बहुत देर हो गई हम लोग कहीं घूमने नहीं गए इस बार क्या प्लान है? अब्दुल्लाह ने अपने चचेरे भाइयों से पूछा यार मैं तो कहता हूँ मरी चलते हैं बहुत खूबसूरत मौसम है वहाँ का अदील ने अपनी राय दी सानिया तुम कहाँ जाना पसंद करोगी अगर तुम साथ गई तो. लायबा ने यूँ ही उससे पूछा उसे पूछा, उसे पता था वह कहीं नहीं जाती, मुझे सैफ-उल-मुलूक झील पसंद है क्योंकि मैंने सुना है वहाँ परियाँ उतरती हैं सानिया बात करते करते कहीं खो गई तो लायबा ने उसे कोहनी मारकर एहसास दिलाया कि वह अभी घर ही बैठी है जिस पर सबने जोर से कहकहा लगाया तो सानिया का मुँह फूल गया उसे लगा सब उसका मजाक बना रहे हैं, सानिया चुप करके वहाँ से उठ गई और अपने रूम में चली गई कि उसे लगता था यहाँ उसे समझने वाला कोई नहीं है
जिन्नात की दुश्मनी - पहला पार्ट । hindi kahani

फिर से नाराज कर दिया गुड़िया को अली भाई ने आते ही सबको गौर से नवाजा, क्या हुआ यहाँ किस बात पर बहस हो रही थी। बात तो कुछ भी नहीं आप को तो पता है न भाई सानिया जरा सी बात पर ही बिगड़ जाती है। अब्दुल्लाह ने सारी बात भाई को बताते हुए कहा अब रात बहुत हो गई है आप सब भी अपने रूम में जाओ, सुबह बात होगी। अली भाई ने जैसे ही बोला, सब उठकर चल दिए। सबके जाने के बाद अली सीधा सानिया के रूम में गया, तो देखा सानिया मुंह फुलाए बैठी थी, जैसे उसी का इंतजार कर रही हो। सानिया गुड़िया, आप भी जरा सी बात दिल पर ही ले लेती हो, हम सब आप के अपने हैं वह लोग बस मजाक कर रहे थे। हर बात दिल पर न लिया करो और रही बात सैफ-उल-मुलूक झील देखने की, तो मैं खुद अपनी गुड़िया को ले जाऊंगा। सानिया को बहुत खुशी हुई, थैंक्स भाई।
कुछ देर के लिए अली खामोश हो गया, फिर सानिया की तरफ देखते हुए कहा पर इससे पहले हमें गाँव जाना है, वहाँ अंकल हाकिम के बेटे की शादी है, चलो गी न। सानिया के चेहरे से एकदम जैसे खुशी गायब हो गई। साफ नजर आ रहा था कि वह गाँव नहीं जाना चाहती और वजह अली जानता था, लेकिन अली चाहता था वह हालात से मुकाबला करना सीखे, हालात से भागना नहीं। सानिया अली भाई को मना नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने गाँव जाने के लिए हाँ बोल दिया। तो अली उसे गुड नाइट कहकर अपने रूम को चल दिया। सानिया जब से आघा हाउस आई थी, अली भाई ने उसका हमेशा बहुत ख्याल रखा, उसे कभी महसूस नहीं हुआ कि अली उसका कज़न है, भाई नहीं।
यह अलग बात थी कि वह बाकी सब से अब तक घुल-मिल नहीं पाई थी। उसे आघा हाउस आए 5 साल हो चुके थे, मगर ऐसा लगता था जैसे उसकी जिंदगी वहीं रुक गई हो। घर के सब लोग उसे बहुत प्यार करते थे, दादा, दादी, ताया, ताई, चाचा, चाची सब उसका ख्याल रखते थे, मगर फिर भी वह गाँव में होने वाले उस खौफनाक वाकिये को भूल नहीं पाई थी। वह चाहकर भी भूल नहीं सकती थी।
सानिया सारी रात सो नहीं सकी। उसकी आँखों में साए से लहराने लगे थे। आँखें धुंधली हो रही थी। शायद वह रो रही थी। अपने प्यारों की जुदाई ने उसे तोड़ दिया था। क्या ऐसे अचानक भी एक पल में सब बदल जाता है? उसकी जिंदगी बिल्कुल ही बदल गई थी, मगर सानिया को आज फिर एक बार उस सियाह और दिल दहला देने वाली रात की हर बात याद आ रही थी। कभी किसी के रोने की आवाजें आती तो कभी चीखने की, कभी जोर-जोर से दरवाजे बजते भयानक और डरावनी आवाजें उसका दिल डूब रहा था। उन सदाओं पर जो उसके बाबा उसे दे रहे थे।
सानिया छत को घूर रही थी। आँखों में आंसू होने की वजह से जिसकी टाइलें उसे मद्धम सी नजर आ रही थीं। पता नहीं रात का कौन सा पहर था जब उस पर नींद मेहरबान हुई।
सुबह नाश्ते की टेबल पर अली ने सबको बताया कि वह लोग गाँव जाएंगे, तो दादा जी ने एक गहरी नज़र से अली को देखा और पूछा, "तो क्या सानिया भी जाएगी?" जी दादा जान, उसका जाना बहुत ज़रूरी है, अली ने कहा। एक बार फिर सोच लो बेटा, बस दादा जी अब आपकी दुआ चाहिए, यह फैसला बहुत सोच-समझकर किया है, मैंने कहा। गुड़िया नहीं आई नाश्ते के लिए, अली ने लायबा की तरफ देखते हुए पूछा।
वह बस आही रही है, लायबा ने नज़रें उठाए बिना अली को बताया। वह हल्के से मुस्करा दिया, उसे लायबा की यही अदा पसंद थी। अली और लायबा की मंगनी को तीन साल हो चुके थे, दोनों एक दूसरे को पसंद भी करते थे। अली लायबा से बहुत मोहब्बत करता था और मोहब्बत से बढ़कर उसकी नज़र में लायबा के लिए इहतराम था। लायबा को अली से मोहब्बत करने के लिए यह बात ही काफी थी, ऊपर से उसकी इतनी अच्छी पर्सनैलिटी, इतना अच्छा नेचर लायबा के तो मन की मुराद जैसे उसकी झोली में डाल दी गई थी।
और अली की वजह से ही लायबा और सानिया में कुछ थोड़ी बहुत समझदारी भी थी। जितना प्यार अली लायबा से करता था, उतना ही प्यार बल्कि इससे बढ़कर प्यार और देखभाल वह सानिया की करता था, क्योंकि वह उसके मरहूम चाचा की बेटी थी, जो उसे बहुत प्यार करते थे, बहुत लाड-प्यार करते थे। अब सानिया अली की जिम्मेदारी थी, इसलिए लायबा भी सानिया को हमेशा खुश रखने की कोशिश करती थी।
बेटा मुझे भी ले चल, मेरा बड़ा दिल करता है पिंड जाने को, दादी जान अली से कहने लगीं। तो अली ने दादी जान की तरफ देखते हुए कहा, दादो अभी नहीं, क्योंकि आपकी तबीयत ठीक नहीं रहती, आप पहले ठीक हो जाओ, फिर ले जाऊंगा। अली ने मुस्कराकर कहा।
और अली बेटा, कौन-कौन जा रहा है, रहमान साहब ने पूछा। बाबा जान, अब्दुल्लाह और अदील भी आजकल फ्री हैं और लायबा भी उनके साथ कहीं पिकनिक पर जाने की प्लानिंग कर रही थी, तो वह भी हमारे साथ ही आएगी और सानिया में चाचा जान और चाची जान, हम सब जा रहे हैं, बाबा आप और मामा दादा और दादी जान का ख्याल रखना, फरहान और मनाहिल भी यहीं रहेंगे, उनके कुछ एग्जाम हैं, अब जिन्होंने गाँव जाना है, वह सब अपनी तैयारी कर लें, हमें अस्र के टाइम निकलना है, इतना कहकर अली उठकर ऑफिस चला गया, जबकि आलिया बेगम (अली की मामा) और क़नीज़ बेगम (अली की चाची) बर्तन समेटने लगीं, रहमान साहब और नाजिम साहब भी ऑफिस को चल दिए। सानिया भी नाश्ते के नाम पर सिर्फ जूस पीकर अपने कमरे में आ गई और अपना बैग पैक करने लगी।
और साथ-साथ बीते समय की यादें उसके दिमाग में किसी फिल्म की तरह चलने लगीं।
अम्मी__ ! बाबा कब आएंगे, बहुत देर कर दी है आज तो बाबा ने , 13 साल की सानिया अपनी माँ से पूछ रही थी, क्योंकि पहले हर रोज ही उसके बाबा जल्दी घर आ जाते थे, क्योंकि उन्हें पता था इतने बड़े घर में उनकी पत्नी और बेटी और एक छोटा बेटा ही है बस, और उनकी हवेली नुमा घर के पास किसी का घर भी नहीं था, छोटा सा गाँव था, कम आबादी की वजह से सुनसान ही लगता था। इजाज़ अहमद की अपनी जमीन थी, जिसे वह बोते थे और फसल काश्त करते थे, इसी से गुजर-बसर हो रही थी।
एक दिन जब अस्र के समय इजाज़ अहमद अपनी फसल को पानी लगाने गए, तो पानी लगाने के बाद वह एक पेड़ के साये में बैठ गए, क्योंकि वह बहुत थक गए थे, लेकिन बैठते हुए उन्हें अपने नीचे कोई सख्त सी चीज महसूस हुई, तो उन्होंने वह ईंट का आधा हिस्सा उठाकर दूसरी तरफ झाड़ियों में फेंक दिया, लेकिन जैसे ही वह आराम से सीधे होकर बैठे, जोर-जोर से रोने की आवाजें आने लगीं। उन्हें ऐसा लगा जैसे सब कुछ हिल रहा है और पेड़ उनके ऊपर गिरने लगा है। उन्हें नहीं पता था उनकी यह छोटी सी गलती उनकी जिंदगी और फैमिली को तबाह कर देगी।
एकदम से किसी नज़र न आने वाली मखलूक़ ने उन्हें गले से पकड़ लिया। यह सब इतना अचानक हुआ कि इजाज़ अहमद समझ नहीं पाए कि यह सब क्या हुआ है। फिर एकदम से उनके सामने एक खौफनाक सूरत वाला इंसान नज़र आया, जिसने उन्हें गले से पकड़ रखा था। इसे देखते ही इजाज़ अहमद के होश गुम होने लगे। बहुत ही भयानक लाल सर, आँखें और चेहरे पर आड़ी-तिरछी लकीरें जिनसे खून बह रहा था।
अब वे अपनी आवाज़ निकालने की कोशिश ही कर रहे थे कि वे शोर मचाएं तो शायद कोई उनकी मदद को आ पहुँचे, कि दूसरी तरफ से एक और खूनख्वार आँखों वाली मखलुक़ नज़र आई। इजाज़ अहमद को लगा आज बस उनका बचना नामुमकिन है। इतने में उस खौफनाक मखलुक़ की आवाज़ आई, तुमने हमारे बच्चे को क्यों मारा? उसने तुम को कुछ नहीं कहा था, मगर हम अब तुम्हारी नस्ल खत्म कर के ही दम लेंगे। तुमने हमें जो दुख दिया है, हम भी तुम्हें वही दुख देंगे और तब तक तुम्हारा ज़िंदा रहना बहुत ज़रूरी है।
इजाज़ अहमद को अपनी फिक्र नहीं थी, मगर अपने बच्चों की फिक्र सता रही थी। उनकी बात सुनते ही इजाज़ अहमद बेहोश हो गए। इतने में बहुत रात हो चुकी थी। कुछ शहर से वापस आने वाले लोगों ने उन्हें कच्ची सड़क पर एक पेड़ के नीचे पड़े हुए देखा। पहले तो उन्होंने इजाज़ अहमद को होश में लाने की कोशिश की, मगर उन्हें होश नहीं आया तो वे लोग उन्हें उठाकर उनके घर ले आए, क्योंकि वे लोग इजाज़ अहमद को पहचानते थे, लेकिन जब वे लोग उन्हें घर लेकर आए और लिटाया तो पता चला उनके हाथ-पैर, यहाँ कि गला भी मुड़ा हुआ था।
सब लोग बहुत डर गए और तरह-तरह की बातें करने लगे। इतने में उनमें से एक आदमी बोला, कोई जाकर लतीफ शाह को बुला लाओ, मुझे यह डॉक्टरी मसला नहीं लग रहा। दो आदमी गए और शाह लतीफ को बुलाकर ले आए। शाह लतीफ जैसे ही घर में दाखिल हुए, उन्हें जोर से झटका लगा, लेकिन वे डरे नहीं और आगे बढ़े और इजाज़ अहमद के कमरे में गए। उन्होंने सब से कहा, आप सब लोग जाइए यहाँ से, बस फैमिली के लोग ही यहाँ रहें। तो सब लोग चले गए, बस हाकिम चाचा और उनके भाई रब नवाज़ रह गए।
शाह लतीफ ने इजाज़ अहमद को दम किया, आब -ए-ज़मज़म पर कुछ पढ़कर इजाज़ अहमद पर छिड़का और कमरे के कोनों में भी छिड़का, और हाकिम चाचा और रब नवाज़ चाचा को इजाज़ अहमद के पास रहने का बोलकर कमरे से बाहर निकल आए। और बाहर आकर उन्होंने रुकैया बेगम को बताया कि वह अपने बच्चों को लेकर दूसरे कमरे में रहे, और जितना हो सके बच्चों को इजाज़ अहमद से दूर रखे, कुरआन पाक की तिलावत करे, नमाज़ अदा करती रहे, अल्लाह ताला बड़ा मेहरबान है, सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन शाह जी उन्हें क्या हुआ है ? अभी जो बोला है, उस पर अमल करें, सुबह तक उसे होश आ जाएगा और सुबह आकर आप को बताएंगे पूरे मसले के बारे में, जी शाह जी ठीक है, इतना कहकर शाह जी चल दिए, तो वह भी बच्चों के पास दूसरे कमरे में आ गई और दरवाजा अंदर से बंद करके बैठ गई। देखा तो दोनों बच्चे रो रहे थे, पता नहीं हमारे बाबा को क्या हुआ है, आसिफ सानिया से पूछ रहा था और रो रहा था। सानिया तो खुद कुछ नहीं जानती थी, वह क्या बताती वह भी रोने लगी। रुकैया बेगम ने दोनों बच्चों को सीने से लगाया और कहने लगी, आपके बाबा को कुछ नहीं होगा, आप लोग दुआ करें अल्लाह ताला से वह सब ठीक कर देंगे।
कुछ देर के बाद आसिफ सो गया, तो रुकैया बेगम ने जाए नमाज़ बिछाई और उस पर बैठकर कुरआन पाक पढ़ने लगी। सानिया ने जब देखा तो वह भी कुरआन पाक लेकर माँ के साथ बैठकर पढ़ने लगी और अपने बाबा के लिए दुआएं मांगने लगी, मगर कुदरत ने तो कुछ और ही लिख दिया था उसकी किस्मत में जिसे उसकी दुआएं और आंसू भी बदल नहीं पाए थे।
अभी रात के 12 बजने वाले थे कि रुकैया बेगम ने सानिया से कहा, बेटा ज़वाल का समय शुरू होने वाला है, कुरआन पाक बंद करके रख दो और सो जाओ। तो सानिया ने कुरआन पाक उठाकर शेल्फ पर रखा और अपने भाई आसिफ के पास लेट गई, जबकि रुकैया बेगम भी कुरआन पाक बंद करके वहीं जाए नमाज़ पर बैठी रोने लगी, कि अब नहीं जानती क्या होने वाला है, उनका दिल बहुत घबरा रहा था, वह दुआएं मांग रही थी कि अल्लाह ताला उन पर रहम फरमाए।
इतने में कमरे में रखे टेलीफोन की घंटी बजी, एकदम से घंटी की आवाज से वह चौंक गई, फिर खुद को संभालकर फोन तक आई और फोन उठाया तो फोन पर शाह लतीफ थे, वह कह रहे थे, रुकैया बेगम मेरी बात गौर से सुनें, आप ने आज रात किसी तरह कमरे का दरवाजा नहीं खोलना, चाहे खुदा के वास्ते इजाज़ अहमद भी आप को पुकारे और दरवाजा खोलने को कहे, वह लोग आज रात बाहर नहीं आएंगे, क्योंकि उन्हें मैंने सब समझा दिया था और आपके और इजाज़ अहमद के कमरे का हिसार भी कर दिया था, और मुझे सुबह वहां आने में कुछ देर हो जाएगी, मैं अपने पीर साहब को साथ लेकर आऊंगा, क्योंकि मुझे नहीं लगता कि मुझसे यह मसला हल हो पाएगा, आप अपने बच्चों का ख्याल रखना, उन्हें कमरे से बाहर न आने देना, अल्लाह आप सब की हिफाजत फरमाएं। अल्लाह हाफ़िज़।
रुकैया बेगम बहुत घबरा गईं , वह पहले ही परेशान थी अपने शोहर को इस हालत में देखकर अब उन्हें लग रहा था कि उनके बच्चे भी खतरे में हैं, कोई भी तो नहीं था उनका इस गाँव में न तो मायका न ससुराल, बस एक इजाज़ अहमद के दोस्त हाकिम साहब के घर वालों से उनकी जान-पहचान थी। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था, तो बेबस होकर फिर से जाए नमाज़ पर बैठ गई और कुछ देर बाद रोते रोते उनकी आँख लग गई। थोड़ी देर ही गुजरी थी कि उन्हें अपने पास कुछ आहट सी महसूस हुई, जब उन्होंने देखा तो सानिया आहिस्ता कदम उठाती दरवाजे की तरफ जा रही थी और अब दरवाजा खोलने लगी थी। वह करंट की तरह उठी और सानिया को अपनी तरफ खींचकर पीछे किया, सानिया बेटा दरवाजा क्यों खोल रही हो, अम्मी वह हाकिम चाचा बुला रहे हैं उन्हें पानी चाहिए था, लेकिन बेटा मुझे तो कोई आवाज नहीं आ रही आप चुप कर के बैठ जाओ और मुझ से पूछे बिना दरवाजा मत खोलना।
इतने में बाहर आँगन से इजाज़ अहमद की आवाज आई, रुकैया बेगम दरवाजा तो खोल देखो मैं बिल्कुल ठीक हो गया हूँ, सानिया बेटा इधर बाहर आओ ना, सानिया बोलने ही लगी कि रुकैया बेगम ने उसके मुंह पर अपना हाथ रख दिया और इशारे से कहा बोलना मत। इतने में फिर से आवाज आई, रुकैया बेगम दरवाजा खोलो मुझे यह जानवर काट लेंगे, बहुत भयानक है यह और साथ ही इजाज़ अहमद के चिल्लाने की और कुछ अजीब सी जानवरों की आवाजें आना शुरू हो गईं और इजाज़ अहमद बस इतना ही कह रहे थे, मुझे अंदर आने दो वरना यह जानवर मुझे नोच नोचकर खा जाएंगे, यह मुझे मार देंगे।
रुकैया का एक बार तो दिल किया कि वह दरवाजा खोल दे, इजाज़ अहमद की पुकार में इतना दर्द था कि वह पिघल रही थी, मगर फिर उन्हें अपने बच्चों का ख्याल आया और शाह लतीफ ने जो कुछ बताया था कि कमरे का हिसार क्या है, तो दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए उनके कदम रुक गए। फिर बाहर से जोर-जोर से बर्तन गिरने और दरवाजे बजने की और चीखने-चिल्लाने की बहुत सी मिली-जुली आवाजें आने लगीं। सानिया को अपने बाबा पर बहुत रहम आ रहा था, वह रो-रो कर माँ से फर्याद करने लगी, प्लीज अम्मी जान दरवाजा खोल दो ना, वरना बाबा को कुछ हो जाएगा । कुछ नहीं होगा तुम्हारे बाबा को, सानिया मेरी तरफ देखो, मेरी बात गौर से सुनो, माँ ने फिर से शाह लतीफ की कही गई सारी बात सानिया को समझाई, तो वह कुछ हद तक संभली, लेकिन उसे यकीन ही नहीं आ रहा था, भला ऐसा कैसे हो सकता है, यह तो मेरे बाबा की ही आवाज है।
रुकैया बेगम ने सानिया से वादा लिया कि वह जिद नहीं करेगी और अपनी अम्मी की बात मानेगी। लेकिन वह रात दोनों माँ-बेटी ने कैसे काटी, यह उनसे बेहतर कोई नहीं जान सकता। इस एक रात ने सानिया को दर्द और डर, दुख और सब्र, अजीयत सब कुछ दिया था। रुकैया बेगम को लग रहा था जैसे यह उनकी जिंदगी की सबसे भयानक रात है, ऐसा लगता था इस रात की सुबह ही नहीं होगी, इतनी लंबी रात थी। पता नहीं कब दोनों माँ-बेटी जाए नमाज पर बैठी रोते रोते दुआएं मांगते हुए एक दूसरे का हाथ थामे सो गईं, उन्हें कुछ अहसास नहीं हुआ या शायद कुदरत को उन पर रहम आ गया था। फज्र की आजान हो रही थी जब रुकैया बेगम की आँख खुली, वह उठी, कमरे के वाशरूम में वजू किया और आकर नमाज पढ़ने लगी, इतने में सानिया की भी आँख खुल गई, वह भी वजू करके नमाज पढ़ने लगी और फिर दोनों माँ-बेटी ने सुबह के उजाले तक कुरआन शरीफ पढ़ा। किसी ने जोर से दरवाजा बजाया, बाजी रुकैया उठ के बाहर आ जाओ, सुबह हो गई है और पीर साहब भी आने वाले हैं।
यह हाकिम चाचा की आवाज थी और रुकैया बेगम ने शुक्र अलहम्दुलिल्लाह पढ़ा, और उठकर दरवाजा खोला। हाकिम भाई, आसिफ के बाबा अब कैसे हैं? बाजी, अल्लाह बेहतर करेगा, हाकिम भाई क्या मैं उन्हें देख सकती हूँ? जी जी, तुसी जाओ, पर बच्चियों को न ले जाना, शाह जी ने मना किया था। ठीक है, रुकैया बेगम जब एजाज़ अहमद के कमरे में गई, तो जैसे उनकी जान ही निकल गई। एजाज़ अहमद की गर्दन उल्टी एक तरफ थी, ऐसा लगता था जैसे लटकी हुई हो। हाथ पैर मुड़े पड़े थे। रुकैया बेगम उनसे बात करना चाहती थीं, उनसे पूछना चाहती थीं कि आखिर यह सब कैसे हुआ, मगर जैसे ही एजाज़ अहमद ने आँखें खोलीं, रुकैया बेगम की चीख निकल गई। उनकी आँखें इतनी लाल थीं जैसे खून निकल रहा हो, और वह कुछ कहना भी चाह रहे थे, पर आवाज ही नहीं निकाल पा रहे थे।
तो रुकैया बेगम की रही सही हिम्मत भी जवाब दे गई।
इतने में हाकिम चाचा कमरे में आए और रुकैया बेगम को यह कहकर चुप कराया कि बच्चों को कौन संभालेगा? नाले बहन जी, मैंने शहर फोन कर दिया है, आसिफ अहमद के वालिद और भाइयों को भी, वह भी आ जाएंगे। आप अपना दिल न ढाओ। रुकैया बेगम कमरे से बाहर निकली, तो सानिया छोटे भाई को लेकर खड़ी थी, सारी बात सुन और समझ चुकी थी कि उसे अपनी अम्मी को और ज्यादा परेशान नहीं करना। रुकैया बेगम ने सानिया को बोला कि आसिफ को नाश्ता कराओ और खुद भी कुछ खा लो, और खुद रुकैया बेगम पीर साहब के आने की तैयारी करने लगी। सुबह के 11 बजे पीर नासिर शाह साहब आए, नूरानी चेहरा, सफेद कपड़े, सफेद दाढ़ी, नीची नज़र। आते ही सबके सर पर हाथ रखकर दुआ दी, फिर चारपाई पर बैठ गए और शाह लतीफ से सारी स्थिति पूछी। शाह लतीफ ने जो कुछ महसूस किया, वह सब नासिर शाह को बताया, तो वह तसबीह पर कुछ पढ़कर इस्तिखारा निकालने लगे।
सानिया ने आसिफ को नाश्ता कराना था, हाकिम चाचा के कहने पर वह उनके घर चली गई थी, जो सानिया के घर से कुछ ही दूरी पर था। हाकिम चाचा की पत्नी ने उन्हें प्यार से गले लगाया और बैठने को कहा। कुछ देर बाद वह एक ट्रे में नाश्ता ले आई, तो सानिया ने आसिफ को नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद सानिया ने उनसे कहा कि हाकिम चाचा ने चाय का बोला था, तो वह सब के लिए चाय बनाने लगी और सानिया भी उनके साथ किचन में चली गई। आसिफ हाकिम चाचा के बेटे के साथ घर वापस आ गया था। घर आते ही पहले माँ को ढूंढा, तो वह पीर साहब के सामने चारपाई पर बैठी थी। बाकी सब भी पीर साहब के इर्द-गिर्द बैठे थे और पीर साहब उन्हें बता रहे थे कि इजाज़ अहमद पर जिन्नात का साया है और साया कैसे आया उन पर, यह बात भी सबको बता रहे थे। सब हैरान-परेशान उनकी बातें सुन रहे थे। इसका कोई हल तो होगा न पीर साहब? रुकैया बेगम जल्दी से बोली।
जी हल तो हर समस्या का ढूंढने से मिल जाता है, आप तहम्मूल से पहले मेरी बात सुनें, देखें यह जिन्नात मुसलमान नहीं हैं, वरना इनका हल तो जल्द निकल आना था। यह काफिर जिन्नात हैं, किसी चीज को नहीं मान रहे हैं। मुझे कुछ समय दें, मैं अपनी पूरी कोशिश करूंगा, आप अल्लाह ताला पर भरोसा रखें, इन्शाल्लाह सब कुछ ठीक हो जाएगा।
पहले तो आसिफ उनकी बातें सुनता रहा, जो उसे समझ नहीं आई, फिर वह चलता चलता अपने बाबा के कमरे में चला गया। पीर साहब एकदम से अपनी जगह से उठे, सबने हैरानी से उन्हें देखा। पीर साहब बलंद आवाज में बोले, मैंने कहा था बच्चों को इस कमरे से दूर रखना, आप ने मेरी बात पर गौर नहीं किया, इस कमरे का हिसार टूट गया है, आपका बेटा कमरे के अंदर चला गया है। यह सुनते ही रुकैया बेगम की जान हलक में आ गई, इससे पहले कि वह कमरे में जाती, कमरे से एक दिल दहलाने वाली चीख सुनाई दी। पीर साहब का चेहरा बुझ गया और फिर वह हुआ जो नहीं होना चाहिए था, रुकैया बेगम की गोद और मांग एक ही पल में उजड़ गई थी।