फ़ोन की घंटी बजी। मैंने गहरी नींद में अचानक फ़ोन उठाया। उधर से आवाज़ आई, "बाजी ज़रा साजिदा को बता दें कि आसिफ़ फ़ोत हो गया है।" कौन आसिफ़? मैंने पूछा : दादा पोता है , और अचानक फ़ोन रख दिया। मैंने फिर से सोने की कोशिश की, लेकिन एक बार नींद टूट जाए तो फिर कहाँ नींद आती है?
वैसे भी साजिदा को बताना था ताकि वह जल्दी से जल्दी काम निपटाकर गाँव जाए। साजिदा मेरा नाश्ता लेकर आई और वहीं कालीन पर बैठ गई। मैंने टोस्ट पर जैम लगाते हुए पूछा, "यह आसिफ कौन है? क्यों जी, क्या हुआ?" वह एकदम चौंक गई - "मेरी अफ्रीजन का देवर है, जी मेरे जेठ का पुत्र है । वह फ़ोंत हो गया।"
मैंने धमाका किया, उसने दोनों हाथ मले, "वह कैसे मर गया? सोहना, घबरू जवान, बैल की तरह मजबूत काठी, ना जी, यह नहीं हो सकता।"
क्यों नहीं हो सकता? क्या उसके मरने पर पाबंदी है? नहीं, पर देखिए ना। मरने की भी एक उम्र होती है। उसकी तो उम्र नहीं थी। कल का बच्चा है। अभी तो दाढ़ी भी नहीं आई और फिर वह तो जुड़वा बच्चा है, उसके संगे नाल ज्म्ने वाला (उसके साथ पैदा होने वाला) दूसरा तो बिल्कुल मामूली मरता हुआ सूखा तिला है। मरता तो वह मरता । अल्लाह जी, अब क्या होगा? मेरी शोद ही देवरानी का कलेजा फट गया होगा। साजिदा ने रोना शुरू कर दिया।
सब्र करो, सब्र। तेरी तो पहले ही एक आँख की नज़र नहीं है। अब क्या दूसरी आँख भी गंवा देगी? कैसे सब्र करूँ, बी बी! इतना नेक बच्चा था। जी जी करता था। जाती थी तो फोरन चारपाई बिछाकर उस पर चादर डालता। तकिए रख्ता। दूध में पत्ति लगाकर पिलाता। उसने दुनिया में अभी देखा ही क्या था।
mout ki ghanti
हाए हाए, सादिक की तो कमर टूट गई। जान जवान मौत का सदमा बर्दाश्त कर सकेगा कि नहीं। मुझे तो उसकी फिक्र पड़ गई। कहीं एक घर से दो मंजियाँ न निकलें। दिल का अटैक न हो जाए। खैर का कलमा निकाल - जेठ को क्यों मारे डालती है? यह तो बताइए, आपको फोन किसने किया था? मुस्तफा ने कहा था कि तेरा दादा पोता है - कहीं मेरे दादा पोते बशीर के बेटे आसिफ का तो नहीं कह रहा था? उसने दो हथड़े अपने सीने पर मारे - ज़रूर बशीर का पुत्र होगा। हाए अल्लाह जी, चार लड़कियों के बाद तो हुआ था हर पीर फकीर से दुआ कराई थी अल्लाह जाने उसके साथ क्या बनी जो यूँ अचानक मर गया। न कोई बीमारी की खबर, न कोई और बात। ज़रूर कोई दिल का मरोड़ पड़ा होगा। नज़र न लग गई हो किसी दिल सड़ी की। आसेब भी पड़ सकता है। कितनी दफा। कहा था कि मगरिब के बाद घर से बाहर न निकलना। पेड़ के नीचे न खड़ा होना।
आज कल की लड़कियाँ किसी बड़े की बात नहीं सुनतीं। कितना बड़ा था? मैंने चाय का घूंट लेते हुए पूछा। मैं अनपढ़ हूँ बी बी । मुझे उम्र शुमर का क्या पता। अभी तो घुटनों के बल चल रहा था। शायद पाँव पाँव चलने लगा हो। ऐसा चिट्टा सफेद दूध वरगा मोटा ताज़ा। बंदा देखता रहे। लगे जैसे किसी पठान का बच्चा है। हाए हाए, माँ पियो और बहनों की तो जान थी इसमें। मौत की घड़ी का कोई पता नहीं।
बुलावा आए तो कितनी देर लगती है। न बच्चे देखती है न आधी उम्र। मेरा तो कलेजा फट रहा है। दिल चाह रहा है उड़कर पहुँचूँ और उन्हें हौसला दूँ। खुद को हौसला पकड़। मैंने तस्ली दी। बीबी, जनाजे का नहीं बताया कितने बजे है ?वाकई जनाजे का तो बताया ही नहीं। बड़ा बेवकूफ है तेरा बेटा - आप जनाजे का पता कराइए।
मैं बाहर जाकर दादू को तो बताऊं, वह भी बेचारा बड़ा खकराएगा।" मैंने हसन अब्दाल को फोन किया कि जनाजे का पता कराइए और खुद अखबार पढ़ने गई। आजकल तो वैसे भी अखबार से बढ़कर कोई चीज डिप्रेसिंग नहीं। पढ़ते ही ब्लड प्रेशर लो होने लगता है और परेशानी बढ़ने लगती है।
कोई खैर की खबर तो होती नहीं। आत्मघाती हमले, धमाके, आग, खून, दिल वैसे ही उदास है। थोड़ी देर बाद साजिदा वापस आ गई और मोटे शीशों वाली चश्मे में से उसकी आँखें अपने साइज से कई गुना बड़ी नजर आ रही थीं। उसने अपनी जिन्नाती साइज की आँखें मुझ पर गाड़ दीं और बोली, "वो जी दादू कह रहा है कि बशीर के बेटे का नाम आसिफ नहीं, आरिफ है। यह ज़रूर मीरखान का बेटा आसिफ होगा।
और अपना सिर पकड़कर बैठ गई।
मीरखान बेचारा तो कब से मंजी पर पड़ा है - सरकारी अस्पताल में पड़ा है, हर तरफ नालियाँ लगी हुई हैं बस इंतजार है कि कब साँस खत्म हो। जाना तो उसे था पर बुलावा उसके बेटे का आ गया - बीबी, कहीं फरिश्तों को गलती तो नहीं लग गई? चल, बेवकूफ, कभी-कभी फरिश्ते भी गलती करते हैं। "ओ जी, कई वार बंदा मर गया। जब नहलाने के लिए डाला तो कलमा पढ़ता हुआ उठ बैठा। सारे लोग सर पर पाँव रखकर भाग गए। वह बेचारा आवाजें दे रहा है - मैं मरा नहीं, जीता जागता हूँ।"
असल में फरिश्तों को जब पता चलता है न कि वह गलत बंदे के पास जा रहे हैं तो वह उसका साँस मोड़ देते हैं - फरिश्तों से भला कैसे गलती हो सकती है? क्या भांग लगाई हुई है? "क्यों नहीं हो सकती? कई वार एक जैसे नाम होते हैं।शक्ल मिलती –जुलती होती है। आखिर को फरिश्ते भी तो अल्लाह की मखलूक ही हैं ना!" तो यह बता कि जाना है या नहीं? क्या इरादा है? "जाना तो पड़ेगा। आज मैं न जाऊं तो कल मेरे जनाजे पर कौन आएगा? तुझे क्या फर्क पड़ता है। मरने के बाद कोई आए या न आए। लो जी, कैसे फर्क नहीं पड़ता? जनाजा पड़ा हो और कोई दो आंसू बहाने वाला भी न हो - मेरे घर वाले मुँह छुपाते फिरेंगे।
हमारे गाँव का एक खान था - वह लोगों के जनाजे पर नहीं जाता था। जब वह मरा तो गाँव वालों ने खुद जाने के बजाय पेड़हियाँ भेज दीं और फिर भी कोई जनाजा उठाने वाला नहीं था। बड़ी मुश्किल से खींच-खांच कर क़ब्र में डाला और वैसे भी मीरखान का पहला विवाह मेरी मोसेरी (खाला जाद) के साथ हुआ था।
उसके तो हाथों की मेंहदी भी नहीं उतरी थी कि शौहर मर गया। खैर जी, निकाह तो हुआ था नसीब न हुआ तो क्या हुआ और फिर मीरखान ने आसिफ के लिए मेरी नानू (संद) की धी के लिए रिश्ता भी डाला था। अगर रिश्ता हो जाता तो फिर तो अपना जवानतरह (दामाद) ही होता? मैंने तंग आकर कहा, "अच्छा बाबा! जाओ मगर जनाजे के बाद फोरन आ जाना।" और वह फोरन जोड़ा बदल कर , चिकन की सफेद चादर ओढ़, तशरीफ ले गईं।
मगरिब के बाद वापस तशरीफ लाई। आ गईं, वापस बड़ी जल्दी वापसी हो गई। जी आ गई। जवान मौत थी। काफी बड़ा जनाजा होगा। वह एकदम से फट पड़ी। कैसी जवान मौत जी। गाँव का मौलवी सईफ फौत हो गया है। सौ से ऊपर टप गया था। कई सालों से बीमार था, बल्कि अब तो मंजी पर बैठ गया था। शौधे का दाना पानी भी बंद हो गया, नास सुख के मकर बन गया था। उसका मरना तो चलो अच्छा ही हो गया। उसकी भी जान छूटी और पीछे वालों की भी।
अल्लाह जी ने पर्दा रख लिया। वह तो कह रहा था कि दाद पो तड़ा है? मेरा दाद पप्पू तड़ा क्यों होता? मुझे फोन करने की भला क्या जरूरत थी? सारे रास्ते रो-रो कर नज़र और भी खराब हो गई। असल में जी, आप को गलती हो गई। वह मुस्तफा नहीं था। मेरा दाद पो तड़ा था जिसने फोन किया। उसने सईफ कहा। आप ने आसिफ समझा। खैर जी, जो होना था हो गया। आप बोलिए, रात को क्या खाना है?
सब्र करो, सब्र। तेरी तो पहले ही एक आँख की नज़र नहीं है। अब क्या दूसरी आँख भी गंवा देगी? कैसे सब्र करूँ, बी बी! इतना नेक बच्चा था। जी जी करता था। जाती थी तो फोरन चारपाई बिछाकर उस पर चादर डालता। तकिए रख्ता। दूध में पत्ति लगाकर पिलाता। उसने दुनिया में अभी देखा ही क्या था।
mout ki ghanti
हाए हाए, सादिक की तो कमर टूट गई। जान जवान मौत का सदमा बर्दाश्त कर सकेगा कि नहीं। मुझे तो उसकी फिक्र पड़ गई। कहीं एक घर से दो मंजियाँ न निकलें। दिल का अटैक न हो जाए। खैर का कलमा निकाल - जेठ को क्यों मारे डालती है? यह तो बताइए, आपको फोन किसने किया था? मुस्तफा ने कहा था कि तेरा दादा पोता है - कहीं मेरे दादा पोते बशीर के बेटे आसिफ का तो नहीं कह रहा था? उसने दो हथड़े अपने सीने पर मारे - ज़रूर बशीर का पुत्र होगा। हाए अल्लाह जी, चार लड़कियों के बाद तो हुआ था हर पीर फकीर से दुआ कराई थी अल्लाह जाने उसके साथ क्या बनी जो यूँ अचानक मर गया। न कोई बीमारी की खबर, न कोई और बात। ज़रूर कोई दिल का मरोड़ पड़ा होगा। नज़र न लग गई हो किसी दिल सड़ी की। आसेब भी पड़ सकता है। कितनी दफा। कहा था कि मगरिब के बाद घर से बाहर न निकलना। पेड़ के नीचे न खड़ा होना।
आज कल की लड़कियाँ किसी बड़े की बात नहीं सुनतीं। कितना बड़ा था? मैंने चाय का घूंट लेते हुए पूछा। मैं अनपढ़ हूँ बी बी । मुझे उम्र शुमर का क्या पता। अभी तो घुटनों के बल चल रहा था। शायद पाँव पाँव चलने लगा हो। ऐसा चिट्टा सफेद दूध वरगा मोटा ताज़ा। बंदा देखता रहे। लगे जैसे किसी पठान का बच्चा है। हाए हाए, माँ पियो और बहनों की तो जान थी इसमें। मौत की घड़ी का कोई पता नहीं।
बुलावा आए तो कितनी देर लगती है। न बच्चे देखती है न आधी उम्र। मेरा तो कलेजा फट रहा है। दिल चाह रहा है उड़कर पहुँचूँ और उन्हें हौसला दूँ। खुद को हौसला पकड़। मैंने तस्ली दी। बीबी, जनाजे का नहीं बताया कितने बजे है ?वाकई जनाजे का तो बताया ही नहीं। बड़ा बेवकूफ है तेरा बेटा - आप जनाजे का पता कराइए।
मैं बाहर जाकर दादू को तो बताऊं, वह भी बेचारा बड़ा खकराएगा।" मैंने हसन अब्दाल को फोन किया कि जनाजे का पता कराइए और खुद अखबार पढ़ने गई। आजकल तो वैसे भी अखबार से बढ़कर कोई चीज डिप्रेसिंग नहीं। पढ़ते ही ब्लड प्रेशर लो होने लगता है और परेशानी बढ़ने लगती है।
कोई खैर की खबर तो होती नहीं। आत्मघाती हमले, धमाके, आग, खून, दिल वैसे ही उदास है। थोड़ी देर बाद साजिदा वापस आ गई और मोटे शीशों वाली चश्मे में से उसकी आँखें अपने साइज से कई गुना बड़ी नजर आ रही थीं। उसने अपनी जिन्नाती साइज की आँखें मुझ पर गाड़ दीं और बोली, "वो जी दादू कह रहा है कि बशीर के बेटे का नाम आसिफ नहीं, आरिफ है। यह ज़रूर मीरखान का बेटा आसिफ होगा।
और अपना सिर पकड़कर बैठ गई।
मीरखान बेचारा तो कब से मंजी पर पड़ा है - सरकारी अस्पताल में पड़ा है, हर तरफ नालियाँ लगी हुई हैं बस इंतजार है कि कब साँस खत्म हो। जाना तो उसे था पर बुलावा उसके बेटे का आ गया - बीबी, कहीं फरिश्तों को गलती तो नहीं लग गई? चल, बेवकूफ, कभी-कभी फरिश्ते भी गलती करते हैं। "ओ जी, कई वार बंदा मर गया। जब नहलाने के लिए डाला तो कलमा पढ़ता हुआ उठ बैठा। सारे लोग सर पर पाँव रखकर भाग गए। वह बेचारा आवाजें दे रहा है - मैं मरा नहीं, जीता जागता हूँ।"
असल में फरिश्तों को जब पता चलता है न कि वह गलत बंदे के पास जा रहे हैं तो वह उसका साँस मोड़ देते हैं - फरिश्तों से भला कैसे गलती हो सकती है? क्या भांग लगाई हुई है? "क्यों नहीं हो सकती? कई वार एक जैसे नाम होते हैं।शक्ल मिलती –जुलती होती है। आखिर को फरिश्ते भी तो अल्लाह की मखलूक ही हैं ना!" तो यह बता कि जाना है या नहीं? क्या इरादा है? "जाना तो पड़ेगा। आज मैं न जाऊं तो कल मेरे जनाजे पर कौन आएगा? तुझे क्या फर्क पड़ता है। मरने के बाद कोई आए या न आए। लो जी, कैसे फर्क नहीं पड़ता? जनाजा पड़ा हो और कोई दो आंसू बहाने वाला भी न हो - मेरे घर वाले मुँह छुपाते फिरेंगे।
हमारे गाँव का एक खान था - वह लोगों के जनाजे पर नहीं जाता था। जब वह मरा तो गाँव वालों ने खुद जाने के बजाय पेड़हियाँ भेज दीं और फिर भी कोई जनाजा उठाने वाला नहीं था। बड़ी मुश्किल से खींच-खांच कर क़ब्र में डाला और वैसे भी मीरखान का पहला विवाह मेरी मोसेरी (खाला जाद) के साथ हुआ था।
उसके तो हाथों की मेंहदी भी नहीं उतरी थी कि शौहर मर गया। खैर जी, निकाह तो हुआ था नसीब न हुआ तो क्या हुआ और फिर मीरखान ने आसिफ के लिए मेरी नानू (संद) की धी के लिए रिश्ता भी डाला था। अगर रिश्ता हो जाता तो फिर तो अपना जवानतरह (दामाद) ही होता? मैंने तंग आकर कहा, "अच्छा बाबा! जाओ मगर जनाजे के बाद फोरन आ जाना।" और वह फोरन जोड़ा बदल कर , चिकन की सफेद चादर ओढ़, तशरीफ ले गईं।
मगरिब के बाद वापस तशरीफ लाई। आ गईं, वापस बड़ी जल्दी वापसी हो गई। जी आ गई। जवान मौत थी। काफी बड़ा जनाजा होगा। वह एकदम से फट पड़ी। कैसी जवान मौत जी। गाँव का मौलवी सईफ फौत हो गया है। सौ से ऊपर टप गया था। कई सालों से बीमार था, बल्कि अब तो मंजी पर बैठ गया था। शौधे का दाना पानी भी बंद हो गया, नास सुख के मकर बन गया था। उसका मरना तो चलो अच्छा ही हो गया। उसकी भी जान छूटी और पीछे वालों की भी।
अल्लाह जी ने पर्दा रख लिया। वह तो कह रहा था कि दाद पो तड़ा है? मेरा दाद पप्पू तड़ा क्यों होता? मुझे फोन करने की भला क्या जरूरत थी? सारे रास्ते रो-रो कर नज़र और भी खराब हो गई। असल में जी, आप को गलती हो गई। वह मुस्तफा नहीं था। मेरा दाद पो तड़ा था जिसने फोन किया। उसने सईफ कहा। आप ने आसिफ समझा। खैर जी, जो होना था हो गया। आप बोलिए, रात को क्या खाना है?
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