वह रात मेरी जिंदगी में बदलाव लाने वाली रात थी जब मैंने सोए हुए माँ-बाप और भाई-बहनों पर आखिरी नज़र डाली थी। मुझे बिलाल की मोहब्बत ने अंधा कर दिया था। मैं घर की दहलीज पार कर गई थी , वही मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी, बिलाल बाइक के साथ खड़ा था, मुझे लेकर उसने तेजी से बाइक चला दी।
मोहब्बत एक धोका है। hindi stories
मेरा नाम नीलम है और यह मेरी उन दिनों की बात है जब मैं 15 साल की थी और नौवीं कक्षा में पढ़ती थी। घर में अम्मी, अब्बू और दो छोटे भाई-बहन थे जो मुझे बहुत प्यारे थे। मैं घर में बड़ी थी, रोज स्कूल और स्कूल से घर, मुझे पढ़ने का बहुत शौक था। उन दिनों मोबाइल फोन आम नहीं थे, स्कूल में मेरी एक दोस्त थी जिसका नाम मीना था, उसके पास मोबाइल फोन था और वह स्कूल भी लाती थी, बहुत होशियार थी। आज तक टीचर्स को पता नहीं लग सका था कि मैं और मीना कब पानी पीने के बहाने से या कब ब्रेक में पीछे की तरफ का रुख करते हुए टंकी के साथ लगकर मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते थे। इस मुफलिसी और अधूरी ख्वाहिशों से भरी इस जिंदगी में एक यही समय मेरे लिए बहार का होता था। एक दिन मैंने मीना से अपनी ख्वाहिश का इज़हार किया कि मेरा भी दिल करता है मोबाइल फोन लेने का, तो वह मुस्करा दी पर कुछ बोली नहीं।
यूं ही जिंदगी कटती रही, दो हफ्ते बाद मीना ने मुझसे कहा कि बिलाल मेरा कज़न है और वह तुम्हें पसंद करता है और चाहता है कि एक बार तुम उससे मिलकर उसकी बात सुन लो, मेरे लिए यह अल्फाज़ बिल्कुल नए थे, मैं भूलकर भी कभी यह सोच नहीं सकती थी जिसमें मैं बिना किसी जायज़ रिश्ते के एक ग़ैर मर्द से खुद को जोड़ती हुई पाती। उसकी इस बात पर मैंने काफी गुस्से का मुज़ाहिरा किया और यह कोई नई बात नहीं थी, हमारे लिए । खैर रात के खाने के बाद मैं अपने बिस्तर पर आ लेटी, हमारा घर किराये का था जिसमें दो कमरे थे, एक में दुकान खोल रखी थी और दूसरे में हम सब रहते थे। लेटे-लेटे एक बार फिर मुझे मीना की बात याद आ गई।
ज़िंदगी में यह सब कुछ नया था, तब ही यह बात पूरी तरह मेरे हवासों पर सवार थी कि कितनी मासूम हुआ करती थी मैं। अगले दिन मैं स्कूल की वर्दी पहने नाश्ते के लिए आ बैठी, अम्मी पराठे बना रही थीं। मैंने देखा कि सिर्फ तीन ही रोटियों का आटा था जो अम्मी ने हम तीनों को बना दिया था। मेरे भाई-बहन इस बात से बेखबर चाय पराठे का नाश्ता करने में मस्रूफ थे, और मैं यह कहकर उठ गई कि मुझे भूख नहीं लगी।
अम्मी बोलीं, "क्यों बेटा, तुमने सारा दिन वहां पढ़ना है, तबीयत खराब हो जाएगी। कुछ तो खा लो।" लेकिन मैं मना करते हुए वहां से उठ गई। मेरे तीन महीने की स्कूल फीस बाकी थी, और हमारी प्रिंसिपल बहुत बुरे व्यवहार वाली थीं। एक हफ्ते से वह रोज मुझे क्लासरूम में आकर वॉर्न कर रही थीं। मैं उन्हें सोचते हुए कि आज मैडम को क्या जवाब दूं, घर से स्कूल की ओर निकल गई। अम्मी से रोज कहती थी, और अम्मी का यही जवाब होता, "बेटा, कल दे देंगे।" मैं जानती थी कि आज भी उनके पास कोई पैसे नहीं थे, तब ही चुपचाप स्कूल आ गई, और आज भी याद है कि उस दिन फीस न देने पर मैडम ने पूरी क्लास के सामने मुझे जलील किया और अच्छी तरह मारा भी। मैं वॉशरूम में जाकर बहुत रोई। मैडम ने कहा, "कल फीस के साथ आना, वरना मत आना। पेपर होने वाले हैं, पूरा साल बर्बाद हो जाएगा।"
मीना ने मुझे तस्ली दी, लेकिन मैं सच जानती थी। अम्मी को बताया तो अम्मी क्या कर सकती थीं? वे रोने लगीं। पिताजी बहुत शराबी थे, और उनकी तबीयत भी खराब थी। ऐसा लगता था जैसे उन्हें अपने बच्चों से प्यार ही नहीं था।
वे हमसे हमारी समस्याओं और जरूरतों के बारे में पूछते तक नहीं थे। पहले तो वे नौकरी भी नहीं करते थे, फिर उनके एक दोस्त ने किसी तरह समझा-बुझाकर नौकरी पर लगा दिया। उनकी तनख्वाह वो बस अपने ऊपर खर्च करते थे। कभी-कभी तो अम्मी की दुकान का मुनाफा भी ले लिया करते थे।
आज जब पिताजी घर आए, मैं उनके पास जाकर बैठ गई। वे शराब पीकर आए थे, मैंने फीस के पैसे मांगे, तो वो जूता उठाकर मुझ पर बरस पड़े, और जब थक गए, तो मैं अपने बिस्तर पर जाकर लेट गई और आंसू बहाने लगी। मैं अपनी पढ़ाई छूट जाने का सोग मनाने लगी।
दो दिन बाद मीना मेरे घर आई और बोली, "तुम्हारी फीस मैंने दे दी है, कल से तुम स्कूल आ जाना।" मैं उस समय उसकी बहुत शुक्रगुजार हुई, और अम्मी भी। अम्मी ने उसे जल्द ही पैसे लौटा देने का वादा भी कर लिया।
मैं फिर से स्कूल जाने लगी, मैं बहुत खुश थी। मैं हमेशा से पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहती थी। आज जब स्कूल की छुट्टी पर हम लोग निकले, तो स्कूल के बाहर एक लड़का मुझे देखकर मुस्करा रहा था। मैं घबरा गई और तेज-तेज कदम उठाते घर की ओर चल दी। मीना और मैं वापसी पर अलग-अलग जाते थे। वह लड़का मेरा पीछा करने लगा, मेरे तो हाथ-पैर ठंडे हो गए। वीराना शुरू हो चुका था, शाम का समय था, आसपास न कोई आदमी था। मेरी आंखों से आंसू गिरने लगे थे, जिस पर उस नौजवान की आवाज मेरे कानों में पड़ी, "सुनें, मैं बिलाल हूं, मीना मेरे चाचा की बेटी है। सुनें!"
मैं रुकने की जगह तेजी से चलने लगी, देखें मेरी बात सुनें। उसने आगे बढ़कर मेरा हाथ थाम लिया, जिससे मेरी जान ही निकल गई। मुझे कुछ समझ नहीं आया और मैं जोर-जोर से रोने लगी, जब कि वह ज़ेर-ए-लब मुस्कुरा रहा था, जैसे मेरी मासूमियत पर उसे बहुत प्यार आया हो। उसने मेरे माथे पर बोसा दिया और वहां से वापस चला गया। मैं वहीं खड़ी उसे जाता देखती रही, फिर कुछ देर बाद जैसे होश में आई हूं, यह पहली बार था जब मुझे किसी ग़ैर मर्द ने छुआ था, जिसने मेरी रूह तक को झंझोड़ डाला था। मैं खुद को मैली सी महसूस करने लगी, जैसे उसके छूने से मैं मैली हो गई हूं। मैं घर आ कर बसता फेंका , टंकी से पानी लिया और नहाने चल दी।
अगले दिन भी उसने उसी तरह मेरा पीछा किया, अब तो रोज का मामूल था यही। यही सहन करने की हद हो चुकी थी। फिर एक दिन मैंने उसे ठीक-ठाक सुना दिया, जिस पर वह कुछ नहीं बोला और चला गया। और फिर उसने मेरा पीछा नहीं किया। शाम और दिन सुकून से गुजरने लगे, कि एक दिन मीना ने मेरे सुख-चैन को आग लगा दी। यह बता कि मेरी पूरी फीस मीना ने नहीं, बल्कि बिलाल ने भरी थी और उसने मुझे हर हाल में यह बात बताने से मना किया था, ताकि मेरी आत्म-सम्मान को कोई ठेस न पहुंचे। यह जानकर मुझे अच्छा नहीं लगा और उस दिन मैं बहुत रोई थी, कि पिताजी के जीवित होते हुए भी आज मुझे किसी गैर की भीख पर पलना पड़ रहा है, लेकिन वह ऐसा क्यों कर रहा है? क्या वास्तव में उसे मुझसे प्यार हो गया है? यह ख्याल आज मेरे होंठों पर न जाने क्यों मुस्कराहट ले आया था, लेकिन मैं एक बोझ के नीचे दब गई थी।
अब वह मेरा पीछा नहीं करता था, और न ही उस दिन के बाद से मैंने उसकी शक्ल देखी। पता नहीं क्यों मुझे एक कमी सी महसूस होने लगी। यह क्या था? मैं खुद को कोसती भी थी, लेकिन उन दिनों खुद पर बस नहीं चल रहा था। समय गुजरता गया, अब तो मुझे बा-क़ायदा उसकी याद सताने लगी थी। उसकी बोली हुई बातें, अल्फाज़, वह प्यार का इज़हार मेरे कानों में गूंजता रहता। यूं लगता जैसे मैं कोई गलती कर बैठी हूं, उसका दिल तोड़ दिया है। मेरी इस महरूमियों से भरी जिंदगी में कोई आया था मेरे पास, मेरे दुख में मेरा साथ देने, मदद करने वाला वह गैर होकर भी कोई अपना था।
फिर एक दिन वह समय आ ही गया जब वह फिर से मेरी जिंदगी में आया। मीना ने मुझे एक मोबाइल फोन पकड़ाया और कहा, "बिलाल तुमसे बात करना चाहता है।" मैं मोबाइल फोन देखकर घबरा गई और बोली, "नहीं, यह मैं नहीं ले सकती।" जिस पर मीना ने कहा, "पागल, यह मेरा फोन है, बस तुम इस से बिलाल से बात कर लो।" मैं अपने दिल की हर बात मीना से कहती थी। मैंने वह फोन लेकर बेग में डाल लिया। यह टच मोबाइल का दौर नहीं था, तब वह फोन इतने आम नहीं थे। मीना ने उस फोन पर एसएमएस पैकेज करा दिया था और बिलाल का नंबर भी डाल दिया था। दिन तो घर के काम और पढ़ाई करते हुए गुजर गया, लेकिन रात बहुत भारी हो चुकी थी।
बार-बार ध्यान उस फोन की तरफ चला जाता, लेकिन मैं खुद को बहलाने लगी, सब लोग घर में सो चुके थे। मैंने उठकर एक नजर सब पर डाली और सोचा फोन देख लेती हूं, देखने में क्या हर्ज है? यह सोचकर मैं उठी और फोन उठा लाई और धड़कते दिल के साथ चादर में घुस गई, कि कहीं कोई देख न ले। फोन देखा तो उसमें एक मैसेज आया हुआ था। मेरा दिल धक-धक कर रहा था, वह बिलाल का मैसेज था। "नीलम कैसी हैं? आप मुझे गलत मत समझिएं, मैं एक इज्जतदार घर का शरीफ लड़का हूं, मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहा हूं, तीसरा साल है, मैं आपको जीवनसाथी के रूप में सोचने लगा हूं। आप हां करती हैं तो मैं मां को भेज दूंगा आपके घर और हमेशा के लिए अपनी इज्जत बना लूंगा। लेकिन आपकी राय मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, अगर मेरी बात से आपको कोई ऐतराज नहीं है तो बस मैसेज कर देना। आपका बिलाल।"
यह मैसेज बहुत विस्तार में लिखा हुआ था । जिसे पढ़ने के बाद न जाने क्यों दिल गदगदाने सा लगा। मुझे गुस्सा नहीं आया, बल्कि मेरी आंखें भी भीग गईं। आपको क्या बताऊं बिलाल, कि पिछले दिनों किस तरह आप मेरे दिल में बस चुके हैं? कौन जानता है । लेकिन आपकी आंखों में जो सच्चाई की चमक है, न वह यकीन दिलाती है कि आप कोई अपने हैं? बहुत अपने! एक बार गलती कर दी, अब आपको खुद से दूर नहीं जाने दूंगी।
मैं जज़्बात में बहकर अपने दिल का सारा हाल उसे कह गई। कभी सोचा भी नहीं था कि किसी गैर से मैं इस तरह की बात करूंगी, लेकिन यह प्यार सब कुछ करा लेता है। उससे यह सब कहकर मुझे एक सुकून सा मिला था, और मुसलसल आंखों से आंसू जारी थे।
उसका जवाब आया, मैसेज की वाइब्रेशन से दिल में खुशी से कुछ हुआ, और मैंने जल्दी से उसका मैसेज खोला। "शुक्रिया मेरे प्यार को समझने के लिए। अब दुनिया से लड़ जाऊंगा, लेकिन आपकी आंख में आंसू नहीं आने दूंगा। वादा रहा।"
जिस पर मैंने जवाब में लिखा, "आज से पहले मैंने कभी किसी के लिए यह सब महसूस नहीं किया, जो आज मैं कर रही हूं। बरसों बाद एक सच्ची खुशी मिली है।"
जिस पर उसका मैसेज था,
"आई लव यू।"
मैंने भी बोल दिया,
"आई लव यू टू।"
और यहीं से हमारी प्यार का सिलसिला चल पड़ा।
हम रोज रात को मैसेज पर बात करते थे। उसने रिश्ता भेजने के लिए बहुत बार जिद की, लेकिन मैंने उसे यह कहकर मना कर दिया कि मेरा स्कूल खत्म हो जाए, फिर तब तक आप भी डॉक्टर बन जाएंगे। छह महीने गुजर गए, इस दौरान मुझे बिलाल से इतनी मोहब्बत हो गई थी कि मैं उसकी खातिर सौ बार भी मर सकती थी। और इसी पागलपन में बहकर मैं उसके बहुत जिद करने पर अपनी हर हद पार कर चुकी थी। अपना दुपट्टा उसकी नाराजगी की भेंट चढ़ा चुकी थी। अब वह मुझसे हकीकत में वह गुनाह करने के लिए मजबूर था, जो मैं कभी नहीं चाहती थी। जिस पर वह मुझे छोड़ जाने की धमकी देता, मेरे सामने रोता-गिड़गिड़ाता, लेकिन मैं कोई जवाब नहीं देती, बल्कि उसे प्यार से मनाने लगती। वह नहीं सुनता, तब मैंने ही एक दिन गुस्से में आकर उससे संपर्क तोड़ दिया, क्योंकि जो वह कह रहा था, वह मेरे बस में नहीं था।
एक शाम जब मैं झाड़ू लगा रही थी, तब अम्मी की आवाज सुनाई दी, "नीलम, देखो दुकान पर कोई आया है।" मैं अच्छा, अम्मी बोलती दुकान पर आ गई, तो यह देखकर हैरान रह गई कि सामने बिलाल खड़ा था। मैं उसे यहां देखकर बुरी तरह डर गई, जिस पर उसने मेरा हाथ थाम लिया। वह एहसास बहुत अच्छा लगा। मुझे वह फ़ौरन बोल पड़ा, "मुझे माफ कर दो, मेरी जान में बहुत गलत था, अपनी जान को माफ नहीं करोगी?" उसकी आंखों में आंसू थे। इससे पहले कि मैं कुछ कहती, अम्मी दुकान में आ गईं और बिलाल ने झट से मेरा हाथ छोड़ दिया। "जी क्या चाहिए आपको?" अम्मी उस्से बोली। वह वह एक दूध का डब्बा, वह बौखलाहट में बोला, जिस पर मैं अम्मी से नज़र बचाकर मुस्करा दी, तो वह भी मुस्करा दिया।
एक बार फिर से हम एक हो गए। समय जाता रहा, मेरे स्कूल खत्म होने से पहले ही अब्बू मेरी शादी अपने दोस्त से करने जा रहे थे, जो अबू ही की उम्र का था और काफी पैसे वाला था। जब मुझे पता चला, मैंने अम्मी को बिलाल के बारे में सब बता दिया, जिस पर अम्मी ने मेरी पीठ पर थप्पड़ों और घूंसों की बारिश कर दी। इसके बाद सर पकड़कर बैठ गईं। मैंने भी जिद कर ली थी कि शादी बिलाल से ही करूंगी। अब्बू को अम्मी ने जब बताया, तो अब्बू ने भी जूती उतारकर मुझे मारा। वह तो छुरी उठा लाए, फिर अम्मी बीच में पड़ीं। अब्बू ने मुझे लानत देते हुए साफ शब्दों में बता दिया कि कल शाम मेरा निकाह उस उम्र रसीदा बंदे से होगा। और हम सब जानते थे कि अब्बू के फैसले के आगे सब बेबस हैं। उस रात मैं अम्मी की गोद में छुपकर बहुत रोई थी। जब अम्मी सो गईं, तब बिलाल को मैसेज करकर रोते-रोते सब कुछ बता दिया, जिस पर वह परेशान होकर रह गया। बोला, "मैं बात करूं अंकल से?" जिस पर मैंने सख्ती से मना कर दिया। हम दोनों सारी रात रोते रहे। उसने कहा, "नीलम, तुम मुझसे प्यार करती हो न?"
मैंने कहा, "जान से ज्यादा।" उसने कहा, "मैं आ रहा हूं तुम्हें लेने के लिए, बस चलो मेरे साथ। इस निकाह से बचने के लिए यही रास्ता है। मां-बाप कब तक औलाद से नाराज रह सकते हैं? नहीं रहेंगे। बस इस समय मेरा हाथ थाम लो, हमारी मोहब्बत घुट-घुट कर मर रही है, इसे बचा लो। मैं हाथ जोड़ता हूं, आधा घंटा दे रहा हूं, सोच लो अगर नहीं तो मैं हमेशा के लिए तुम्हारी जिंदगी से चला जाऊंगा, फिर कभी लौटकर नहीं आऊंगा। तुम भी इस समय को ख्वाब समझकर भुला देना जो हमने साथ गुजारे हैं।"
बिलाल यह सब कैसे कह गया? वह पल जो मैंने उसके साथ गुजारे थे, मेरी जिंदगी के कीमती पल थे। मैं उन्हें एक ख्वाब समझकर नहीं भुला सकती थी। आधे घंटे बाद उसका मैसेज आया, "बोलो नीलम।" पर मैंने कोई जवाब नहीं दिया, जिस पर वह मैसेज पर मैसेज करता रहा, मैं पढ़-पढ़कर आंसू बहाती रही। फिर मैंने भी एक फैसला लिया कि मैं उसके साथ चली जाऊंगी। कितने ख्वाब देखे थे हमने साथ में? अगर अकेली की होती तो कब का बाप की इज्जत पर कुर्बान कर देती, लेकिन उसे नहीं रुला सकती थी जिसने मुझे हंसाया था।
और वह रात मेरी जिंदगी में बदलाव लाने वाली रात थी जब मैंने सोए हुए मां-बाप और बहन-भाई पर आखिरी नजर डाली थी। और घर की दहलीज पार कर दी, वही मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी। बिलाल बाइक के साथ खड़ा था, मुझे लेकर उसने तेजी से बाइक चला दी।