप पसंद करें तो अपनी बेगम को हमारे घर भिजवा दें, मेरी बेटी गाँव की परवरिश में ही पली बड़ी है,और आला तालीम याफ़्ता भी है, उसने मास्टर की डिग्री हासिल की है, जिस केलिए वो दो साल यूनिवर्सिटी के गर्ल्स हॉस्टल में रही है, ये सुनकर आफ़क़ साहब की बाहें खुल गईं



वो बोले रिश्ते तो नसीबों से होते हैं, हर हाल में आज ही अपनी बेगम को आप के घर भेजूँगा ताकि वो एक नज़र आप की बेटी को देख ले, हो सकता है कि आप से हमारी रिश्तेदारी हो जाए, आप तो बहुत भले मानस हैं यक़ीनन औलाद भी आप के जैसी नेक सीरत होगी, खैर इस तरह आफ़ाक़ की बेगम हमारे घर तशरीफ़ लें आईं, मुझे तो इल्म न था कि ये क्यूँ आई हैं जैसा हमारे मिज़ाज में था खुश अखलाक़ी से महमान की आओ भागत करना, वो हमने की- वालिद साहब ने बताया था कि उनके दोस्त के घर से खवातीन (औरतें) आएंगी, बातों बातों में mrs आफ़ाक़ ने भी बताया कि उनके शोहर काफी असर-ओ-रुसूख वाले हैं, और इलाक़े के सीयसत-दान की मदद से गाँव मे लड़कयों के लिए कॉलेग बनाने की कोशिश कर रहे हैं, हीर मुझसे मुखटिब हूँ कर बोलीं मुझे ये जान कर बाट खुशी हुई की गाँव में रह कर तुमने मास्टर्स कर लिया है, माशा-अल्लाह दो चार माह में हमारे गाँव में लड़कियों का कॉलेग खलने वाला है, जैसे ही मंज़ूरीआएगी, इमारत बनना शुरू हो जाएगी मुझको उनकी बातें बहुत पसंद आईं कि वो तालीम की इतनी क़दरदान हैं, बहर-हाल जब वालिद साहब आए तो अम्मी ने mrs आफ़ाक़ की बहुत तरीफ़ की इसी तरह जब वो घर गईं तो अपने शोहर और लड़के से मेरी बहुत तारीफ की, गोया उनको मैं बहु के रूप में पसंद आ गई थी,भले मैं एक सफेद पोष प्राइमेरी टीचर की बेटी थी,वालिदैन ने सोच ये भी उन लोगों की बड़ाई है | ब-वजूद इसके कि हमारी ग़रीबी तो उनके सामने थी,उन्होंने हमारे और उनके बीच अमीरी और ग़रीबी के फ़र्क को न देखा और मामूली घराने की लड़की से शादी के लिए राज़ी हो गए |



अम्मी” ज़ाहिद का घर देखने गईं तो उनकी लंबी चोड़ी हवेली देख कर हैरान रह गईं, क्या दौलत थी, क्या शान-ओ-शोकत थी, एक से एक लक्सरी गाड़ियां, हर शै मुंह से बोल रही थी की दौलत इस घर की बांधी है,अम्मी अब्बा को तो यकीन नहीं आ रहा था कि कैसे इन्होंने हम सीधे साधे ग़रीब लोगों के साथ रिश्ता जोड़ कैसे लिया, खैर....ये किस्मत का लिखा था, ज़ाहिद के साथ मेरी शादी हो गई और मैं आफ़ाक़ साहब के घर की बहु बन कर उनके गाँव आ गई, ये बिल्कुल गैर लोग थे मगर मुझे इन्होंने पहले दिन से यही अहसास दिया कि मैं गैर नहीं हूँ, अपनाइयत के अहसास से दो महीने बहुत सकून से गुज़र गए, फिर धीरे धीरे इस घर की असलियत सामने आने लगी, आस पड़ोस से सुनने को मिला कि पहले ये लोग बहुत ग़रीब थे, धीरे धीरे अमीर हो गए, मेरे ससुर साहब तीन क़िस्म का कारोबार करते थे, एक मीठी छालियाँ बनाने का कारखाना था, दूसरा कारखाना मसलों का था, तीसरा चाय की पत्ती का कारोबार था |



इस कारोबार में मेरे चार देवर भी बराबर के शरीक थे जबकि मेरे शोहर की एक डिस्पेंसरी थी, और वो डॉक्टर कहलाते थे, शादी के बाद मुझ पर ये इनकिशाफ़ हुआ (मुझे पता चला) की ये डॉक्टर नहीं हैं, बल्कि डिसेन्सरी का कोर्स किया हुआ है, और करीबी दिहात में छोटी सी दुकान है, दिहात के सादा लोग इन्हें सच मुछ का डॉक्टर समझते हैं साथ ही दवाइयों का एक छोटा सा स्टोर भी खोल रखा था, जहां से इनकी लिखी हुई दवाई बेचारे ग़रीब लोग खरीदते थे, जहां मेरे मियां ने दुकान की ही थी वहाँ से सिर्फ सात मील दूर एक शहर था, मैं अपनी ससुराल में रहती थी, मेरे मियां हफ्ते में दो ही दिन के लिए घर आते थे, बाकी दिन वो अपनी दुकान पर रहते थे, एक बार मैं ने साथ जाने का कहा उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें वहाँ इस लिए नहीं ले जा सकता कि दिहात का माहौल अच्छा नहीं है, तुम वहाँ अकेली नहीं रह सकोगी, क्यूँ की मैं रात दिन मरीजों में उलझा राहत हूँ, उनका जावाब सुन कर मैं चुप रह गई, हमारे घर के दो हिस्से थे एक घर में हम रहते थे, जबकि दूसरे बड़े हिस्से में उनके कारखाने लगे हुए थे, कारखाने में सैलरी पर मर्द और औरतें काम करते थे, साथ ही कुछ काम घर की औरतों के भी ज़िम्मे थे, जो वो अपने हाथों से अंजाम देती थीं |




जब शादी को तीन माहिने हो गए तो एक दिन मेरी सास ने कहा, दुल्हन अब तुम भी इस काम में मेरा हाथ बटाया करो, जी अच्छा अम्मी जान! मैंने जवाब दिया जो काम आप कहेंगी मैं वो कर दिया करूंगी, अगले दिन जिस कमरे में पिसे हुए मासाले की ढेरियाँ होती थीं वो मुझे वहां ले गईं और बोलीं, तुम ऐसा करो इन दो किस्म की ढेरियों को इतने तनासुब (अनुपात)से मिलाती जाओ, बस इतना ही काम है उन्होंने मुझे नाक ढाँपने को एक खास क़िस्म का डोरियों वाला रुमाल दिया, मैं नायक मुंह लपेट कर मिर्चों वाली ढेरी के पास बैठ गई, और गौर से उन ढेरियों को देखा तो उन में एक ढेरी सुर्ख मिर्चों और दूसरी रंगे हुए बारीक बुरादे की थी, गोया मिलावट का काम हम घर की औरतों को करना था, यही हाल हर मसाले का था, इसके अलावा चाय की घटिया पत्ती अच्छी कुवालिटी के डब्बों मे भर कर ज़्यादा दामों में बेची जाती थी, छालियाँ गली सड़ी, सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले रंगों में रंग कर सकरीन के ज़हर से मीठी की जातीं थीं, मेरा सर चकराने लगा, मेरा ज़मीर गवारा न करता था कि ऐसे घटिया कामों में इनका हाथ बटाऊँ, जबकि ससुराल के किसी भी फर्द को इस बात का अहसास न था कि दौलत कमाने की खातिर वो जो काम कर रहे हैं, किस क़दर घटिया और अखलाक़ियत से परे है |


यकीन करें जब पहली बार मैंने पिसी हुई मिर्चों मे बुरादा मिलाया तो मेरे दिल में ठेस उठी, दिल और हाथ कांप रहे थे मगर लब खामोश थे, ससुराल में किसे क्या कहती ये तो सरा कुनबा ही बिगड़ हुआ था, इन पर मेरी नसीहत का क्या असर होना था, इंतजार करने लागी कि शोहर साहब आएं तो उनसे कहूँ कि मुझसे ये काम नहीं हो सकता, और न मिलावट के इतने बड़े जुर्म में मैं आप लोगों का साथ दे सकती हूँ, अल्लाह अल्लाह करके छः दिन गुज़रे सातवीं रोज़ ज़ाहिद आ गए उनसे कहा आपके वालिद और भाई वालिदा और बहनें सब के सब जिस ग़लत कारोबारी रंग को इख्तियार किये हुए हैं, मैं उनका साथ नहीं दे सकती,,,,,,,, ब-ज़ाहिर तो आप शरीफ कहलाते हैं कोठी नुमा घर में रहते हैं, मगर ऐसी दौलत से क्या फायदा ? जब रीज़्क़-ए-हलाल न हो, हमारे वालिद साहब ने तो हमें हमेशा रीज़्क़-ए-हलाल खिलाया है और हर काम ज़मीर की रोशनी मे करने की हिदायत दी है | जिस बात के लिए मेरा ज़मीर मेरा दिल मुतमइन नहीं मैं वो काम नहीं करूंगी, ये काम करना तो दूर की बात है, मैं ये धांधली अपनी आँखों के सामने बरदाश्त भी नहीं कर सकती, ये मेरे एक हफ्ते की घुटन थी जो मेरे शोहर के सामने इन अल्फ़ाज़ मे निकली, मैं समझ रही थी कि वो मेरी बातों की सदाक़त को तस्लीम कर लेंगे, भला मिलवात की चीजें लोगों को खिला कर उन्हें बीमार करना एक घिनोना काम नहीं तो और क्या है? मेरी बातें सुन कर ज़ाहिद ने फरमाया! अपनी वाकवास बंद करो और खबरदार जो आइंदा ऐसी खुराफात मुझे सुनाईं, तलाक़ दे दूंगा |


मत पूछिए! दिल को कितना सदमा पहुंचा, मेरा सरापा ही सुलग उठा, रो रो कर पागल हो गई, अब तो तमाम घर वालों को मेरी परेशानी का इल्म हो गया और वो मुझे ऐसे देखने लगे जैसे कोई पराई कौम का जाजूस उनके कबीले मे घुस आया हो, मैं सख्त परेशान रहने लागी, लेकिन उन्हें मेरी परेशानी से कोई वास्ता न था, अब मैं उस दिन को कोसती जब मेरी शादी हुई थी , कि ऐसे बे जमीर लोगों में मेरा रिश्ता क्यूँ हुआ ? मेरे वालिद बेचारे तो एक मामूली टीचर थे, अपनी सादगी की वजह से उन लोगों को न पहचान सके, उन्होंने कितने दुख सह कर मुझे MA कराया था, क्या इसी दिन के लिए ? ये लोग तो सिर्फ दौलत मंद निकले ज़मीर की तरफ से तो ये फ़कीर हैं, तालीम याफ़्ता भी नहीं कि कम से कम मेरी बात सुनने का इन मे होसला होता, नतीजा ये हुआ कि मेरी ज़रा सी बात पर तूफान उठा देते, सच बात कहती तो उलटा मुझ पर ही लअन तअन करते कि क्या बेवक़ूफ़ लड़की है | अपने ही घर की खुशहाली की दुश्मन बनी हुई है, काश मेरे वालिदैन खुशहाल घराने की बजाए किसी ईमानदार ग़रीब के घर में बियाह देते, मैं पढ़ी लिखी थी, कोई नोकरी करके अपने घर के हालात सुधार लेती, दिल सुकून तो मयस्सर रहता |


अब मैं हर वक़्त ग़म-ज़दा व परेशान रहने लागी, खाना खाती तो कराहत आती कि रीज़्क़-ए-हराम खा रही हूँ, आहिस्ता आहिस्ता दिल की घुटन बढ़ती गई, जब पता हुआ कि खरे में खोट मिलाया जा रहा है जब इस बात का इल्म हुआ कि ऐसा कुछ गलत हो रहा है जो लाखों करोड़ों लोगों की सेहत खराब करने का कारण बनेगा , उफ्फ़ कितनी रूह फरसा बात थी, सोच कर ही ज़ेहनी बीमार पड़ती गई, और मेरी आँखों के सामने मिलावट का कारोबार जारी था, अब मैंने हर नमाज़ के बाद यही दुआ मांगना शुरू कर दिया कि खुदा मुझे सुकून दे और इन लोगों को सुधार दे और सीधी राह दिखा, या फिर मुझे इस घराने से निजात दिला दे, अल्लाह ताला ने मेरी दुआ कुबूल कर ली कारखाने पर छाप पढ़ गया, ससुर को पुलिस ने हिरासत में ले लिया, एक लाख रुपये दे कर पुलिस से जान छुड़ाई, अभी इस वाक़िये से संभल भी न पाए थे की मेरे शोहर गिरफ्तार हो गए, एक दिहाती औरत को गलत इन्जेक्शन लगा दिया, जिसकी वजह से उसका इंतक़ाल हो गया और उसके क़त्ल के इल्ज़ाम में गिरफ्तार कर लिए गए |



डिस्पेंसरी पर पुलिस ने कब्ज़ा कर लिया, दुकान की तलाश ली तो कई जाली दवाएं निकलीं,और इसके अलावा एक्स्पाइरी डेट की दवाइयाँ जो डेट गुज़र जाने पर ज़ाया कर देनी चाहिए, वो ये खरीद लेते और उनको इस्तेमाल करके रुपया खड़ा कर लेते, कई डब्बे ऐसे सरकारी अस्पतालों से इस्मगल शुदा दवाओं के निकले, जो सरकार ग़रीब मरीजों के लिए मुफ़्त मुहाय्या कराती है, और सरकारी अस्पतालों से जमीर फ़रोश मुलाजिमों के जरिए ऐसे ही अताई डोकटरों के पास बेच दी जाती हैं, ज़ाहिद साहब जेल से बाहर आए तो उन्होंने मुझे तलाक की धमकियाँ दिं, हालांकि उन्हें अंदर मैंने नहीं कराया था, कुदरत की तरफ से उनके साथ ये हुआ, जब तलाक की धमकियाँ मिलीं तो वालिद साहब ने अदालत के ज़रिए उन बे-ज़मीर लोगों से निजात हासिल कर ली, ससुर साहब के कारखाने भी बंद हो गए, ये भी सब कुदरत की तरफ से हुआ, जो लोग अपने फ़ायदे की खातिर ग़रीब लोगों का हक मारते हैं और समझते हैं कि कभी कानून की गिरफ़्त में नहीं आएंगे, वो ज़रूर एक दिन घेर लिए जाते हैं, क्यूँ की अल्लाह की लाठी में आवाज़ नहीं होती |



वो कानून से बच भी जाएं तो! अल्लाह के इंसाफ से नहीं बच सकते | मैं आज तलाक का दाग़ लिए हुई हूँ, मगर इस से मेरी इज्ज़त पर कोई हरफ नहीं आया, मैं शुक्र अदा करती हूँ कि खुदा ने बुरे लोगों से निजात दिला दी, वरना मेरी औलाद का क्या हश्र होता ? अब मैं इज़्ज़त की ज़िंदगी गुजार रही हूँ , एक कॉलेग मे लेक्चरर लग गई हूँ, और अपने वालिदैन बहन भाइयों के साथ खुश हूँ |