जिन्नात की दुश्मनी-दूसरा पार्ट। hindi kahani

इतनी जोर से चीखने की आवाज आई कि सब कमरे की तरफ दौड़ पड़े। (यह आवाज अजीज अहमद की थी) अजीज अहमद की आँखें ऊपर की तरफ लगी हुई थीं और ऐसा लग रहा था जैसे सांस रुक गई हो।जैसे ही पीर साहब की नज़र ऊपर उठी, उनके चेहरे का रंग बदल गया। उनके पीछे सबकी नज़रें ऊपर छत की तरफ उठीं, तो चार साल का आसिफ छत पर उल्टा चल रहा था। उसकी आँखें भी लाल थीं और वह सबको देखकर जोर-जोर से हंसने लगा।

जिन्नात की दुश्मनी-दूसरा पार्ट। hindi kahani

जिन्नात की दुश्मनी-दूसरा पार्ट। hindi kahani


रुकैया बेगम तो चीखते हुए रोने लगी और पीर साहब से कहने लगी, "पीर साहब, मेरे बेटे को बचा लो।"पीर साहब ने कहा, "सबर करो, बेटी। अनजाने में ही सही, गलती बहुत बड़ी हुई है।"

एजाज़ अहमद से । यह कहकर पीर साहब शाह लतीफ की तरफ मुखातिब होकर बोले, "आप जाओ देखो, सनिया बेटी कहाँ है? उसे अकेले न छोड़ना।"रुकैया बेगम को ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर के किसी ने टुकड़े-टुकड़े कर दिए हों। उनकी निगाह अपने पति की तरफ उठी, उनकी आँखों से आंसू निकल रहे थे, जैसे अपनी बेबसी पर रो रहे हों।

रुकैया बेगम ने इस एक रात और दिन में इतना कुछ देख लिया था कि वह अब होश खोने लगी थी। इतने में घर के अंदर कुछ लोग आए। यह आगा साहब, सनिया के दादा और दादी, ताया और ताई थे, और साथ में अली भी था।जैसे ही रुकैया बेगम ने इन सबको देखा, वह उनकी तरफ दौड़ी, मगर आधे रास्ते में ही बेहोश होकर गिर गई। इन सबने मिलकर उन्हें उठाया और चारपाई पर लिटा दिया।

दादी जान ने बहू को ऐसे देखा तो बहुत गमगीन हो गईं। उन्होंने बहू का माथा चूमा और रोने लगीं और कहने लगीं, "हाकिम पुत्र, मेरा पुत्र अजीज कहाँ है?"तो हाकिम चाचा ने दादू को इशारा करके कमरे का रास्ता बताया, मगर पीर साहब ने सबको रोक दिया कि कमरे में कोई नहीं जाएगा। इतने में शाह लतीफ हाकिम चाचा के घर से सनिया को बुला लाए, जो चाय बना रही थी। हाकिम चाचा की पत्नी ने कहा, "सनिया, बेटी, आप जाओ, मैं अभी चाय दे जाऊंगी।"


सनिया जैसे ही घर में दाखिल हुई, सब अपनों को देखा और दौड़कर दादू के गले लग गई और फूट-फूटकर रोने लगी। दादू ने उसे चुप कराया, तो उसकी नजर अपनी माँ पर पड़ी, जो बेहोश थी। ताई अम्मी उन्हें होश में लाने की कोशिश कर रही थी।


वह दौड़कर माँ के पास आई और कहा, "अम्मी, आप को क्या हुआ है? पहले ही बाबा हमसे बात नहीं कर रहे हैं, अब आप भी चुप कर गई हो? अम्मी, आँखें खोलिए, देखिए आपकी सानिया आपको बुला रही है। प्लीज, मेरी तरफ देखिए ना। आप अगर बात नहीं करेंगी तो मैं आपसे नाराज हो जाऊंगी।"


वहाँ पर जितने लोग थे, सबका दिल सानिया की बातों से भर आया और उधर पीर साहब ने सबको मना किया कि अजीज अहमद के कमरे में कोई नहीं जाएगा।


पीर साहब कमरे में बैठकर बच्चे पर दम कर रहे थे कि किसी तरह वह मखलूक बच्चे को छोड़ दे। बहुत मुश्किल था बच्चे की जान बचाना, क्योंकि जो वे जिन्नात चाहते थे, वही उन्हें हासिल हो चुका था। वे अजीज अहमद की आँखों के सामने उनकी नस्ल खत्म करना चाहते थे और अब आसिफ उनके बस में था।


इतने में शाह लतीफ गाँव के छोटे से क्लिनिक से कम्पाउंडर को बुला लाए, जिसने रुकैया बेगम को चेक किया और बताया कि उन्हें हार्ट अटैक हुआ है। जल्दी से शहर ले जाओ, वरना...
दादू ने अली से कहा, "बेटा, सनिया को यहाँ से ले जाओ, वरना वह अपनी माँ को नहीं ले जाने देगी।" लेकिन शाह लतीफ ने उसे घर से बाहर जाने से मना किया और उन्हें लेकर एक कमरे में चले आए।


सनिया को अपने पास बुलाकर उसे एक तावीज़ दिया और कहा, "बेटी, इसे कभी भी गले से न उतारना, चाहे कोई भी उतारने को कहे। समझी?" और उसे बताया कि यह विशेष रूप से उसके लिए पीर साहब ने बनाया था।
इतने में कमरे से आसिफ की आवाज़ आई, "आपी मुझे बचा लो, ये लोग मुझे मार रहे हैं! आपी आप कहाँ हो?" सनिया ने आसिफ की आवाज़ सुनी और उस कमरे की तरफ दौड़ी, जैसे ही कमरे में पैर रखा, वह इतनी जोर से बाहर सहर में जा गिरी कि उसे ऐसा लगा जैसे उसने किसी बिजली की नंगी तार को छू लिया हो।


लेकिन वह इतने आराम से ज़मीन पर बैठी थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं (किसी ने उसे गिरने से बचाया था, लेकिन जैसे ही मुड़कर देखा, तो कोई भी नहीं था)।
अली ने भागकर उसे उठाया और कहा, "गुड़िया, तुम्हें कोई चोट तो नहीं लगी?" सनिया ने कहा, "नहीं, भाई, मैं ठीक हूँ। आप बस मेरे आसिफ को बचा लो, भाई, प्लीज।" यह कहकर सनिया अली के कंधे से लगकर रोने लगी।


इतने में पीर साहब ने आब-ए-ज़मज़म पर कुछ पढ़कर दम किया और पानी छत की तरफ उछाल दिया। जैसे ही पानी बच्चे पर गिरा, वह चीखने लगा और बोला, "पीर साहब, आप नहीं जानते इस आदमी ने हमारे साथ बहुत बुरा किया है। जो तकलीफ उसने हमें दी है, हम भी उसे देंगे। आप चाहे जो कर लो, बदला तो हम ले कर ही रहेंगे।"


पीर साहब ने कहा, "मैं सब जानता हूँ जो आपके साथ हुआ। वह अनजाने में हुआ, मगर जो आप लोग कर रहे हैं, वह जानबूझकर कर रहे हैं। दोनों बातों में बहुत फर्क है। यह सब करके क्या आप अपना बच्चा वापस पा लेंगे? इस बच्चे को छोड़ दें, यह कहकर थोड़ा और पानी बच्चे पर डाला। लेकिन जैसे ही बच्चे पर पानी गिरा, वह जिन्नात गुस्से में आ गए। अब आसिफ दीवारों से टकरा रहा था, उसके सर से खून निकल रहा था, वह रो रहा था, अपनी माँ को "आपी" को बाबा को सबको मदद के लिए बुला रहा था।


सनिया दरवाजे के बाहर खड़ी सब देख रही थी। उसे भूल गया था कि उसकी माँ बेहोश है, उसके बाबा को जिन्नात ने तोड़कर रख दिया है। उसे बस आसिफ की फिक्र थी, आसिफ की हालत से वह बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।
दरवाजे पर खड़े सब लोगों का दिल ग़ोते खा रहा था। सनिया अंदर आना चाहती थी, मगर अली ने उसका बाजू थाम रखा था। वह रोने के सिवा कुछ नहीं कर सकती थी।
पीर साहब बहुत हुआ , "अब आप वार सोच समझकर करना, क्योंकि इन्हें तो हम छोड़ेंगे नहीं, किसी भी कीमत पर। और अगर आप ने अब बांधा डाली, तो आप भी नहीं बचोगे।"


पूरा कमरा जिन्नात की आवाज से गूंजने लगा। पीर साहब की जिंदगी में पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी ने उन्हें ललकारा था। अब उन्हें यकीन हो गया था कि बात बहुत बिगड़ गई है।
उन्होंने हर तरह से कोशिश कर ली थी, मगर बे सूद। और वह डरने वालों में से नहीं थे। उन्होंने कुछ देर आंखें बंद कीं, कुछ पढ़ने लगे, फिर उनकी तरफ फूंक मारी और आंखें खोलीं। फिर दम किया, हुआ पानी आसिफ पर छिड़का।


जैसे ही पानी आसिफ पर गिरा, पीर साहब को किसी अनजान शक्ति ने जोर से धक्का दिया। वह हवा में उड़ते हुए जोर से बाहर आ गिरे और दरवाजा बंद हो गया।


शाह लतीफ ने पीर साहब को उठाया, जो काफी जख्मी हो चुके थे। उनका सर दीवार से टकराया था। जल्दी से उनके सर पर पट्टी की गई। अब सब सोच रहे थे कि अगर पीर साहब का यह हाल है, तो... मतलब यह उनके बस की बात नहीं है, और यह सच भी था, मगर सिर्फ़ इस लिए क्योंकि एक तो अजीज अहमद कसूरवार थे, ऊपर से आसिफ ने अंदर जाकर हिसार तोड़ दिया और जिन्नात भी काफिर थे। पीर साहब खुद परेशान थे कि आज तक जब भी ऐसा कोई मामला उनके पास आया, उन्होंने सबकी मदद की थी, और इतनी मुश्किल स्थिति कभी नहीं हुई थी।

जिन्नात की दुश्मनी और बे लौस मोहब्बत की कहानी 

अचानक से पीर साहब को वह परिंदा याद आया, जो आज सुबह आते ही झूले वाले पेड़ पर उन्हें दिखा था। पीर साहब को दूर से ही उसकी ताकत का अंदाजा हो गया था। उन्हें लगा कि कहीं यह इस सारे मामले में शामिल न हो। वह उस पेड़ के पास चले गए और उन्होंने कुछ पढ़कर उस पर फूंका। वह वहाँ से उड़ा और आकर पीर साहब के सामने मानव रूप में खड़ा हो गया और सलाम किया। उन्होंने सलाम का जवाब दिया और जान गए कि यह मुसलमान है।


पीर साहब ने रौबदार आवाज में पूछा, "तुम कौन हो और यहाँ क्या कर रहे हो?" उसने पहले नजर उठाकर उन्हें देखा, और फिर नजर झुकाकर बात शुरू की।


"मैं आपकी हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं समझता। आपने मुझे मेरे (आका-ए-दो जहां सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की कसम दी। इसलिए मुझे आपके सामने हाजिर होना पड़ा। मगर मैं आपका गुलाम नहीं हूँ।"
उसकी आवाज में अदब और ठहराव था, बड़ी धीमी सी आवाज थी। पीर साहब ने उसे बताया कि वह अजीज अहमद के सिलसिले में उनके घर जा रहे हैं और इस्तिखारे में तुम भी उसी घर से मंसूब नजर आते हो। मैं नहीं जानता क्यों और तुम कुछ बताना नहीं चाहते, तो मैं तुम्हें तुम्हारे आका-ए-दो जहां की कसम देता हूँ। जब तक मैं यहां हूँ, तुम किसी मामले में दखल नहीं दोगे।


अब पीर साहब को लग रहा था कि शायद वह कुछ कर सकता है, क्योंकि लोहे को लोहा काटता है और आग को आग। मगर इसके लिए उन्हें उसके पास जाकर उसे कसम से आजाद करना था।
पीर साहब और शाह लतीफ दोनों झूले वाले पेड़ के पास चले गए। सनिया ने बंद दरवाजे को बाहर से बजाना शुरू कर दिया। कुछ देर के बाद दरवाजा खुद ही खुल गया। जिन्नात एकदम से बच्चे के शरीर से निकले और अजीज अहमद के शरीर को अपना बसेरा बनाया। नन्हा आसिफ एक लम्हे में ज़मीन पर गिर गया। उसका खून सारे कमरे में फैल गया।


सनिया की चीखें सारे घर में गूंजने लगीं। उसके कदम दरवाजे पर जैसे जम से गए थे। वह बे यकीनी से आसिफ को देख रही थी। जब पीर साहब पेड़ के पास गए, तो वह वहीं खड़ा था और उसकी आंखों में आंसू थे।
अब क्यों आए हैं आप? यहां जो होना था, वह हो गया। मैं कुछ नहीं कर सका और इस बात का दुख मुझे हमेशा रहेगा। वह चेहरा मोड़ गया और पीर साहब बहुत कुछ समझ गए। तुम्हें आजाद करने आए हैं और उन जिन्नात को सबक सिखाना है। हमें इल्म हो गया है कि तुम कौन हो।


पीर साहब ने उसे कसम से आजाद किया और वह उसी पल गायब हो गया। आसिफ का खून कमरे में गिरने से सारे हिसार टूट गए थे। सनिया की चीखें सुनकर सब लोग दौड़कर कमरे में आए, लेकिन कमरे का हाल देखकर हर आंख अश्कबार थी।


सनिया अपने भाई के पास बैठी थी, उसके हाथ उठाकर अपने मुंह पर लगा रही थी। सनिया उस समय कितनी अज़ियत में थी, इसका अंदाजा करना मुश्किल था। वह चीख रही थी, रो रही थी, क्योंकि उसने जान लिया था कि आसिफ अब नहीं रहा। लेकिन यह क्या? अजीज अहमद के भी मुंह, नाक और कानों से खून निकल रहा था। उन जिन्नात ने उन्हें भी मार डाला था।


सनिया "बाबा, बाबा" पुकारती हुई अपने पिता के ऊपर गिर गई। उसे उठाकर साथ वाले कमरे में ले गए। सब जानते थे कि इस बच्ची ने छोटी सी उम्र में बहुत बड़ी कयामत देखी है। ऐसा लगता था कि एक कयामत आकर गुजर गई हो। नन्हा आसिफ और अजीज अहमद अब नहीं रहे थे। वह घर अब घर नहीं लग रहा था। हर तरफ बीन और आह-ओ- बका थी।


एजाज़ अहमद के कमरे का दरवाजा एक बार फिर बंद हो चुका था। अब की बार कमरे से बहुत सी खौफनाक आवाजें आती रहीं, मगर अब सब जानते थे कि अंदर कोई नहीं है। बस पीर साहब जानते थे कि वह अंदर ही है, वह परिंदा, वह रक्षक जो अपनी जान की फिक्र किए बिना सानिया के दुश्मनों से लड़ रहा था।


रुकैया बेगम को भी शहर के हॉस्पिटल पहुंचा दिया गया था, जहां उनका इलाज चल रहा था। पीर साहब और शाह लतीफ जानते थे कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। सानिया तो महफूज थी, उसका रक्षक उसके साथ था, मगर रुकैया बेगम का कुछ कहा नहीं जा सकता था।


पीर साहब ने सानिया के दादा जी को बुलाकर उन्हें बताया कि वे लोग अभी भी खतरे में हैं। दादा जी अपने बेटे और पोते को खो चुके थे, अब अपनी पोती और बहू को नहीं खोना चाहते थे। दादा जी ने कहा, "आप जो कर सकते हैं, करें। हमें भी बताएं कि हमें आगे क्या करना है।"


तो पीर साहब बोले, "सबसे पहले यह हिफ़ाज़ती तावीज़ अपनी बहू तक पहुंचा दें, उसके गले में डाल दें। यह बहुत जरूरी है। बाकी सारा काम कफन-दफन के बाद देखेंगे।"


फिर आसिफ और एजाज़ अहमद को गुसल और कफन दिया गया और मय्यतें आँगन में रखी गईं। दादी जान तो रो-रो कर अधमरी हो चुकी थीं। सानिया को होश में लाने की किसी में हिम्मत नहीं हो रही थी। सब यही सोच रहे थे कि उसे कैसे संभालेंगे, कैसे दिलासा देंगे। एक 13 साल की मासूम सी बच्ची और चेहरे पर इतनी अजीयतें लिखी थीं। उसकी गोरी शफ्फाक रंगत पीली पड़ चुकी थी। नीली आंखों के इर्द-गिर्द आंसुओं के निशान थे। सियाह बाल बिखरे हुए थे।


वह उसके पास आया और हल्के से दिल में अहद किया कि आज से तुम्हारे दुश्मन मेरे दुश्मन हैं। सानिया, जो दुख तुम्हें मिलने थे, मिल चुके हैं। अब मैं कोई दुख तुम तक पहुंचने नहीं दूंगा। उसने हल्के से उसके चेहरे को छुआ। सानिया, उठो, अपने बाबा और भाई का आखिरी दीदार कर लो।


सानिया को एक झटका लगा। उसने आंखें खोलीं, तो सामने अली खड़ा था। गुड़िया आओ, दादो बुला रही है। अली भाई, यह सब क्या हो गया है? आप कह दो न यह सब सपना है, कोई भयानक सपना। गुड़िया काश मैं यह कह पाता कि यह सपना है। अली ने यह कहकर बे इख्तियार उसे गले से लगा लिया और सानिया रो दी। अली उसे संभाल कर बाहर ले आया और अपनी अम्मी को आवाज दी, तो वे अपने साथ सानिया को आँगन में ले गईं, जहां हर तरफ से रोने की आवाजें आ रही थीं।


सानिया का दिल डूब कर उभर रहा था। उसे अपनी मां की फिक्र हो रही थी। अम्मी कैसे देखेंगी आसिफ की यह हालत। फिर उसने ताई से अम्मी का पूछा, तो उन्होंने उसे सब सच बता दिया और उसने भी और कोई बात नहीं की, बस जाकर उन दो मय्यतों के पास बैठ गई। सब आकर उसे गले लगा रहे थे और पता नहीं क्या-क्या कह रहे थे। उसे कुछ खबर नहीं थी। बस उसे इतनी खबर थी कि उसका घर उजड़ गया है, जो अब पहले की तरह कभी आबाद नहीं होगा, न उसके बाबा आएंगे, न आसिफ। और अम्मी न जाने किस हाल में है।


उसे लगता था कि वह बिल्कुल अकेली हो गई है। लेकिन कोई था जो हर लम्हे हर पल उसके साथ रहने की कसम खा चुका था। मगर सानिया इस सब से अनजान अपने गम में डूबी हुई थी। जब मय्यतों को दफनाने के लिए ले जाने लगे, तो सानिया को लगा कि अब उसकी सांस भी टूट जाएगी। मगर कहां वह बाबा बाबा रोती कुरलाती रही और लोग उसके जान से प्यारे भाई और बाबा को दफनाने के लिए ले गए। ताई चची और दादो ने उसे संभाला। दादो ने सीने से लगा कर कहा।


पुत्र तेरा ओ पियो सी,, ते मेरे वी जिगर दा टुकड़ा सी.. संभाल पुत्र अपने आप नू, अल्लाह दी मर्जी ही एंज सी.. ओंधी शै सी उस ही वापस लै लई।


दफनाने के बाद बाकी सब लोग घरों को चले गए। दादी जान सानिया को उसके कमरे में ले गई। उसका सिर अपनी गोद में रखकर सर सहलाने लगी और सानिया से बातें करती रही। कुछ ही देर बाद सानिया सो गई। दादी ने उसके माथे पर बोसा दिया और वहीं तसबीह लेकर बैठ गई। सब लोग जा चुके थे, बस सानिया के दादा दादी, ताया ताई रह गए थे और अली भी रह गया था। चाचा चची रुकैया बेगम को देखने चले गए थे।


शाम को सब ने एक दूसरे को थोड़ा बहुत खाना खिलाया। ताई अम्मी ने लाईबा से कहा, "सानिया को भी कुछ खिला दो, पता नहीं कब से भूखी होगी।" तो अली और लाईबा खाना लेकर सानिया के पीछे गए, मगर वह अपने कमरे में नहीं थी। सानिया सामान पैक करके बेड पर टांगें लटकाए बैठी थी। और उसे ऐसे बैठे पता नहीं कितना समय गुजर गया था। उसे खुद नहीं मालूम था कि वह कितनी देर से ऐसे बैठी थी। चेहरे पर आंसुओं के निशान थे। शायद वह रो भी रही थी, मगर उसे होश कहां था? वह तो दूर कहीं अपने माज़ी में खोई हुई थी।


लाईबा ने उसे ऐसे बैठे देखा तो घबरा गई। "सानिया, क्या हुआ? तुम ऐसे क्यों रो रही हो? और कब से ऐसे बैठी हुई हो?" उसने सानिया को जोर से हिलाया, तो जैसे सानिया को होश आया। "हम्म..." सानिया के मुंह से बेसाख्ता निकला, तो लाईबा ने पूछा, "क्या हुआ?" और फिर जैसे उसकी हालत को देखते हुए समझ गई और कहने लगी, "क्यों इतनी अजीयत देती हो खुद को?"


"यह सब तो जिंदगी भर के लिए अब मेरे साथ ही है, मैं चाहकर भी नहीं भूला सकती। वह सब कुछ जो मेरे साथ हुआ है, सानिया ने बोलते हुए एक आह भरी और अपना चेहरा साफ किया। तो उसे अजान की आवाज सुनाई दी। वह इतने समय ऐसे बैठी रही, अब जोहर का समय हो गया था। वह उठी, लाईबा, आपको मुझसे कोई काम था क्या? नहीं, काम तो नहीं था, मैं बस यहां से गुजर रही थी, तुम्हें ऐसे बैठे देखा तो अंदर चली आई।

जिन्नात की दुश्मनी-पहला पार्ट

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और हां, वह तुम्हारा सुल्तान पिंजरे में फड़फड़ा रहा था, शायद तुमने उसे आज दाना पानी नहीं दिया।"


"ओह, मैं भूल गई, अच्छा मैं वजू करने जा रही हूं, अभी उसे भी देख लूंगी। मैंने कुछ बुक्स रख़नी थीं अपने बैग में, वह रख लूं," कहती हुई लाईबा भी कमरे से निकल गई। तो सानिया ने वजू किया और जाए नमाज बिछाकर नमाज अदा की और अल्लाह ताला से दुआ मांगने लगी, "या अल्लाह, मेरी अम्मी जान को ठीक कर दो, पिछले पांच साल से हर रोज वह एक यही दुआ मांगती आई थी। रोते हुए सानिया अपने अल्लाह से अपने लिए सब्र और बाबा के दर्जात की बुलंदी की दुआ करने लगी। उसे फिर से आसिफ की याद आने लगी थी। वह अपने भाई से बहुत प्यार करती थी। उसकी छोटी-छोटी बातें, उसकी शरारतें, वह दोनों मिलकर झूला झूलने जाते थे और सुल्तान को देखकर अक्सर वह कहता था, "दिल करता है इसे पकड़ लो, कितना प्यारा है यह।"


उसे याद आया कि सुल्तान को दाना डालना था। वह उठी, जाए नमाज उठाकर अलमारी में रखी और कमरे से निकलकर बाहर लान में आई। तो उसने सुल्तान को बहुत बेचैन देखा। वह शर्मिंदा सी हुई और सुल्तान के पास जाकर खड़ी हो गई। क्योंकि उसने कल से सुल्तान को ना दाना डाला था, ना उससे कोई बात की थी। वरना तो वह हर रोज उसे तीन टाइम समय से दाना पानी डाल देती थी और उससे बातें भी करती थी। और उसे लगता था सुल्तान उसकी बातें सुनता है और समझता भी है।


"सॉरी सुल्तान," सानिया ने अफसोस से कहा और ताजा पानी उसके बर्तन में डाला और साथ पड़े छोटे बर्तन में दाने रखे और बड़े गौर से उसे देखने लगी। उसे इस खूबसूरत परिंदे से बहुत लगाव हो गया था। वह जब भी परेशान या दुखी होती थी, तो सुल्तान से बात करती थी। अब भी वह सुल्तान को बता रही थी कि वह आज गांव जाने वाले हैं और सुल्तान ने खाना खाना छोड़ दिया था। जैसे उसकी बात गौर से सुन रहा हो। तुम जाओगे मेरे साथ? सानिया ने जैसे पूछा था, तो सुल्तान अपनी मुख्य आवाज में चहचहाया, जैसे कह रहा हो, "हां, मुझे भी अपने साथ ले चलो।"


तुम्हें तो अपने साथ ही ले जाऊंगी, वरना मैं वहां दिल की बातें किससे करूंगी? यह कहकर सानिया हल्का सा मुस्कराई। ऐसा लगा जैसे पतझड़ में पेड़ों पर फूल खिल गए हों। किसी की नजर सानिया पर टिक गई और उन नज़रों ने इस एक पल की मुस्कराहट को आंखों में कैद कर लिया था।


इतने में सहन से अली की आवाज आई, "सब तैयार हो जाओ।" अली की आवाज सुनते ही सानिया भी सहन में आ गई। अपना-अपना सामान लिए सब वहीं मौजूद थे। वह भी कमरे से अपना सामान लेने चली गई। जब वह बाहर आई, सब गाड़ी में बैठ चुके थे। अली ने सानिया से उसका बैग लिया, तो सानिया लान से सुल्तान का पिंजरा भी उठा लाई। अब्दुल्लाह मुस्कराया, "अब यह जनाब भी साथ जाएंगे।" मतलब वहां भी हमें कोई मुंह नहीं लगाएगा। अली ने अब्दुल्लाह को घूरा, वह हंसता हुआ गाड़ी में बैठ गया। तो सानिया भी गाड़ी में बैठ गई। दादो ने सानिया से कहा, "पुत्तर, अपना ख्याल रखी।"


तो वह हल्के से मुस्कराई, "जी दादो, आप भी अपना ख्याल रखें, दवाई समय से लेना।" अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि गाड़ी गांव की तरफ जाने वाले रास्तों पर दौड़ पड़ी। सानिया ने एक नजर सुल्तान को देखा, जो उसके सामने अपने पिंजरे में फ्रंट पर बैठा उसे देख रहा था। सानिया ने आंखें बंद की और सीट के साथ टेक लगा ली। और एक बार फिर माज़ी उसकी सोचों पर हावी हो गया था।

फ्लैश बैक : सब लोग एक खुले हॉल कमरे में पीर साहब के पास बैठे थे। सानिया की आंख एकदम से खुली, वह कमरे में अकेली थी। उसका दिल बहुत घबराया, तो वह छत पर आ गई। शाम का समय था, कुछ देर ऐसे ही बैठी रही, अचानक ही उसकी नजर अपनी छत के एक कोने पर पड़ी। वहां वही खूबसूरत परिंदा बैठा था, जिसका नाम प्यार से उसने सुल्तान रखा हुआ था। सानिया को लगता था कि उसके पूरे गांव में सुल्तान जैसा कोई परिंदा नहीं है। वह बहुत प्यारा था और सानिया बचपन से उसे देखती आई थी। वह रोज उसे देखती थी, कभी अपनी छत पर तो कभी उस पेड़ पर जिस पर झूला लगा था। सानिया को झूला झूलना बहुत पसंद था और उसे पता होता था कि वहां सुल्तान भी होगा, तो वह अक्सर उसके लिए दाना ले जाती थी।


सानिया को ऐसा लगा जैसे वह परिंदा भी उसके गम में शरीक होने आया हो। वह उठी और उसके पास चली गई। इतने अरसे में आज पहली बार सानिया ने उस परिंदे को छुआ था, उसके पंखों को सहलाया था। वह परिंदा उड़ा नहीं, गर्दन झुकाकर प्रसन्न हो गया, जैसे उसे भी सानिया का सहलाना अच्छा लगा हो। सानिया कुछ देर तक यूं ही खड़ी रही, मगर फिर उसकी आंखें भर आईं। शायद बाबा और भाई की बातें याद आ रही थीं और सानिया फिर से अपनी जगह पर आकर बैठ गई और वह परिंदा भी एक बहुत दर्दनाक आवाज निकालकर उड़ गया।


इतने में अली और लाईबा भी छत पर आ गए और आकर सानिया के पास बैठ गए। एक ट्रे में खाना भी ले आए। लाईबा उसे समझा रही थी कि उनकी जिंदगी उतनी ही थी, अल्लाह की मर्जी ऐसी ही थी। तुम कुछ खाओ, प्लीज। सानिया मुंह दूसरी तरफ मोड़ गई, तो अली ने कहा, "अच्छा, न खाओ, पर अपनी अम्मी के बारे में तो सोचो, उनका ख्याल तुमने ही तो रखना है। अपना ख्याल खुद नहीं रखेगा, तो उन्हें कैसे संभाल पाओगी, बताओ, गुड़िया।"


सानिया ने एक नजर अली की तरफ देखा और ट्रे उठाली, दो निवाले जहर मार किए और कुछ देर बाद वह उनके साथ ही नीचे आ गई थी। पीर साहब ने सानिया को बुलाया था, तो सानिया हॉल कमरे में पहुंची। पीर साहब ने उसे अपने पास बिठाया और कहा, "बेटा, अब हमें इजाजत दें, बेटा। हम आपसे बहुत शर्मिंदा हैं, हम चाहकर भी आपके बाबा और भाई को नहीं बचा पाए। बेटे, यह सब अल्लाह ताला के इख्तियार में होता है, जिंदगी मौत का फैसला वही पाक ज़ात करती हैं। हम इंसान तो कोशिश ही कर सकते हैं, बाकी इख्तियार तो उसी के पास हैं। अल्लाह आपके नसीब अच्छे करे और आपकी अम्मी को सेहत वाली जिंदगी अता फरमाए, आमीन।"


अभी पीर साहब अपनी बात पूरी ही कर रहे थे कि शाह लतीफ ने उन्हें दूसरे कमरे में आने का इशारा किया। वह कमरे में पहुंचे ही थे, कि मुड़कर दरवाजे पर निगाह पड़ी।


एक सुंदर नौजवान, जो किसी रियासत का शहजादा लग रहा था, लंबा कद, रोशन चेहरा, बिखरे बाल, चमकदार आंखें... उसने कमरे में आते ही सलाम किया। पीर साहब ने सलाम का जवाब दिया। आप जा रहे हैं? एक मुखतसर सवाल किया। हां, अब यहां रुककर और क्या करना? आप जानते हैं कि अब अगला वार वह आप पर करेगा। थोड़ा सावधानी से रहें। वह मुस्कराकर कह रहा था। जानता हूं, बरखुरदार। और अब तो आपको भी कुछ-कुछ जानने का मौका मिल गया है। यह तो बहुत अच्छी बात है। उसने सिर झुकाते हुए कहा। तुम सानिया का ख्याल रखना। मैं इसीलिए जा रहा हूं क्योंकि मुझे पता है कि तुम उसकी रक्षा करोगे और मुझसे बेहतर करोगे। पीर साहब की बात पर वह एक बार फिर मुस्कराया और बोला, इसके लिए मुझे उसके साथ रहना होगा। आप उसे शहर भेज रहे हैं और मेरे पास अभी उतनी शक्ति नहीं है कि मैं उसके पीछे जा सकूं। आप यह भी जानते होंगे कि मुझसे मेरी शक्तियां कुछ समय के लिए छीन ली गई हैं। मैं जब तक उसके साथ हूं, उसकी रक्षा मेरी जिम्मेदारी है। यह कहकर वह फिर से परिंदा बनकर उड़ गया।


हम्म्म, पीर साहब कुछ देर सोचते रहे और फिर कमरे से बाहर चले आए। वह जन्नत के एक शक्तिशाली कबीले हनून के सरदार का एकलौता और लाडला बेटा आज़र शाह था। उसके माता-पिता को दुश्मन कबीले ने मार डाला था, क्योंकि उनके पास बहुत शक्तियां थीं। उनकी शक्तियों को छीनने के लिए यह सब किया गया था, लेकिन उनके कबीले की रस्म के अनुसार सारी शक्तियों का वारिस सरदार का बेटा था, जिसका बहुत से जिन्नातों को इल्म ही नहीं था।


आज़र शक्तियों से भरपूर नौजवान जिन्न था। अपने माता-पिता के बेगुनाह क़त्ल किए जाने पर वह आपे से बाहर हो गया और दुश्मन कबीले के बहुत से जिन्नातों को मिट्टी में मिला दिया। बहुत कोशिश के बाद हनून कबीले के कुछ बड़े जिन्नातों ने उसे संभाला और आगे से उसे किसी का भी खून न बहाने का वादा लिया गया। और वादा तोड़ने पर उसकी शक्तियां छीन लेने की सजा दी गई थी। बड़े जिन्नातों का कहना था कि आज़र हनून कबीले का अगला सरदार है, इसलिए आज़र में हर फैसला सोच-समझकर करने की सलाहियत होनी चाहिए। उसे अभी सिर्फ़ आगाह किया गया था।


इन सब बातों से बहुत अरसे तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा, लेकिन फिर जब इजाज़ अहमद और आसिफ को बेरहमी से मार डाला गया, तो आज़र के अंदर एक लावा उबलने लगा। उसके माता-पिता का गम ताज़ा हो गया था और सानिया का एक-एक आंसू आज़र के दिल पर गिर रहा था। इन सब में वह अपना वादा भूल बैठा। उसने उन जिन्नातों में से एक को बहुत बुरी मौत दी और दूसरा बुरी तरह जख्मी हो गया था और उसी पल उसकी शक्तियां छीन ली गईं थीं। अगर उसे कुछ पल की और मोहलत मिली होती, तो दूसरा भी अपने अंजाम को पहुंच चुका होता।


पीर साहब हॉल कमरे में आए । सब उनके इंतजार में बैठे थे। सानिया भी वहीं बैठी थी। पीर साहब अपनी विशेष जगह पर आकर बैठ गए। इतने में बाहर से एक परिंदा उड़ता हुआ हॉल कमरे में प्रवेश किया और पीर साहब के हाथ पर जा बैठा। उन्होंने एक छोटा पिंजरा मंगवाया और इस परिंदे को उस पिंजरे में बंद करके सानिया से मुखातिब हुए, "बेटा, यह हमारी तरफ से तोहफा है। इसे अपने साथ रखना।"


सानिया ने पहले पीर साहब की तरफ देखा और फिर पिंजरे में कैद उस परिंदे को देखा। यह तो सुल्तान है। वह सुल्तान को पहचानती थी, लेकिन पीर साहब से कोई सवाल नहीं कर सकी। अब से यह हमेशा आपके साथ रहेगा। मेरी तरफ से तोहफा समझो या कुदरत का तोहफा।


सानिया ने पीर साहब को देखकर सहमति में सिर हिलाया और पिंजरा उनसे ले लिया। उन्होंने उसके सिर पर शफकत भरा हाथ रखा। कुछ देर बाद सानिया हॉल कमरे से बाहर निकल आई और अपने कमरे में चली गई। पीर साहब भी इजाजत लेकर रुखसत हो गए। शाह लतीफ भी उनके साथ ही घर को चल दिए। रात बहुत हो चुकी थी। सब लोग सोने के लिए अपने-अपने कमरों में चले गए। ताई ने सानिया और लाईबा को भी सोने का बोला और कमरे से चली गई। लाईबा तो कुछ देर बाद ही सो गई थी, लेकिन सानिया काफी देर तक जागती रही। मगर अब वह किसी की हिफ़ाज़त में थी। वह जो उसे ही देख रहा था।


आगे की कहानी : चाची ने सानिया को हिलाया, "बेटा, उठ जाओ।" वह सोयी हुई नहीं थी। एक बार के उठाने पर ही उसने आंखें खोल दीं और देखा सब गाड़ी से बाहर निकल रहे हैं। उसने चाची से पूछा, "गांव आ गया नहीं?" "बेटा, अभी गांव नहीं आया है। हम सबने सोचा यहां होटल से चाय पी लेते हैं, सफ़र बहुत लंबा है। मैं तो थक गई। चाची ये कहते हुए गाड़ी से उतरने लगी तो वह भी गाड़ी से बाहर निकल आई।


गाड़ी एक छोटे से होटल के सामने खड़ी थी। हल्की-हल्की हवा चल रही थी। चाय की खुशबू हवा में रची हुई थी। चाँद अपनी पूरी आब-ओ-ताब से चमक रहा था। होटल से कुछ दूरी पर शायद कोई कस्बा या गाँव था। सानिया ने अपने चारों ओर नजर दौड़ाई। उसे यहाँ का मौसम अच्छा लग रहा था। चाची ने उसे अपनी तरफ खींचा, "क्या कर रही हो सानिया? ध्यान कहाँ है तुम्हारा। पीछे तो देखो, गाड़ियाँ गुजर रही हैं।" सानिया ने पीछे देखा और फिर होटल की तरफ चल दी। वह भी सब के साथ एक कुर्सी खींचकर उस पर बैठ गई। अली भाई ने कहा, "यह जो पास गाँव नजर आ रहा है, न। कहते हैं बहुत खूबसूरत है। यहाँ बहुत सी ऐतिहासिक इमारतें भी हैं और इस गाँव में शहर जैसा होटल भी मौजूद है और बहुत ही प्यारा और आलीशान होटल है।


क्यों न हम वहाँ भी जाएँ?" अदील ने बड़ी विस्तार से अली को बताया, लेकिन अली ने मुस्कराकर कहा, "अदील, अभी तो वहाँ नहीं जा सकते। अभी सीधा गाँव जाएंगे। वापसी पर उस होटल को भी देख लेंगे।" अदील मुँह बनाकर रह गया। सानिया चाय पी रही थी। चाय की खुशबू के साथ-साथ स्वाद भी बहुत अच्छा था। सानिया को लग रहा था जैसे लगातार कोई उसे देख रहा हो, लेकिन हर तरफ देखने पर भी कोई नजर नहीं आया तो वह सोचने लगी कि यह एहसास उसे हमेशा होता था। शहर जाने से पहले भी और शहर जाने के बाद भी मगर आज यह एहसास कुछ ज्यादा ही था। वह बड़ा मशहूर होकर उसे देख रहा था। आज उसने खुली हवा में साँस ली थी।सानिया के हर दुख, हर तकलीफ में हमेशा उसके साथ साये की तरह रहने वाला एक पल भी नजर नहीं हटा पा रहा था।


सानिया के साथ उसने भी यह सजा 5 साल काटी थी, लेकिन इस सजा का भी अपना ही मजा था। चाय पीकर वापस सब गाड़ी में बैठ गए और गाड़ी एक बार फिर अपनी मंजिल को चल पड़ी। 
फ्लैश बैक : इजाज़ अहमद के घर से निकलते ही शाह लतीफ ने पीर साहब को सवालिया निगाहों से देखा। जो कहना चाहते थे कि कहो चुप क्यों हो? पीर साहब ने उनसे कहा, "आप ने इस बच्ची को एक तरह से तो बचा लिया मगर."। मगर क्या? लतीफ अपनी बात पूरी करो। अगर कल को इस बच्ची को आज़र से कोई खतरा हुआ तो? है तो वह भी एक जिन्नज़ाद ही न?


वे जिन्नात हमारे बस के नहीं थे। हम उनसे मुकाबले में नाकाम रहे थे और वैसे भी मैंने आज़र की आंखों में सच्चाई की चमक देखी है। लतीफ, वह सानिया को कभी कोई तकलीफ नहीं दे सकता। अल्लाह तआला ने आज़र को ही सानिया का रक्षक बनाकर भेजा है। वरना हम सानिया को भी नहीं बचा पाते। आज़र की वजह से ही सानिया आज जिंदा है। अल्लाह का शुक्र है। तुम आज़र के लिए ऐसा न सोचो। पीर साहब, फिर भी अगर कभी ऐसा हुआ तो? तो उसे कैसे संभालना है? मुझे अच्छे से पता है और अब जो हम सब के लिए बेहतर है, वही मैंने किया है। शाह लतीफ भी उनकी बात समझ गए थे और मुतमइन भी हो गए थे।


पीछे की कहानी : आगा साहब के तीन बेटे थे और तीनों शादीशुदा थे। अल्लाह तआला ने तीनों बेटों को औलाद जैसी नेमत से भी नवाजा हुआ था। बड़ा बेटा रहमान जिनके पास दो बेटे अली और अब्दुल्लाह थे, इस से छोटे नाजिम साहब के पास अदील, लाईबा, फरहान और मनाहिल चार बच्चे थे, और सबसे छोटे थे इजाज़ अहमद जिनकी एक बेटी सानिया और एक बेटा आसिफ दो बच्चे थे। आगा साहब की सेहत बहुत खराब रहती थी। उन्हें दिल का मसला था जिसकी वजह से बार-बार शहर आना-जाना पड़ता था। ऊपर से दादी जान का बीपी भी ठीक नहीं रहता था और गाँव में अभी इतनी सुविधाएँ नहीं थीं कि गाँव में उनका इलाज हो पाता। इस लिए अली के बाबा ने ही यह फैसला किया कि वे अपनी ज़मीन बेचकर शहर चले जाएंगे। नाजिम साहब और आगा साहब भी मान गए थे, लेकिन सानिया के बाबा नहीं माने। सब ने उन्हें समझाया, लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े रहे कि अपने गाँव को छोड़कर नहीं जाऊंगा।


रहमान साहब और नाजिम साहब ने अपनी-अपनी ज़मीन बेच दी और इजाज़ अहमद ने अपनी ज़मीन में से एक हिस्सा रखकर बाकी बेच दी। घर के हिस्से के मुताबिक अपनी ज़मीन के पैसे भाइयों को दिए और वे सब लोग शहर आ गए। क्या पता था आगा साहब को कि जिस बेटे की जिद के आगे वे हार मान गए थे, वह बेटा जो उन्हें अपनी सारी औलाद में सबसे ज्यादा प्यारा था, उसके गाँव में रह जाने की वजह उसकी मौत थी और उसके घर की बर्बादी थी। जिसने उन्हें वहाँ रोके रखा। अगर आगा साहब को इसका कुछ इल्म होता तो अपने बेटे को कभी भी तन्हा छोड़कर न आते। आगा साहब हॉस्पिटल बहू को देखने आए थे और अब बेटे और पोते की याद ने उन्हें तड़पा दिया था। वैसे तो वे रोज़ सानिया के साथ ही आते थे और जब भी वे ऐसे परेशान होते थे, तो सानिया उन्हें कहती थी, "दादा जान, मौत तो बरहक होती है और वह कहीं भी आ सकती है। क्या गाँव और क्या शहर? आप का या किसी का भी इसमें कोई क़ुसूर नहीं है। बस अल्लाह तआला ने उनकी जिंदगी उतनी ही लिखी थी। हमें तो उनके लिए दुआ करनी चाहिए कि अल्लाह तआला उनके दर्जात बुलंद फरमाए।" आगा साहब के मुंह से बेसाख्ता निकला, "आमीन" और फिर अपनी बहू की सेहत के लिए दुआ मांगी। रुकैया बेगम 5 साल से कोमा में थीं। डॉक्टरों की बहुत कोशिशों के बावजूद अभी उनकी सेहत में कोई फर्क नहीं आया था। आगा साहब ने शफकत से बहू के सर पर हाथ फेरा और उठकर घर को चल दिए।


आगे की कहानी : गाड़ी सीधी इजाज़ अहमद के घर के बड़े से दरवाजे पर जाकर रुकी। सबसे पहले अली और अब्दुल्लाह गाड़ी से निकले, फिर बाकी सब भी बाहर आ गए। सबसे आखिर पर सानिया गाड़ी से निकली और चलकर दरवाजे तक आई। उसकी आंखों में पानी भर आया। वह आज पूरे 5 साल बाद अपने घर आई थी। इन सब से पहले ही वहाँ हाकिम चाचा दरवाजे के बाहर खड़े थे और उनके हाथों में इजाज़ अहमद के घर की चाबियाँ थीं। सानिया ने उन्हें सलाम किया और उन्होंने सानिया के सर पर हाथ रखा और चाबियाँ सानिया के हाथ पर रख दीं। सानिया ने आगे बढ़कर दरवाजा खोला। पूरा घर अंधेरे में डूबा हुआ था। सानिया अंदर चलती गई। बिना किसी डर, बिना किसी खौफ के। हाकिम चाचा भी उसके पीछे गए और सारे घर की लाइट्स जलाईं। 


अली गाड़ी में बैठा और गाड़ी घर के अंदर ले गया। बाकी सब घर अंदर एंटर हो चुके थे। सानिया कुछ देर यूं ही खड़ी घर को देखती रही, फिर सुल्तान का पिंजरा उठाया और अपने पुराने कमरे की तरफ कदम बढ़ाए। लाईबा भी उसके पीछे हौले से चल रही थी। लाईबा को दादी जान ने खास सानिया के साथ हर समय रहने को कहा था। वे दोनों कमरे में एंटर हुईं। कमरा किसी भीनी भीनी खुशबू से महक रहा था और साफ सफाई से ऐसा लग रहा था जैसे इसमें कोई रहता हो। हर चीज साफ शफ्फाफ थी और कमरे की हर चीज वैसे ही पड़ी थी जैसे पांच साल पहले रखी गई थी। सानिया ने सुल्तान का पिंजरा एक साइड टेबल पर रखा और बेड पर लेट गई। सफर बहुत लंबा था। वह बहुत थक गई थी और इस सफर से भी लंबी गुजरे समय की यादों की मसाफ़त थी जो वह इस सफर में करती आई थी। बाकी सब भी बहुत थक गए थे और रात भी बहुत हो चुकी थी, तो सब ही अपने-अपने कमरों में आराम करने चले गए। लाईबा फ्रेश होकर रूम में आई तो सानिया बेड पर पुर-सुकून लेटी हुई थी। लाईबा भी आकर उसके साथ लेट गई। पहले तो लाईबा इधर-उधर की बातें करती रही और फिर कुछ देर बाद दोनों गहरी नींद सो गए।


जिन्नात की दुश्मनी-सभी पार्ट

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