मैं अब तुमसे बात नहीं करती
तुम्हें पुकारती भी नहीं हूँ।
मैं नहीं कहती ऑनलाइन हो तो मुझे मैसेज क्यों नहीं किया?
मैं नहीं कहती अभी रुक जाओ, अभी मत जाओ।
मुझे नींद नहीं आ रही है तो तुम भी मत सोओ।
मैं तो अब तुम्हारे सामने भी नहीं आती।
जाने कब से मैंने तुम्हें पुकारा नहीं है, तुम्हारा नाम नहीं लिया है।
वो जो तुम्हें बेशुमार नामों से पुकारती थी, वो अब खामोश है। बिल्कुल खामोश।
तुमसे लड़ती भी नहीं है, कोई शिकवा नहीं, कोई शिकायत नहीं। कुछ भी तो नहीं करती।
मैं अब कहाँ कहती हूँ
तुम सिर्फ़ मेरे हो? सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे?
मैं अब कहाँ किसी से भी लड़ती हूँ?
कहाँ किसी से भी झेंपती हूँ?
कहाँ किसी से कहती हूँ कि तुम पर सिर्फ मेरा हक है ? सब कुछ छोड़ चुकी हूँ मैं !
यहाँ तक की तुम्हें भी छोड़ दिया !
छोड़ दिया तुम्हारे हाल पर !
छोड़ दिया तुमसे लड़ना झगड़ना !
हाँ मगर ....................
तुम अब भी मेरी दुआओं के हिसार में हो !
अब भी आयत-अल-कुर्सी पढ़ कर तुम्हें दम करती हूँ !
अब भी घंटों तुम्हें सचती हूँ !
क्यूँकी मैं अब भी तुम्हें मोहब्बत करना नहीं छोड़ सकी !
अब भी नहिन छोड़ सकी तुम्हें चाहना !
तुमसे मोहब्बत करना !
आज भी तुम से मोहब्बत के मामले मे शिद्दत पसंद हूँ
आज भी तुमसे मोहब्बत में वेसी ही जुनूनी हूँ !
मगर अब खामोश हूँ !
बिलकुल खामोश........... ❤💔
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