हलाल की कमाई

हम उस समय टीवी के सामने बैठे हुए रमज़ान के चाँद का इंतज़ार कर रहे थे। हमारा मतलब है कि हम रमज़ान के चाँद के बारे में ख़बर का बहुत बे-सब्री से इंतज़ार कर रहे थे। इस बेसब्री का कारण हम आपको आगे चलकर बताएंगे। हमें विश्वास था कि जल्द ही मुफ्ती साहब हमें चाँद के दिखाई देने या न दिखाई देने के बारे में सूचित करेंगे। इसी उम्मीद में हम टीवी के सामने बैठे हुए अपने मोबाइल के साथ लगे हुए थे। कभी-कभी हम फेसबुक पर व्यस्त हो जाते थे, तो कभी-कभी व्हाट्सएप खोल लेते थे। उधर से बोरियत होती थी तो कोई गेम निकालकर खेलने लगते थे। दरअसल, हमें खाली बैठने की आदत बिल्कुल नहीं है। हमारी कोशिश होती है कि हर समय कुछ न कुछ काम चलता रहे। अपनी इस आदत के बावजूद जिन शब्दों में हमारी सबसे ज्यादा प्रशंसा होती है, वे शब्द यही हैं: न काम के, न काज के, दुश्मन अनाज के।

HALAL KI KAMAAI

हलाल की कमाई



अब आप ही बताएं कि इतने व्यस्त व्यक्ति के लिए यह वाक्य उचित है या नहीं? खैर, छोड़ दीजिए, हम जानते हैं कि आपने भी हमारी ओर से पक्ष नहीं लेना है। हम असल  बात  की ओर आते हैं। आप शायद हमारी 'हम' कहने की वजह  से हमें कोई पूरा ग्रुप  समझ रहे हैं, लेकिन अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो भगवान के लिए अपने विचारों को सुधार लीजिए। हमारी 'हम' कहने से तात्पर्य हम स्वयं ही हैं, अर्थात् अपने आप में, यानी कि क़िबला नवाब फियाज अली उर्फ फियाजी साहब, उर्फ छोटे नवाब। बुरा हो अंग्रेज सरकार का, जिसने हमसे जायदादें छीनकर अपने चहेतों को नवाज दीं। नतीजतन, हमारे परिवार ने नवाबी लाइन छोड़कर फकीरी लाइन अपना ली, लेकिन आदत से मजबूर हम खुद को 'हम' कहना नहीं छोड़ सके। फकीरी लाइन में रहते हुए भी हमने इस पेशे को आधुनिक तरीके से अपनाया, जिससे हमारी आय में बढ़ोतरी हुई। लेकिन बुरा हो महंगाई का, जिसमें बढ़ोतरी हमारी आय से ज्यादा तेजी से हुई। दूसरी ओर, हमारे पेशे में भी स्कोप कम होता जा रहा था।

हमारी देखा-देखी अन्य लोगों ने भी हमारा पेशा अपनाना शुरू कर दिया था। अब हफ्तों की तलाश के बावजूद हमें कोई उपयुक्त क्लाइंट नहीं मिलता। हालांकि हमारे क्लाइंट जैसे होते थे, उनके लिए क्लाइंट से ज्यादा शिकार शब्द उपयुक्त है, लेकिन हम ठहरे सभ्य व्यक्ति। खैर! हम आपको अपने पेशे में आने वाली समस्याओं के बारे में बता रहे थे। इन समस्याओं के कारण हम यह सोचने पर मजबूर हो गए थे कि हमें जल्द से जल्द इस पेशे से दूर होकर किसी व्यवसाय की ओर ध्यान देना चाहिए।

हमारी माताजी और हम खुद। हमारे पिताजी ने अपनी नवाबी तबीयत के कारण कभी किसी काम को अपने योग्य नहीं समझा। वह हर महीने कुछ दिनों के लिए घर से गायब रहते थे और जब वापस आते थे तो सामान से लदे रहते थे। वह इसे व्यवसायिक दौरा बताते थे, लेकिन जानने वालों की तरह हम भी जानते हैं कि वह अपने रिश्तेदारों को नवाबी दौरे का नाम देकर उधार के नाम पर सहायता लेकर आते थे। अपने पिताजी की ओर से हमें जो आदत विरासत में मिली, वह बस यही नवाबी तबीयत है। इस प्रकृति के कारण हम भी जीवन भर कोई ठीक-ठाक काम नहीं कर सके। जब हमने अपने खर्चों को पूरा करने के लिए कोई काम करने का सोचा, तो अपने पिताजी के नक़्श-ए-पा  ही हमारे मार्गदर्शक बने। लेकिन थोड़े अलग तरीके से।

हमारे अब्बा जान ने तो हमें कभी भी उन लोगों के पास नहीं जाने दिया जिनसे वह मदद लेते थे। इसलिए हमें अपनी मार्केट खुद बनानी पड़ रही थी। हमारे काम शुरू करते ही हमारे पिताजी के व्यवसायिक दौरे बंद हो गए। अब वह अपने खुद के खर्चों के लिए हमारे सामने हाथ फैलाने लगे थे।

हमें काम में लगे चौदह-पंद्रह साल गुजर चुके थे, लेकिन अब हालत ऐसे हो गए थे कि हम यह काम छोड़कर कोई ठीक-ठाक काम करने के लिए खुद को मजबूर समझने लगे थे। पिछले पांच सालों से हम अपने घर के सदस्यों की संख्या में वृद्धि करने की कोशिश में व्यस्त थे, लेकिन हमारा पेशा इस नेक काम में रुकावट बन रहा था। मजबूरन हमने अपना पेशा बदलने का फैसला किया। इस फैसले के पीछे हमारे दूर के रिश्तेदार, अंशा रोशन आरा के रोशन चेहरे का भी महत्वपूर्ण योगदान था। रोशन आरा भी हमारी तरह एक नवाब खानदान से ताल्लुक रखती थीं, लेकिन बदकिस्मती से हालातों के हेर-फेर ने उन्हें भी ऐसे हाल में ला दिया था कि वह अब सिलाई-कढ़ाई करके गुजारा कर रही थीं।


हम एक दिन अपनी माताजी के साथ उनके घर गए थे। हमारी माताजी उनसे अपना एक सूट सिलवाने के लिए ही यहां आई थीं। हम खातून खाना से मिलने के बाद बेजार से अंदाज में एक तरफ बैठ गए। बोरियत से बचने के लिए हमने अपनी आदत के अनुसार अपना मोबाइल फोन निकाल लिया। हमने फेसबुक खोली ही थी कि हमारे कानों में एक मधुर सी आवाज पड़ी। ऐसा लगा जैसे किसी मंदिर में घंटियां बज रही हों। हमने धीरे से नज़रें उठाईं तो हमारी आंखें जैसे चौंधिया गईं। हमारे सामने एक मुगलिया शहजादी बड़ी अदा से हमें अदाब कह रही थी। हमारी उस समय जो हालत थी, उसके पेश-ए-नज़र हम ब-मुश्किल सर को ही झुका सके। वह हमारा शाही अंदाज़ देखकर मुस्कराते हुए हमारे सामने ही बैठ गईं। हमारी माताजी ने रोशन आरा से हमारा परिचय कराया। उनके पिताजी दुनिया से पर्दा फरमा चुके थे। अब वह अपनी माताजी के साथ तन्हा ही जीवन का सफर काट रही थीं। यूं तो रोशन आरा की पहली झलक ने ही हमारे दिल में घर कर लिया था, लेकिन जब उन्होंने चाय के साथ हमारे आगे मुगलई टिक्के रखे और हमने उनका स्वाद चखा तो उसी समय हमने रोशन आरा के अस्तित्व से अपने घर को रोशन करने का फैसला कर लिया था। हम कबाब खाते हुए उनके सफेद हाथों की ओर देखते हुए गोया हुए, कबाब इंतहाई मज़ेदार हैं, माशा अल्लाह! आपके हाथों में बड़ा स्वाद है। हमारा ख्याल था कि वह हमारी प्रशंसा सुनकर शर्मा जाएंगी, लेकिन वह सरलता से बोलीं, स्वाद हमारे हाथों में नहीं, बल्कि हमारी हलाल कमाई में है। हम गड़बड़ा  गए। हमें ऐसा लगा जैसे उन्होंने हम पर व्यंग्य किया है। मुगलई खानों का कोर्स तो हमारी माताजी ने भी किया था, लेकिन ऐसा स्वाद हमें कभी उनके हाथों में महसूस नहीं हुआ था।

क्या वास्तव में स्वाद हलाल कमाई में होता है? आज जीवन में पहली बार हम इस नज़रिए से सोच रहे थे और जैसे-जैसे सोचते जा रहे थे, सहमत होते जा रहे थे। यह थीं वे कुछ वजहें जिनकी वजह से हम अपना बरसों पुराना पेशा छोड़ने का इरादा कर के कोई व्यवसाय करने का फैसला करने पर मजबूर हुए थे, लेकिन समस्या यह थी कि व्यवसाय के लिए पूंजी की जरूरत थी, और पूंजी को हमेशा से हमसे ऐसा बैर रहा था जैसे कुत्ते को बिल्ली से। कमबखत कभी हमारे पास आती ही नहीं थी, और आ जाती तो टिकती नहीं थी। हमारी एक आदत है: जब हम किसी काम की ठान लेते हैं तो उसे कर के ही छोड़ते हैं। इस बार भी हमने अपना टारगेट पूंजी इकट्ठा करने का रखा तो सफलता ने हमारे कदम चूम ही लिए। अब हमारे पास थोड़ी  बहुत पूंजी आ गई थी।

हम आजकल इस सोच-विचार में व्यस्त थे कि इस पूंजी से कौन सा व्यवसाय शुरू किया जाए। हमने अपने मित्र नौमान से परामर्श (मशवरा) करने का निर्णय लिया। नौमान के बारे में बता दें कि उनकी हमसे बचपन से ही मित्रता थी। कुछ समय तक हमने साथ में काम भी किया, लेकिन फिर उन्हें किसी सरकारी संस्थान में एक छोटी सी नौकरी मिल गई, तो वह पुराने काम से तौबा कर गया था।

हमने इस बारे में नौमान, उर्फ नोमी, से परामर्श किया तो उनकी आंखें चमक उठीं। यार, तुमने तो मेरी समस्या ही हल कर दी! वह जोश से बोला। हमने उसे संदेहपूर्ण नज़रों से घूरा और शब्दों को चबा चबा कर बोले, हमारे ख्याल में हमने अपनी समस्या तुम्हारे सामने रखी थी। वह बहुत ही तेज था। हमारा शिकवा सुनकर शातिराना अंदाज में बोला, यार, हमने कोई समस्या बांट रखी है क्या ? तुम्हारी समस्या मेरी समस्या ही है। हमने उसे आश्चर्य से देखा और बोले, हमें विस्तार से बताओ कि तुम्हारी समस्या हमारी समस्या कैसे हो सकती है? वह बोला, मैं हर रमज़ान में सब्जी और फल का स्टॉल लगाता हूं और इतना कमा लेता हूं कि जितना पूरे साल की तनख्वाह से नहीं कमा पाता। तो तुम क्या चाहते हो हम भी तुम्हारी तरह आलू टिंडे बेचना शुरू कर दें? 

तुम जानते नहीं कि हम नवाब खानदान के आखिरी चश्म-ओ-चराग हैं। हम खफगी से बोले। वह हमारी खफगी को एकदम नजरअंदाज कर के बोला, तुम मेरा यकीन करो, इस काम में बड़ा पैसा है। मैं दो बजे अपने दफ्तर से छुट्टी कर के स्टॉल खोलता था, और मगरिब तक तीस हजार से ज्यादा की सेल तो यकीनी होती थी। तीस हजार से ज्यादा की सेल? हमारा मुंह खुला का खुला रह गया, आंखें फट पड़ीं, हम हैरत से उसकी ओर देखने लगे। वह हमारे चेहरे में होने वाली तब्दीलियां देखकर बे इख्तियार हंसने लगा।

नहीं, यकीन तो आजमा लो! वह चुनौती देने वाले अंदाज में बोला। हमारे पास इतना तजुर्बा कहां? हम तो घर के लिए आधा किलो टमाटर खरीदें तो आधे से ज्यादा खराब ही निकलते हैं! हम गहरे दुख से बोले। तुम क्यों फिक्र करते हो? तजुर्बा मेरे पास है न! वह मुस्कराया। लेकिन जो भी है, हम आलू टिंडे नहीं बेचेंगे। तुम हमें कोई ढंग का कारोबार बताओ। अब एक तो हम नवाब, दूसरा महीने रमजान, रोजे की हालत में खुद को आलू टिंडे बेचते देखने का ख्याल ही इतना भयानक था कि झुरझुरी ले कर रह गए।

यार, तुमसे किसने कहा है कि खुद कुछ बेचो! तुम मेरे साथ शराकत कर लो। पैसा तुम्हारा, मेहनत मेरी, मुनाफा आधा-आधा। हम सोच में पड़ गए, लेकिन जाने क्यों हमारा दिल आमादा नहीं हो रहा था। हम उसकी पेशकश रद्द  करना चाहते थे। कुछ देर सोचने के बाद हमें एक बहाना सूझ ही गया। यार, वह तो ठीक है, मगर. यह काम हराम नहीं? वह अपनी जगह से उछल पड़ा। यह काम हराम है तो क्या लोगों को लूटना हलाल है? वह तंजिया अंदाज में बोला।

वह तो जानबूझकर लुटते हैं, तुम लोग तो उन्हें धोखे से लूटते हो! हमने तंज का जवाब तंज से दिया। मिसाल के तौर पर कैसे? विस्तार से बताना पसंद करेंगे आप? वह लाल चेहरे के साथ बोला। देखो, रमजान में तुम लोग रेट भी इतना ज्यादा बढ़ा लेते हो, दूसरी तरफ नाकारा फल और सब्जियां भी उसी रेट के साथ बेच देते हो। क्या इस तरह की कमाई हलाल है? उसके चेहरे पर एक रंग आ रहा था और एक जा रहा था। वह खुद पर काबू पाते हुए बोला, ऐसा नहीं है, हमें मंडी में जिन रेटों पर माल मिलता है और जैसा मिलता है, हम वैसा ही आगे बेचते हैं। न हम ज्यादा मुनाफा लेते हैं और न जानबूझकर घटिया माल बेचते हैं। हम आधे मन से सहमत होने लगे। वह हमारे तासुरात  देखकर बोला, बताओ, मुझसे पार्टनरशिप करोगे या नहीं? वैसे तो मैं अकेला यह काम कर सकता हूं, मगर तुम जानते हो कि इस साल अपनी शादी में मैं सारी रकम खर्च कर बैठा हूं। अब मुझे पूंजी की जरूरत है और तुम्हें तजुर्बे की। मेरे ख्याल में हम दोनों की पार्टनरशिप अच्छी चल सकती है। और रही बात हलाल-हराम की तो उसकी फिक्र तुम मत करो, तुम तो वैसे भी स्लीपिंग पार्टनर होगे। स्लीपिंग पार्टनर? हमने जुबान पर दोहराया। ये नाम हमें हमें बड़ा दिलचस्प लगा । स्लीपिंग यानी सोने वाला पार्टनर, मतलब हम रमजान में खुलकर अपनी नींद पूरी कर सकते थे और इसके बदले हमें पैसे भी मिलने थे। यह ख्याल इतना दिलचस्प था कि हम हामी भरने पर मजबूर हो गए।

अब बस एक ही बात थी कि नौमान हमारे नज़दीक क़ाबिल-ए-एतबार नहीं था, लेकिन विश्वास इंसान की मजबूरी है। हम भी इंसान थे, इसलिए हमने उस पर विश्वास कर लिया था। अब इस विश्वास ने क्या रंग लाना था, यह समय ही बता सकता था। हमने वहीं बैठे-बैठे व्यवसाय की शर्तें तय कर लीं। खैर, तय की गईं, वह शर्तें बताई गईं और हम मानते गए। इसके अनुसार, हमें स्टॉल के लिए चुनी गई जगह के पैसे कमेटी वालों को देने थे। वह हमें साथ लेकर कमेटी के दफ्तर गया और एक व्यक्ति को एक हफ्ते का पांच हजार किराया हमसे लेकर उसे पकड़ा दिया। बाहर निकलते हुए हमने पूछा, यार, उसने किराये की रसीद नहीं दी? उसने आश्चर्य से हमें देखा और एकदम हंसने लगा। मेरे भोले बादशाह! यह किराया नहीं, रिश्वत थी जो उसने हमारी ओर से आंखें बंद करने के लिए ली है। यह बादशाह के साथ 'भोले' लगाना ज़रूरी था क्या? हम खफगी से बोले तो उसने एक और क़हक़हा लगाया। खैर, किस्सा मुख्तसर, अब हम चांद नजर आने की दुआ कर रहे थे ताकि सुबह सहरी के बाद मंडी से सब्जी और फल खरीदकर व्यवसाय का आरंभ कर सकें। वैसे तो हम नौमान के स्लीपिंग पार्टनर ही थे, लेकिन उसकी जिद थी कि कम से कम पहली बार हम उसके साथ सामान लेने जरूर चलें, ताकि हमें बेहतर तरीके से अंदाजा हो सके कि इस व्यवसाय में असली धोखा कहां से शुरू होता है। हमें भी उस पर विश्वास नहीं था, इसलिए उसके साथ चलने को तैयार हो गए थे। कुछ ही देर में मुफ्ती साहब ने चांद नजर आने की खबर सुनाई तो हम खुशी से चिल्लाए, चांद नजर आ गया! हमारा नारा जैसा वाक्य सुनकर हमारे पिताजी भागते हुए अंदर तशरीफ लाए। तो तुम इतना खुश क्यों हो रहे हो? उन्होंने आश्चर्य से पूछा।

अबा जी! खुशी की खबर तो है ना। रमजान जैसा बरकतों और रहमतों से भरपूर महीने का आगाज़ होने जा रहा है। यह सब मुसलमानों के लिए खुशी का मौका नहीं? चलो फिर उठो, नमाज तरावीह की तैयारी करो। वह तंजिया अंदाज में बोले। उनके जुमले बल्कि यूं कहें कि हमले से हमें यकीन हो गया कि वह वास्तव में हमारे पिता ही हैं। आप चलें, हम भी वुजू कर के आते हैं। हम मरे मरे लहजे में बोले। पहले तो उनसे उम्मीद ही नहीं थी कि वह खुद भी तरावीह के लिए जाते हैं मगर हमारे जोश के ज़हर के प्रभाव में आकर वह भी तरावीह के लिए जा रहे थे। फज्र की नमाज के बाद हम सब्जी मंडी की ओर चल पड़े। हम बहुत खुश थे कि जिंदगी में पहली बार हम भी कोई हलाल काम करने लगे हैं। यह शायद पहला रमजान था जिसमें न केवल हमने रात को नमाज-ए-तरावीह भी पढ़ ली थी बल्कि सुबह की नमाज भी बाजमात अदा की थी। यही नहीं, बल्कि रमजान की बरकत से हम जिंदगी में पहली बार किसी हलाल जरिए से रिज्क हासिल करने निकले थे।

हमने अपनी जमा पूंजी अपनी कमीज की जेब में डाल रखी थी और उस जेब को मजबूती से थाम रखा था। मंडी में बेहद भीड़ थी और ऐसी भीड़ जेब कतरों के लिए बेहद फायदेमंद साबित होती है। हमारे गुरु जी ने हमें यह कला सिखाने के लिए बहुत मेहनत की थी, लेकिन हम ही नालायक साबित हुए, तब गुरु जी ने हमें दूसरे क्षेत्र में भर्ती करने का फैसला किया। यह फील्ड हमारे मन को भा गई। इस फील्ड का सबसे बड़ा फायदा यह था कि इसमें हमें क्लाइंट से फेस टू फेस मुलाकात नहीं करनी पड़ती थी बल्कि क्लाइंट की अनुपस्थिति में ही उसके माल पर सफाया करना पड़ता था। इस काम में हम जल्द ही माहिर हो गए, लेकिन समस्या यह थी कि हमारे छोटे से शहर में गरीबी इतनी ज्यादा थी कि ग्राहक की तलाश भी अक्सर समस्या ही बन जाती थी। ग्राहक मिल जाता तो उचित मौका नहीं मिलता। इन समस्याओं को देखते हुए हमने तरक्की की अगली सीढ़ी पर कदम रखने का फैसला किया। हमारे गुरु जी ने हमारा फैसला सुनकर हमारी कमर थपथपाई और बोले, "शाबाश बेटा, हम जानते थे कि तुम बहुत आगे जाओगे।" उनकी तारीफ सुनकर हम शरमा गए। खैर, थोड़े समय की ट्रेनिंग के बाद गुरु जी ने एक खिलौना पिस्तौल हमारे हाथ में पकड़ाया और हमें डेमो पेश करने का कहा। हम पिस्तौल लेकर एक राहगीर के सर पर पहुंच गए और उसके पास में खिलौना पिस्तौल की नाल रख दी। तुम हमारे निशाने पर हो, जो कुछ जेब में है, हमारे हवाले कर दो वरना. हमने पूरी कोशिश की थी कि हमारी आवाज में सफ़फाकी जाहिर हो। उसने पीछे मुड़कर देखा और आश्चर्य से बोला, "भाई जान! मुझे तो आप अकेले नजर आ रहे हैं?" हम स्टप्टा गए।


किसी भी क्लाइंट से  इस तरह की प्रतिक्रिया की  हमें  बिल्कुल तवक़्क़ो नहीं थी । खैर, हमने खुद को संभाला और बंदूक लहराते हुए बोले, तुम्हारी जेब में जो कुछ है, निकालकर हमारे हाथ में रखो। वह कुछ सोचने के अंदाज में हमारी ओर देखते हुए अपनी जेब में हाथ डालने लगा तो हमारा दिल बिल्कुल उछल पड़ा। उसने जेब में से हाथ निकाला तो हमें उसके हाथ में पर्स की सी झलक नजर आई। हमारी आंखें खुशी से चमकने लगीं। उसने हमारे हाथ पर हाथ रखा और बोला, यह लो! मेरी जेब में तो बस यही है। हमने हाथ खोलकर देखा और आश्चर्य से बोले, यह क्या है? वह कमबख्त हमें अपने हाथ की ओर मुतवज्जे देखकर भाग खड़ा हुआ। हमने बंदूक लहराई और उसे रुकने की धमकी दी, मगर या तो उसे अपनी जान प्यारी नहीं थी या हमारी बात का एतबार नहीं था, जो वह रुका ही नहीं। हम लूट का माल लेकर गुरु जी के पास पहुंचे, जो दूर खड़े हमारी कार्यक्षमता का व्यावहारिक नमूना बारीकी से देख रहे थे। उनके  उत्साहपूर्ण अंदाज में पूछने पर हमने अपना हाथ उनके सामने फैला दिया। हमारी हथेली पर रखी चीज देखकर वह आंखें फाड़कर बोले, नसवार! बहरहाल, काम के मौके कम होने के कारण हम कभी कोई बहुत बड़ा हाथ नहीं मार सके, मगर जैसे तैसे गुज़ारा चल रहा था। लेकिन पिछले कुछ अरसे से हमारा ज़मीर हमें तंग करने लगा था। इसकी रोज रोज की चीख पुकार सुनकर हमने अपनी फील्ड बदलने का फैसला कर ही लिया। रात को मुफ्ती साहब ने चांद देखा था और इस समय हमें तारे नजर आ रहे थे। हकीकी तारे नहीं, बल्कि महावरात्मक तारे। जो सब्जी और फल के रेट्स सुनकर हमें नजर आ रहे थे।

मगर नौमान मुतमइन था; वह घूम-फिरकर क्वालिटी और रेट्स चेक कर रहा था। उसका माहिराना अंदाज देखकर हमारे दिल को तसल्ली  हुई। खुदा खुदा कर के उसने फल का पहला सौदा तय किया। सौदा फाइनल करने के बाद उसने हमारी ओर देखा। हमने उसका मकसद समझते हुए अपनी जेब में हाथ डाला तो हमारी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। तमाम एहतियात के बावजूद कोई जेब कतरा हमारे साथ हाथ कर गया था। नौमान आश्चर्य से हमारे तेवर देख रहा था, क्या हुआ? उसके लहजे में आशंकाएं लरज रही थीं। हम उसे खाली-खाली आंखों से देखने लगे। क्या हुआ? तुम बोलते क्यों नहीं? वह हमें झिंझोड़ते हुए चिल्लाया। उसके झिंझोड़ने से हमारा सकता टूट गया। हम उसके गले लगकर बच्चों की तरह रोते हुए कहने लगे, हम लुट गए, बर्बाद हो गए। कोई कमीना हमारी जेब काट गया है। वह हमें रोते देखकर तसेलियां देने लगा, कोई बात नहीं, हराम की कमाई थी, हराम राह चली गई। उसका जुमला हम पर हथौड़े की तरह गिरा, हम चौंककर उससे अलग हो गए। अब हम आंखें फाड़-फाड़कर उसे देख रहे थे। हम तो हलाल की ओर लौट रहे थे। फिर क्यों ऐसा हुआ हमारे साथ? हमारी आवाज गुस्से से लरज रही थी। वह हमारे गुस्से से डर गया, खुदा ही बेहतर जानता है। जो होना था, हो गया, अब हम क्या कर सकते हैं? चलो वापस चलते हैं। वह थके हुए अंदाज में बोला तो हम भी उसके साथ चल पड़े। हमें ऐसा लग रहा था कि हम घर की ओर नहीं बल्कि हलाल से हराम की ओर लौट रहे हैं।


पहला रमजान का पूरा दिन हमारा सोच-विचार में ही मशगूल गुजरा था। जब तक हम नाजायज तरीकों से रोजी कमाते रहे, तब तक हमें कोई बड़ी समस्या नहीं हुई थी, न ही हम कभी पकड़े गए थे। मगर हलाल की ओर लौटते ही हमारी सारी जमा पूंजी लुट गई थी, यह दुख हम से बर्दाश्त नहीं हो रहा था। अब न हम कोई हलाल कारोबार कर सकते थे और न ही कम से कम एक महीने तक अपनी पेशेवर माहिरत का मुजाहिरा कर सकते थे, क्योंकि हम जैसे भी सही, कम से कम रमजान जैसे पवित्र महीने में अपने धंधे को बंद ही रखते थे। अचानक हमें ख्याल आया कि हम भी तो सारी जिंदगी लोगों को लूटकर ही अपना निजाम चलाते रहे थे। जिन लोगों को हम लूटते थे, उन्होंने भी जाने कितनी दग़ाबाज़ियों  से रुपया कमाया होता था। आज हमें अपनी दग़ाबाज़ियों का ख्याल आ रहा था जिससे हमने वो सारी रुपया हासिल की थी, और अब हमें कितनी तकलीफ हो रही थी। जोहर का वक्त हुआ तो हम न चाहते हुए भी नमाज पढ़ने चले गए। नमाज के बाद हमने रो-रो कर अल्लाह से फ़रियाद की।

यही कोई आधे घंटे की आह-ओ-ज़ारी के बाद हमारे दिल को जैसे क़रार सा आ गया। हमने सुना था कि ऐसी कैफ़ियत कुबूलियत के वक्त तारी होती है। हमें भी यकीन हो गया कि खुदा ने हमारी दुआ सुन ली है और जल्द ही हमें हमारी रुपया वापस मिलने वाली है। हम घर लौट आए। चारपाई पर लेटकर हमने आंखें मूंद लीं। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई तो हम चौंककर उठे। दरवाजा खोला तो नौमान खड़ा मुस्करा रहा था। हमें देखते ही बोला, जेब कतरा पकड़ा गया है, उसके पास से तुम्हारी रुपया भी बरामद हो गई है। हम उसे बे-यकीनी से देखने लगे। अपनी जागती आंखों में सजे सपने को झटक कर हमने फिर आंखें मूंद लीं। इस बार दरवाजा खुला तो बाहर एक पुलिस वाला खड़ा था। वह हमें देखते ही बोला, फियाज अली आप ही हैं न? उसके हाथ में हमारा पहचान पत्र था, जिस पर बनी तस्वीर से वह हमारा मुआयना कर रहा था। उसके चेहरे पर माफी मांगने वाला भाव उभरा, आज हमने एक जेब कतरा पकड़ा है।

उसके पास से दीगर चीजों के अलावा एक छोटा सा शापर पकड़ा गया है। इस शापर में से यह पहचान पत्र और यह रुपया मिला है। वह रुपया का शापर हमारी ओर बढ़ाते हुए बोला, तो हम बे-यकीनी से उसे देखने लगे। इसी तरह के सपने देखते हुए असर का वक्त हो गया, मगर यह सपने, सपने ही रहे, हकीकत का रूप नहीं धारण कर सके। नमाज के बाद हमने फिर रो-रो कर अल्लाह से अपनी रुपया वापस मांगी और घर पहुंचे ही थे कि अम्मी जान बोलीं, बेटा, सुबह से पड़ा चारपाई तोड़ रहा है, जा इफ्तारी के लिए कुछ सामान ले आ। उनका तंज कसाई की तरह हमारे दिल पर वार हुआ। हम खुद को घसीटते हुए बाहर ले आए। बाजार में घूमते हुए कमजोरी के कारण हमारा दिमाग चकराने लगा। हमें कोई राह सुझा नहीं रही थी जिसके जरिए हम अपने घर इफ्तारी का सामान ले जा सकते थे। अचानक हमारी नज़र एक भिखारी पर पड़ी। वह ब-ज़ाहिर सेहतमंद आदमी था मगर चेहरे पर कमजोरी के तासुरात सजाए लोगों से मांग रहा था। उसने एक आदमी की ओर हाथ फैलाया तो वह बोला, बड़े कितने हो, मांगने से तो बेहतर है कि कहीं डाका मार लो, कुछ तो हाथ पांव हिलाओ। उसके जुमले ने हमारे दिमाग की खिड़की खोल दी। हम समझ चुके थे कि कोशिश के बिना हमारा रुपया वापस नहीं मिल सकता  था।

हमें कुछ हाथ-पैर हिलाने ही थे। अब हम बस मौके की तलाश में थे। शाम का समय होते ही बाजार तेजी से सुनसान होने लगा। हमारे कदम बढ़ाने का समय निकट आ रहा था। हमारी नज़र एक सब्जी और फल की दुकान पर जमी थी, जहां एक-दो ग्राहक मौजूद थे। अंतिम ग्राहक के जाने के बाद हमने अपना चेहरा रुमाल से ढका और तेजी से दुकानदार की ओर बढ़े। यह दुकानदार हमारा वाकिफ़ कार था, नईम नाम था उसका, बड़ा नेक और खुदा-परस्त नौजवान था, लेकिन इस समय मजबूरी थी। इससे बेहतर शिकार हमें कोई और नहीं मिल सका था। नईम गल्ले में रखी रकम गिनने में व्यस्त था। हमने पिस्तौल उसकी गर्दन पे साथ लगाई और गरजे, शराफ़त से यह रकम हमारे हवाले कर दो वरना…

भाई" कुछ खुदा का खोफ करो, रमजान में तो खुदा शैतान को भी बंद कर देता है। तुम यह काम नहीं बंद कर सकते?" वह गुस्से से बोला।

हम तो रमजान में यह धंधा बंद ही कर देते थे, मगर सब लोग बंद नहीं करते। ऐसे ही एक  ने सुबह-सुबह हमारी जेब खाली कर दी। अब मजबूरी में धंधा वापस शुरू किया है।
उसकी बात हमें बहुत बुरी लगी, इसलिए हमने उसको पूरी कहानी सुना दी। हमारा ख्याल था कि अब वह पैसे हमें दे देगा, मगर उसका रिएक्शन हमें हैरान कर गया।

वह तेजी से हमारी तरफ घूमते हुए बोला, "अरे, फैजी भाई, आप मजाक बहुत अच्छा करते हैं।"
हम उसकी बात सुनकर गड़बड़ा गए। वह हमें पहचान गया था, मगर अच्छा यह था कि वह हमारे काम को मजाक समझ रहा था। हमने भी अपने काम पर मजाक का पर्दा डालना ही उचित समझा और जोर-जोर से हंसते हुए बोले, "बड़े बहादुर हो यार, मेरा तो ख्याल था कि पिस्तौल की नाल गर्दन पर महसूस करते ही तुम पैसे मेरे हवाले कर दोगे।"

"यह मेरी मेहनत की कमाई थी, रोजे की हालत में पूरा दिन मेहनत करके कमाई थी। कैसे मैं इतनी आसानी से यह किसी के हवाले कर देता?" वह शांति से बोला।
हम उसे गौर से देखने लगे। अच्छा, रोजा खुलने वाला है, आप भी मेरे साथ ही इफ्तार करें। वह यह कहते हुए एक प्लेट में तेजी से फल काटने लगा।

हम उसके पास बैठकर उसे देखने लगे। रोजे की हालत में इतनी मेहनत के बावजूद उसके शांत चेहरे पर अजीब सा सुकून छाया हुआ था। हम भी हलाल कमाई करना चाहते थे, मगर खुदा को शायद यह मंजूर नहीं था।
कुछ देर के इंतजार के बाद हम मुंह लटकाकर बोले, हां, सुना था कि सुबह सब्जी मंडी में आपकी जेब काट ली गई? वह उदासी से बोला, लेकिन मेरे ख्याल में एक तरह से आपके साथ अच्छा ही हुआ।

अगले ही पल वह कुछ सोचते हुए बोला तो हम अचंभित हो गए। अरे, भाई, हमारी उम्र भर की कमाई लुट गई और तुम कह रहे हो अच्छा हुआ? हम भड़ककर बोले।

देखिए न फैजी भाई, आप हलाल कमाना चाहते थे, मगर हराम की कमाई से हलाल तो नहीं कमाया जा सकता ना। मेरे ख्याल में खुदा ने आपके हलाल कमाने के फैसले को पसंद किया, इसलिए आपकी हराम की कमाई खो गई। वह एक लिफाफे में से पकौड़े निकालकर प्लेट में रखते हुए बोला।

हम अचंभे से उसे देखने लगे। अजीब फिलोसोफी झाड़ रहा था वह। खुदा ने अगर हमारा फैसला पसंद किया था तो बजाय हमारी मदद करने के हमारी रुपया ही छीन लिया था । हमने अपने ख्यालात का इज़हार उससे किया तो वह बोला, फैजी भाई, हराम की कमाई से जो कारोबार आप शुरू करते वह भी हराम ही होता है। आप क्या यह पसंद कर सकते हैं कि सारा दिन रोजे और गर्मी की हालत में शदीद मेहनत के बाद भी इंसान को जो रीज़्क़ मिले उससे हलाल की खुशबू न आए? 

"भाई, तुम जानते हो कि हमारे अंदर नवाबी खून बहता है। अब हम छोटे-मोटे काम करके अपने पूर्वजों की आत्मा को दुखी नहीं कर सकते।"
वह शांति से हमें देखता रहा। कुछ पलों बाद वह रसान से बोला, "फैजी भाई, हमारे नबी जो बादशाहों के बादशाह थे, वे अगर मेहनत को अपमान नहीं समझते थे तो हम किस बाग की मूली हैं?"

नेक बख्त ने मुहावरा तो गलत बोला था, मगर नुक्ता बड़ा सख्त मारा था। यार, हम मेहनत करना चाहते हैं मगर आप जानते हैं कि हमारी शोहरत अच्छी नहीं है। इस शहर में कोई भी व्यक्ति हम पर विश्वास नहीं करता। ऐसे में हमारे पास अपने काम के अलावा दूसरी कोई राह है भी तो नहीं?"
हम दुखी दिल के साथ बोले। अफ्तारी में कुछ पल ही बाकी हैं, आप दिल से दुआ करें। अफ्तारी के समय की गई दुआ को खुदा कभी रद्द नहीं करता। इन्शा अल्लाह आपकी समस्या हल हो जाएगी।" उसने यह कहते हुए हाथ दुआ के लिए उठा लिए। वह जोर से दुआ करने लगा और हम अमीन की आवाज बुलंद करने लगे।

उसने हमारी परेशानियों के हल होने की दुआ की तो आमीन कहते हुए हमारी आवाज भर्रा गई। अज़ान की आवाज बुलंद हुई तो उसने हाथ चेहरे पर फेर लिए। उसके चेहरे पर छाया सुकून देखकर हमें उस पर रश्क आया।
हमने खजूर से रोजा अफ्तार किया। उसके चेहरे पर छाया सुकून देखकर हमें एहसास हो रहा था कि यह सुकून बस हलाल कमाने वाले व्यक्ति के चेहरे पर ही हो सकता है। हम भी अपने चेहरे पर यह सुकून देखने के मुतामन्नी  थे। हमने दिल में पक्का इरादा किया कि कुछ भी हो, अब हमने हलाल जरियों से ही कमाना है।

चाहे रास्ते में जितनी भी मुश्किलें आएं, हमने अपने इस वादे से नहीं पलटना था। अगली सुबह, हम फिर मंडी में सब्जी और फलों के भाव पूछ रहे थे। कुछ ही देर में सामान की खरीदारी के बाद हम लौट रहे थे। दुकान पर पहुंचकर हमने सामान लगाना शुरू किया। अच्छा खासा मेहनत वाला काम था। सामान लगाने के बाद हम घर आकर सोने के लिए लेट गए। हमारे शरीर का जोड़ जोड़ दुख रहा था। प्यास से हमारे गले में कांटे से पड़ रहे थे। आज का रोजा बहुत मुश्किल होगा। यही सोचते हुए हमारी आंख लग गई।

ज़ुहर की अज़ानें सुनकर ही हमारी आंख खुली। हम तुरंत उठ गए। वुज़ू के दौरान हमें एहसास हुआ कि सोने से पहले हम काफ़ी थकान और कमज़ोरी महसूस कर रहे थे, मगर उस समय खिलाफ़-ए-तवक़्क़ो  खुद को उतना तरो-ताज़ा महसूस कर रहे थे कि लग ही नहीं रहा था कि हम रोज़े से हैं।
नमाज़ के बाद हम अपनी दुकान पर आ गए। मगरिब तक ग्राहकों को सौदा देते, समय गुजरने का एहसास ही नहीं हुआ। आज जब हम अफ्तारी के लिए बैठे तो हमारे चेहरे पर वैसा ही सुकून छाया हुआ था जैसे सुकून की दुआ हमने कल खुदा से मांगी थी।

इस सुकून को पाने के बाद हमें एहसास हुआ कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत तो यही सुकून है। यह सुकून हमें हक हलाल की कमाई से मिला था, जब कि हम एक अरसे तक इसकी तलाश में दूसरी चीज़ों के पीछे भागते रहे थे।

रमज़ान बरकतों और रहमतों का महीना है। यह जुमला हम अक्सर सुनते रहते थे, मगर इसका एहसास हमें पहली बार हुआ है। इस बार हमारा रमज़ान का महीना चारपाई पर पड़े रहने के बजाय सख्त मेहनत-मशक्कत में गुजरा, लेकिन इसके बावजूद यह हमारी ज़िंदगी का सबसे अच्छा रमज़ान था, न केवल रूहानी और जिसमानी  लिहाज़ से, बल्कि माली लिहाज़ से भी। नईम भी हमारे काम से बहुत खुश था।

उसने बताया कि उसने हमें डरते-डरते अपने कारोबार में शामिल किया था, लेकिन हमने अपनी मेहनत और मशक्कत से उसके सभी आशंकाओं को गलत साबित किया। हमारे हालत देखते हुए, नईम ने हमें अपनी ही दुकान पर सेल्समैन के रूप में नौकरी दे दी थी। हमने उसकी पेशकश स्वीकार तो कर ली थी, लेकिन हमें यकीन नहीं था कि हम रोज़े की हालत में इतना सख्त काम कर सकते हैं।

लेकिन अब हम उसके शुक्रगुज़ार थे कि उसकी बदौलत हमें सीधे रास्ते पर चलने का मौका मिला था। विपरीत अपेक्षा, मेहनत-मशक्कत से न तो हमारा रोज़ा खराब हुआ और न ही यह काम हमारी नवाबी तबीयत पर गिरा गुज़रा।

एक दिन हम ग्राहकों को आलू और टिंडे तौलकर दे रहे थे कि अचानक दुकान में जैसे रोशनी सी फैल गई। हमने नज़रें उठाईं तो दिल की दुनिया उथल-पुथल हो गई। दुकान पर रोशन आरा खड़ी मुस्कराते हुए हमें देख रही थीं। आदाब! उन्होंने एक अदा से अपना हाथ पेशानी तक ले जाकर हमें सलाम किया। हम, गुज़िश्ता बार की तरह, इस बार भी बमुश्किल सर को खम दे पाए। बहुत अच्छा लगा आपको यहां देखकर। वह मुस्कराते हुए बोलीं। हम समझ नहीं पाए कि वह हमें देखकर खुश हुईं या हमें काम करते देखकर। बस जी, मेहनत-मशक्कत से पेट भरने की कोशिश कर रहे हैं, हम आजिज़ी से बोले। बहुत अच्छा कर रहे हैं, वह हस्ब-ए-मामूल अपनी रोशन मुस्कान के साथ बोलीं। उनकी बात सुनकर हमें सुकून मिला, गोया उन्हें हमारे आलू और टिंडे बेचने पर कोई एतराज़ नहीं था। आप इसके बाद हमारे ग़रीब खाने पर तशरीफ़ नहीं लाए…? वह नाराज़ी का हल्का सा पर्दा चेहरे पर डालकर बोलीं, तो हमारा दिल ढोल की तरह धड़कने लगा। हम चांद रात पर अपनी वालिदैन समेत आपके घर तशरीफ़ लाएंगे, आप को ईद की मुबारक देने और… हम मानी ख़ेज़ अंदाज़ में जुमला अधूरा छोड़कर उन्हें देखने लगे। उनके चेहरे पर लाली देखकर हमें उनकी रज़ामंदी का अंदाज़ा हो गया, और हमारा दिल खुशी से नाचने लगा।

हम झूमते हुए गुनगुनाने लगे, तू ने मारी एंट्रियां, रे दिल में बजी घंटियां, टर्न टर्न तर्न… कल तक यह गाना हमें अन्य नए गानों की तरह फिजूल लगता था, मगर आज इसे गुनगुनाते हुए हमें महसूस हो रहा था कि यह कितना क्लासिक गाना है।
चांद रात पर हम तोहफों और मिठाई के टुकड़ों से लदे फंदे, माता-पिता के साथ रोशन आरा के घर पहुंचे। हमारी माता जी पिछले दिनों चुपके से उनके कान में हमारे रिश्ते की बात डाल चुकी थीं। आज हम इस सिलसिले को पूरा करने की गर्ज़ से वहां मौजूद थे।

हमारी बे-करार नज़रें रोशन आरा के दीदार में आसपास घूम रही थीं, मगर वह नेक बख्त शर्म के मारे बाहर नहीं निकली थीं। जब भी हम उठने की कोशिश करते, उनकी माता हमें बैठा लेतीं। हम अफ्तारी घर से कर के आए थे, मगर खाना यहीं खाना था। रोशन आरा के हाथों से बने खाने का ज़ायका याद आते ही हमारा मुंह पानी से भर जाता। आखिरकार, इंतज़ार रंग लाया और कमरे का दरवाज़ा खुला। हमने इश्तियाक से नज़रें उठाईं, मगर हमारे अरमानों पर ओस पड़ गई।

यह तो कोई और औरत थीं। रोशन आरा की मां  ने इस औरत का अपनी भांजी कहकर परिचय कराया। खाना इसी भांजी ने लगाया था। हमें उम्मीद थी कि रोशन आरा खाने की मेज पर हमारे साथ मौजूद होंगी, लेकिन हमारी आशा आशा ही रह गई। न केवल उस समय बल्कि बाद में मंगनी की अंगूठी भी हमारी मां ने दूसरे कमरे में जाकर उन्हें पहनाई। हमें उनका दीदार नसीब नहीं हुआ।

वापसी पर हम मायूस थे। गली के नुक्कड़ से गुजरते हुए हमने एक आखिरी नज़र रोशन आरा के घर की तरफ डाली। दूसरी मंजिल की खिड़की पर रोशन आरा का चेहरा रोशन चांद की तरह जगमगा रहा था। हमें ऐसा लगा जैसे ईद का चांद नजर आ गया हो।

ईद वाले दिन हमने नए कपड़े पहने और ईदगाह की तरफ चल पड़े। आज पहली बार ईद पर नए कपड़ों ने भी हमें खुशी दी थी, और लोगों से ईद मुबारक सुनना भी अच्छा लग रहा था। नमाज़ के बाद हमारी नज़र नोमी पर पड़ी। उसने हमें गले लगाया और वह देर तक हमसे लिपटा रहा। गले मिलने के बाद हमने उससे उसका हाल-चाल पूछा तो वह गमज़दा अंदाज़ में बोला, बस फैज़ी, क्या बताऊं। यह महीना मेरी ज़िंदगी का सबसे मुश्किल महीना था। तुम जानते तो हो कि मेरी बीवी बीमार थी। इस महीने जितना कुछ भी कमाया, सब उस पर खर्च हो गया। उसने कहा

भाभी की तबीयत अब कैसी है? हमने फिक्रमंदी से पूछा। वह कल ही ठीक हुई है। अल्लाह ने हमें बेटे की नेमत से नवाज़ा है। वह शर्माते हुए बोला। वाह! फिर तो ईद के साथ-साथ आपको बेटे की भी बहुत मुबारक हो! हम खुश दिली से बोले।

खैर, मगर बच्चा ठीक नहीं है। डॉक्टर्स ने उसे इमरजेंसी में रखा हुआ है। प्लीज़ उसके लिए दुआ करें, वह परेशानी से बोला। ओह  अल्लाह पाक उसे पूरी सेहत दे, हम चिंता से बोले। वह आमीन कहने के बाद रुखसत हो गया।

हम दिन भर लोगों से ईद मिलते मिलते रहे। शाम को हमें नोमी का ख्याल आया तो हम उसकी तरफ चल पड़े। वह टैक्सी से अपने घर के दरवाजे पर उतर रहा था, उसकी पत्नी भी उसके साथ थी। उसने अपने बच्चे को गोद में उठाया हुआ था, और दोनों के चेहरे खुशी से चमक रहे थे। हमें देखते ही नोमी हमारी तरफ लपका। उसने हमें गले से लगाकर इतने जोर से भींचा कि हमारा सांस रुकने लगा। वह बहुत खुश नजर आ रहा था।

ईद मुबारक! ये दो शब्द आज हमने बेशुमार बार सुने थे, मगर नोमी ने जिस अंदाज में ईद मुबारक कहा था, उससे हमें यकीन हो गया था कि हमारी ईद वास्तव में हमारे लिए मुबारक हो गई है। वह हमें अपने घर ले आया और बताया कि ईद की नमाज के बाद जब वह अस्पताल पहुंचा तो उसके बेटे की तबीयत ठीक हो चुकी थी, और शाम तक डॉक्टर्स ने उन्हें छुट्टी दे दी थी। हमने भी उसके बेटे की सेहत याबी पर खुदा का शुक्र अदा किया।

बातों के दौरान वह हमें टटोलती नज़रों से देख रहा था। हमने अंदाजा लगाया कि वह इस महीने में हम में होने वाली तब्दीलियों को नोट कर रहा है, मगर हमारा अंदाजा गलत निकला। हमें उसकी नज़रों का सही मतलब तब समझ आया जब रात को सोने के लिए लेटने लगे।

सोने से पहले जब हमने अपनी कमीज़ उतारी तो जेब में खड़कखड़ाहट सी महसूस हुई। हमने जेब में हाथ डालकर बाहर निकाला और फटी फटी आंखों से अपनी हथेली पर रखे नोटों को देखने लगे। खुदा की कसम, उस समय अगर हमारे मरहूम दादा अपनी लाठी टेकते हुए भी तशरीफ़ ले आते तो हमें उतना बड़ा झटका नहीं लगता, जितना अपनी हथेली पर रखी चीज़ को देखकर लगा था।
हम लरजते हाथों और धड़कते दिल से रुपये की गिनती करने लगे। यह उतने ही पैसे थे जितने हमने एक रमज़ान को खोए थे। गोया एक रमज़ान  को खोने वाली रकम हमें एक शव्वाल को दोबारा मिल गई थी। इस रकम के साथ एक कागज़ भी मौजूद था। हमने कागज़ खोला और पढ़ने लगे:


प्रिय फैज़ी, मैं तुमसे बहुत शर्मिंदा हूं कि मैंने तुम्हारा दोस्त होते हुए भी तुम्हें धोखा दिया। मैं लालच में आ गया था, मगर कुदरत ने मुझे इस लालच की सज़ा दी। प्लीज़! तुम मुझे माफ कर देना। एकरमज़ान  को तुम्हारी जेब से पैसे निकालने वाला कोई और नहीं, मैं खुद था। मैं इसी नियत से तुम्हें साथ ले कर गया था। तुमने यह रुपया दूसरों से छीनकर हासिल की थी, इसलिए तुमसे यह रुपया चुराने के बाद मैं मुतमइन था कि मैंने नेक काम किया है, मगर मैं गलती पर था। इस रुपये से जब मैंने कारोबार शुरू किया तो हर रोज़ एक नई परेशानी का सामना करना पड़ा। इससे पहले जब मैं हलाल कमाता था तो कभी मुझे ऐसे मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ा था। इस महीने मैंने जो कुछ कमाया, सब बीवी की बीमारी पर खर्च हो गया। मैं जान गया कि खुदा मुझे भी पसंद करता है, इसलिए नाजायज़ तरीकों से हासिल की गई रकम मुझे रास नहीं आई। मैं समझ गया हूं कि जब तक यह रुपया मेरे पास रहेगी, खुदा मुझे इसकी सज़ा देता रहेगा, इसलिए सोच-समझकर मैंने यह रुपया तुम्हारे हवाले करने का फैसला किया है। उम्मीद है कि तुम मुझे माफ कर दोगे। मेरा नवजात बेटा ज़िंदगी और मौत की कशमकश में अस्पताल में भर्ती है, खुदा रा! उसकी सेहत याबी के लिए दिल से दुआ करना। अगर तुमने मुझे माफ कर दिया तो मुझे रब तआला से उम्मीद है कि वह भी मेरी खता  माफ कर के मुझे मज़ीद परेशानियों से महफूज़ रखेगा।
फ़क़त-व-सलाम
तुम्हारा दोस्त
नोमान

खत पढ़कर हम सक्ते में रह गए। हमें इस रुपये से डर आने लगा। हमें अंदाजा हुआ कि यह खत उसने सुबह हमारी जेब में डाला था। हम उसी वक्त उठे और एक खैराती अस्पताल की तरफ रवाना हो गए।
एक महीने पहले, हम इस रुपये की महरुमी पर अल्लाह से शिकवा कर रहे थे और आज, एक महीने बाद, यह रुपया हमें कांटों की तरह चुभ रहा  था, और हम जल्द से जल्द इस से जान छुड़ाना चाहते थे।

शायद अब हम भी अल्लाह को पसंद आ गए थे।